भाग:2
हरियाणा का सामाजिक – सांस्कृतिक परिदृश्य
रणबीर सिंह दहिया
आने वाले समय में गरीब और कमजोर तबकों , दलितों, युवाओं और खासकर महिलाओं का अशक्तिकरण तथा इन तबकों का और भी हासिये पर धकेला जाना साफ़ तौर पर उभरकर आ रहा है। इन तबकों का अपनी जमीं से उखड़ने, उजड़ने व तबाह होने का दौर शुरू हो चुका है और आने वाले समय में और तेज होने वाला है ।
हरियाणा में आज शिक्षित, अशिक्षित और अर्धशिक्षित युवा लड़के व लड़कियां मरे मरे घूम रहे हैं। एक तरफ बेरोजगारी की मार है और दूसरी तरफ अंध उपभोग की लम्पट संस्कृति का अंधाधुंध प्रचार है। इनके बीच में घिरे ये युवक – युवती तेजी से लम्पटीकरण का शिकार होते जा रहे हैं। स्थगित रचनात्मक उर्जा से भरे युवाओं को हफ्ता वसूली, नशाखोरी, अपराध और दलाली के फलते फूलते कारोबार अपनी ओर खींच रहे हैं । बहुत छोटा सा हिस्सा भगत सिंह की विचारधारा से प्रभावित होकर सकारात्मक एजेंडे पर इन्हें लामबंद करने लगा है। ज्ञान विज्ञानं आन्दोलन ने भी अपनी जगह बनाई है ।
प्रजातंत्र में विकास का लक्ष्य सबको समान सुविधाएँ और अवसर उपलब्ध करवाना होता है। विकास के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ संसार यदि एक हद तक विकसित हो गया है तो निश्चय ही उसका लाभ बिना किसी भेदभाव के पूरी दुनिया की पूरी आबादी को मिलना चाहिए, परन्तु आज का यथार्थ ही यह है कि ऐसा नहीं हुआ।
आज के दौर में तीन खिलाड़ी नए उभर कर आये हैं (पहला डब्ल्यू टी ओ विश्व व्यापर संगठन , दूसरा विश्व बैंक व तीसरा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष), खुली बाजार व्यवस्था के ये हिमायती दुनिया के लए समानता की बात कभी नहीं करते बल्कि संसार में उपलब्ध महान अवसरों को पहचानने और उनका लाभ उठाने की बात करते हैं , गड़बड़ यहीं से शुरू होने लगती है।
बहुराष्ट्रीय संस्थाओं का बाजार व्यवस्था पर दबदबा कायम है। आज छोटी बड़ी लगभग 67000 बहुराष्ट्रीय संस्थाओं की 1,70,000 शाखाएं विश्व के कोने कोने में फ़ैली हुई हैं । ये संस्थाएं विभिन्न देशों की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी हस्तक्षेप करने लगी हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि इन सबके केन्द्रीय कार्यालय अमेरिका ,पश्चिम यूरोप या जापान में हैं । इनकी अपनी प्राथमिकतायें हैं। बाजार व्यवस्था इनका मूल मन्त्र है । हरियाणा को भी इन कंपनियों ने अपने कार्यक्षेत्र के रूप में चुना है । गुरुग्राम एक जीता जागता उदाहरण है। साइनिंग गुरुग्राम तो सबको दिखाई देता है मगर सफरिंग गुरुग्राम को देखने को हम तैयार ही नहीं हैं ।
आज के दौर में बहार से महाबली बहुराष्ट्रीय निगम और उनका जगमगाता बाजार और भीतर से सांस्कृतिक फासीवादी ताकतें समाज को अपने अपने तरीकों से विकृत कर रही हैं । इस बाजारवाद ,कट्टरवाद की मिलीभगत जगजाहिर है। इनमें से एक ने हमारी लालच, हमारी सफलताओं की निकृष्ट इच्छाओं को सार्वजनिक कर दिया है और दूसरे ने हमारे मनुष्य होने को और हमारे आत्मिक जीवन को दूषित करते हुए हमें एक हीन मनुष्य में तब्दील कर दिया है ।
