बंद होते हवाई अड्डे: हवा हवाई होती हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा

बंद होते हवाई अड्डे: हवा हवाई होती हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा

 

 निर्मल रानी

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में सूरत में पहली बार कहा था कि सरकार का लक्ष्य है कि ‘हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई यात्रा करे’। मोदी ने अक्टूबर 2025 में नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट उद्घाटन पर भी यही दोहराया कि 2014 से उनका सपना था कि ‘हवाई चप्पल वाला भी हवाई सफ़र करे’। बेशक प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य ग़रीबों को हवाई यात्रा मुहैया कराने की सोच को दर्शाता है।इसी मक़सद से “उड़ान” योजना की शुरुआत की गयी थी।’UDAN अर्थात उड़े देश का आम नागरिक। इस योजना का उद्देश्य छोटे शहरों, टियर-2 और टियर-3 इलाक़ों को हवाई संपर्क से जोड़ना और हवाई यात्रा को सस्ता बनाना था।

आंकड़ों के मुताबिक़ 2014 में भारत में लगभग 74 सक्रिय हवाई अड्डे थे जिनकी संख्या 2026 के प्रारंभ तक बढ़कर 160-162 तक हो गयी। इनमें से ‘उड़ान योजना’ के अंतर्गत एयरपोर्ट, हेलीपोर्ट और वॉटर एयरोड्रोम सहित 93 हवाई अड्डे या तो नए विकसित किये गये या फिर उन्हें पुनर्जीवित किया गया। इनमें से अधिकांश नए या अपग्रेडेड हवाई अड्डे देश के अनेक छोटे शहरों में हैं। गोया कुल मिलाकर गत 10-12 वर्षों में 90 से अधिक नए अथवा सक्रिय हवाई अड्डे जोड़े गए हैं।

बताया जा रहा है कि सरकार का लक्ष्य 2047 तक देश भर में 400 से अधिक हवाई अड्डे बनाना है ताकि हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई यात्रा कर सके अर्थात ग़रीबों का सस्ती हवाई यात्रा का सपना साकार किया जा सके।

परंतु पिछले दिनों देश के केवल एक ही राज्य उत्तर प्रदेश से प्राप्त ख़बरों के अनुसार 2021 के बाद ‘उड़ान योजना’ के अंतर्गत शुरू किये गये 7 नए हवाई अड्डों में से 6 पर नियमित कामर्शियल उड़ानें बंद हो चुकी हैं। धार्मिक पर्यटन के चलते इस समय केवल अयोध्या स्थित महर्षि बाल्मीकि अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा ही सक्रिय है।

हालाँकि अयोध्या का यह हवाई अड्डा भी आधिकारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा तो ज़रूर घोषित किया गया है परन्तु ‘ अंतर्राष्ट्रीय ‘ शब्द केवल नाम तक ही सीमित है। वास्तव में अयोध्या का यह महर्षि बाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा वर्तमान में केवल भारत के भीतर सीमित घरेलू उड़ानें ही संचालित करता है और अभी तक किसी दूसरे देश के लिए यहाँ से अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें शुरू नहीं हुई हैं। अलबत्ता यहाँ से संचालित कुछ स्वदेशी मार्गों जैसे कोलकाता, पटना आदि की उड़ानें भी अस्थायी रूप से बंद ज़रूर हो चुकी हैं।

केवल उत्तर प्रदेश देश में जिन हवाई अड्डों से उड़ानों का संचालन फ़िलहाल बंद हो चुका है उनमें कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट,आज़मगढ़ एयरपोर्ट,चित्रकूट एयरपोर्ट,श्रावस्ती एयरपोर्ट, मुरादाबाद एयरपोर्ट तथा अलीगढ़ एयरपोर्ट के नाम उल्लेखनीय हैं।

