कविता
मां
सुनील कुमार खुराना
चेहरा देखकर बच्चें का।
बिन बताए हाल जान लेती है मां।।
बच्चों के कष्ट और दुख में।
सदा ही साथ देती है मां।।
बच्चे को सूखे में लिटाकर।
खुद गीले में सो जाती है मां।।
बच्चों को अपने रोटी खिलाकर।
खुद भूखे सो जाती है मां।।
हंसी देखकर बच्चे की।
खुद के दुख को भूल जाती है मां।।
बचपन में रोए जब बच्चा।
तो लोरी सुना देती है मां।।
कैसे जीया जाए जिंदगी में।
जीना सिखा देती है मां।।
मां की महिमा है अपार।
जग में कोई नहीं पाया इससे पार।।
पढ़कर बच्चा ज्ञान की ज्योत जलाए।
तो बच्चें की पहली शिक्षिका है मां।।
जीवन में यदि हो मां का आशीर्वाद।
तो तकदीर बदल देती है मां।।
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