यह ख़राब किया गया मनुष्य जगह जगह दिखाई देता है जिसमें धैर्य और सहिष्णुता बहुत कम है और जिसके भीतर की उग्रता और आक्रामकता दूसरे को पीछे धकेल कर जल्दी से कुछ झपट लेने, लूट लेने और कामयाब होकर खिलखिलाने की बेचैनी को बढ़ा रही हैं। इस समय में समाज के गरीब नागरिकों को अनागरिक बनाकर अदृश्य हाशियों की ओर फैंका जा रहा है । उनके लिए नए नए रसातल खुलते जा रहे हैं जबकि समाज का एक छोटा सा मगर ताकतवर हिस्सा मौज मस्ती का परजीवी जीवन बिता रहा है ।
समाज के इस छोटे से हिस्से के अपने उत्सव मानते रहते हैं जो की एक कॉकटेल पार्टी की संस्कृति अख्तियार करते जा रहे हैं । बाकि हरियाणवी समाज की जर्जरता बढाने के साथ साथ इस तबके के राग रंग बढ़ते हैं क्योंकि संकट से बचे रहने का , मुसीबतों को दूर धकेलने का तात्कालिक उपाय यही है । यह लोग बाजार में उदारतावाद और संस्कृति में संकीर्णतावाद व पुनरूत्थानवाद के समर्थक हैं । आजकल प्रचलित हरियाणवी सीडियों में परोसे जा रहे वलगर गीत नाटकों को यही ताकतें बढ़ावा दे रही हैं । असल में हमारा समाज पाखंडों और झूठों पर टिका हुआ अनैतिक समाज है । इसलिए हमें जोर जोर से नैतिकता शब्द का उच्चारण करना जरूरी लगता है । वस्तुत हमारे समाज में लाख की चोरी करने वाला यदि न पकड़ा जाये तो पकडे जाने वाले एक रुपये की चोरी करने वाले की तुलना में महान बना रह सकता है ।
बड़ी होशियारी से हमारे मन मस्तिष्क पर बाजारवाद का स्वप्न चढ़ाया जा रहा है । तमाम ठाठ बाठ के सपनों में उलझाकर बेखबरी में हमें जिधर धकेल जा रहा है हम उधर ही धिकते जा रहे हैं । इसीलिए आज यह प्रश्न अति गंभीर हु उठा है की जिस ग्लोबल विलेज की चर्चा की जा रही है वह आम आदमी और खासकर गरीबों के रहने लायक है भी या नहीं ? अब जबकि टेलीविजन के मध्यम से यह बाजार घर घर में प्रवेश कर चुका है तो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में भी यह टेलीविजन बगैर परिश्रम किये ऐसो आराम परोसने का कम कर रहा है अगर यकीं न हो तो जरा उन विज्ञापनों पर ध्यान दें जिसमें अमुक वस्तुओं को खरीदने पर कहीं कर तो कहीं सोना, कहीं टी वी, तो कहीं और कुछ दिलाने का सपना दिखा वस्तुओं का विक्रय बढ़ाया जाता है । चंद मिनटों में करोड़पति बनने की उम्मीद जगाई जाती हैं । कुल मिलाकर किस्सा यह बनता है कि परिश्रम ,कर्तव्य, ईमानदारी इत्यादि को घर के कूड़ा दान में फेंको ; खरीदो खरीदो और खरीदो और मौज करो ।
रातों रात अमीरी के सपने देखता युवा वर्ग इस अंधी दौड़ में तेजी से शामिल होता जा रहा है जिसमें सफलता के लिए कोई भी कीमत जायज हो सकती है। धन प्राप्ति के लिए जायज नाजायज कुछ भी किया जा सकता है । हमें जल्दी से जल्दी वो सारे ऐशो आराम एवं मस्ती चाहिए जो टी वी के द्वारा दिन रात परोसे जा रहे हैं। हमें बहकाया जा रहा है, निकम्मा बनाया जा रहा है। अश्लीलता को मौज मस्ती का पर्याय बता दिनोंदिन हमें अति उपभोक्तावाद की अंधी गली में धकेला जा रहा है जहाँ से बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है । अधनंगे वस्त्रों का फैशन शो अब महानगरों से निकल कर कस्बों व् गाँव तक पहुँच रहा है । युवा वर्ग लालायित हो उनकी नक़ल करने की होड़ में दौड़ रहा है ।