इसी तरह पंजाब में पठानकोट व लुधियाना, सिक्किम में पेक्यांग,गुजरात के भावनगर,छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर,ओड़ीसा का राउरकेला, मध्य प्रदेश का दतिया, कर्नाटक का कलबुर्गी व हिमाचल के शिमला के हवाई अड्डों के बंद होने की ख़बरें हैं। सैकड़ों करोड़ की लागत से बनाये गये यह हवाई अड्डे कहीं कम पैसेंजर ट्रैफ़िक के कारण अर्थात यात्रियों की कमी के चलते बंद करने पड़े तो कहीं ख़राब दृश्यता , इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम की कमी या एयरलाइंस कंपनियों की संचालन में रुचि न होने के कारण बंद करने पड़े। कहीं पास के बड़े हवाई अड्डों के कारण यात्री न मिलने की वजह से बंद कर दिये गए तो कुछ तकनीकी व इंफ़्रास्ट्रक्चर समस्याओं जैसे छोटे एयरपोर्ट पर हैंगर, फ़्यूल , स्टाफ़ की कमी के कारण भी बंद हुये।

एक अनुमान के अनुसार UDAN के अंतर्गत बिना किसी उड़ान के ही इन 15 नॉन-ऑपरेशनल एयरपोर्ट्स के रखरखाव और सिक्योरिटी पर पिछले 8 वर्षों में लगभग 878-900 करोड़ रूपये ख़र्च किये जा चुके हुए हैं जबकि कुल UDAN एयरपोर्ट्स के विकास पर 4,600 करोड़ से भी अधिक ख़र्च होने का अनुमान है। परन्तु सरकार को इससे कोई लाभ नहीं हुआ। इसी तरह एयर पोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया AAI के 81 एयरपोर्ट्स पर पिछले 10 वर्षों में 10,853 करोड़ के कुल घाटे का अनुमान है। कहना ग़लत नहीं होगा कि इससे योजना की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है।

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या बंद होने वाले हवाई अड्डों या घाटे में चलने वाले हवाई अड्डों को शुरू करते समय या इनकी योजना बनाते वक़्त क्या इस बात का सही आंकलन नहीं किया गया कि यह हवाई अड्डे भविष्य में सुचारु रूप से संचालित हो सकेंगे या नहीं ? क्या वजह है कि कल की यह लोकलुभावन योजनायें आज मात्र ‘सफ़ेद हाथी ‘ बनकर रह गयी हैं ? एक सवाल यह भी है कि ‘हवाई चप्पल वाले हवाई यात्रा करें’ जैसी लोकलुभावन बातें कर इस तरह की योजनायें केवल चुनावी लाभ लेने के कारण बनाई गयी थीं ?

साथ ही एक सवाल यह भी कि जिस देश में रेल व बस जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्थाओं में सुधार की भारी ज़रूरत हो,जहां अभी तक ट्रेन में यात्रियों को समय पर आरक्षित सीटें उपलब्ध न हो पाती हों,हद तो यह है कि अनेक दूरगामी ट्रेन्स में पैर रखने,खड़े होने यहाँ तक कि यात्रियों के डिब्बों में घुस पाने तक की जगह न मिल पाती हो,जहां आज भी यात्री ट्रेनों में लटककर और अपनी जान को ज़ोखिम में डालकर यात्रा करने को मजबूर हों वहां इस तरह की शर्मसार कर देने वाली सार्वजनिक परिवहन व्यवस्थाओं में सुधार करने व इन्हें व्यवस्थित करने के बजाये ऐसे नये हवाई अड्डे बनाना जोकि शीघ्र ही बंद भी करने पड़ जायें,क्या ऐसा क़दम जनता के पैसों की बर्बादी नहीं है

? इन सबके अतिरिक्त यह भी माना जा रहा है कि बिना ज़रुरत के नये हवाई अड्डे शुरू करने के पीछे का एक मक़सद इनके संचालन से सत्ता के नज़दीकी समझे जाने वाले उद्योगपतियों व कार्पोरेट्स को आर्थिक लाभ पहुंचाना भी है।

बहरहाल देश में लगातार बंद होते जा रहे नव सांचालित हवाई अड्डे इस निष्कर्ष पर तो पहुँचने के लिये काफ़ी हैं कि हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा करने का जो ‘लोकलुभावन ढिंढोरा पीटा जा रहा था वह फ़िलहाल हवा हवाई साबित होता जा रहा है।