मल्टीनेशनल मालामाल हो रहे हैं, भारतीय कारीगर भुखमरी की ओर जा रहे हैं । आज आसामी सिल्क, बा लूचेरी की कारीगरी , कतकी पोचमपल्ली या बोकई के कारीगरों को मल्टीनेशनल के होड़ में खड़ा कर दिया गया है। अब इस गैर बराबरी की होड़ में भारतीय कारीगर चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो , कैसे टिक पायेगा ? इम्पोर्टिड चीजों को प्रचारित कर उन्हें स्टेटस सिम्बल बनाया जा रहा है और भारतीय कशीदाकारी को तबाह किया जा रहा है । भारतीय बेहतर कालीनों को बाल मजदूरी के नाम पर पश्चिमी देश प्रतिबंधित कर रहे हैं ताकि भारतीय वास्तु वहां के बाजार में प्रवेश न कर पाए। मगर उनकी वस्तुएं हमारे बाजार पर छा जाएँ ।
हमारे भारतीय हुनर के लिए यह मौत का फरमान ही तो है । बाजारवाद की इस होड़ में मल्टीनेसनल के सामने हमारी कारीगरी ही नहीं भारतीय कम्पनियाँ भी कब तक टिक पाएंगी यह एक अहम् सवाल है। पूरे भारत के सभी दरवाजे उनके लिए खोल दिए गए हैं ।
अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाये , यह महानगरों तक नहीं सिमित रहा । अब तो शहर शहर , गली गली में मैकडोनाल्ड , हमारे बच्चों को बर्गर ,पिज्जा फ्री के उपहार दे कर खाने की आदत डालेगा , रिझाएगा , फँसाएगा ताकि कल को वह पूरी , परांठा , इडली , डोसा भूल जाये और बर्गर ओइज्ज के बगैर रह ही नहीं पाए । आखिर बच्चे ही तो कल का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे भारत देश में । पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति , कारीगरी , हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो ।
इसी प्रकार आज बाजार के लिए देश प्रदेश विशेष के हुनर, कारीगरी, व्यवसाय, शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोल जा रहा है और हमारे मीडिया इस मामले में मल्टीनेशनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं । हरियाणा में अब गुंथा हुआ आटा , अंकुरित मूंग, चना आदि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगी । कूकीज , चाकलेट व् केक हमारे घर की शोभा होंगे , जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे । भारतीय कुटीर ऊद्योग के साथ साथ अन्य कम्पनियाँ भी मल्टीनेसनल के पेट में चली जायेंगी ।
सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है ? यदि नहीं तो इसके ठीक उल्ट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके नयायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है । उस विचार से नजदीक का सम्बन्ध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं । इसके बनाने के सब साधन इसी दुनिया में इसी हरियाणा में मौजूद हैं । जरूरत है उस नजर को विक्दित करने की । आज मानवता के वजूद को खतरा है । यह इस विचारधारा का या उस विचारधारा का मसला नहीं है । यह एक देश का सवाल नहीं है यह एक प्रदेश का सवाल नहीं है यह पूरी दुनिया का सवाल है । जिस रस्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रस्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है ।
हरियाणा के विकास मॉडल में भी यह साफ़ प्रकट हो रहा है । नव वैश्वीकरण की प्रक्रिया से विनाश ही होगा विकास नहीं । मगर अब दुनिया यह सब समझ रही है । हरियानावासी भी समझ रहे हैं । मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाडी के नीचे नहीं रखेगी । मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असंभव कर देगी । हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं । युवा लड़के लड़कियां , दलित, और महिलाएं इसके अगवा दस्ते होंगे और समाज सुधर का काम अपनी प्रगतिशील दिशा अवश्य पकड़ेगा।
