बात-बेबात
जैसे कोई हॉरर फिल्म चल रही हो
विजय शंकर पांडेय
वाराणसी में बिजली अब सिर्फ चमकती नहीं है, मौके बेमौके मजाक भी करती है। “अमर उजाला” की खबर पढ़कर लगा कि वाराणसी में बिजली का स्मार्ट मीटर नहीं, कोई स्टैंडअप कॉमेडियन अपनी कलाबाजी दिखा रहा है।
यहां उपभोक्ता का बिल माइनस में चला जाए तो भी यूपीपीसीएल का मैसेज आता है—“समय से जमा नहीं किया तो कनेक्शन काट देंगे।” मतलब आप कंपनी को पैसा दे रहे हों या कंपनी आपको—डांट हमेशा आपके ही हिस्से में है!
सोलर लगवाने वालों ने सोचा था कि सूरज से दोस्ती कर लेंगे, लेकिन यूपीपीसीएल ने बता दिया—“दोस्ती हमारी चलेगी, सूरज की नहीं।” सरप्लस बिजली ऐसे उठा ली, जैसे मोहल्ले का दबंग आपके घर की छत से पतंग भी बिना पूछे ले जाए, और बदले में दो रुपये थमा दे—“लो भाई, मेहनताना, झालमुड़ी भी दस के भाव है, कम से कम टॉफी ही खा लेना!” विडंबना यह है कि इसकी भनक तक नहीं लगने दी जाती उपभोक्ताओं को।
अब आप सोलर लगवाने का जो अपराध किए हैं, उसके एवज में बैंक का लोन भी चुकाइए और बिजली का बिल भी।
ऊपर से पोस्टपेड से प्रीपेड का ऐसा परिवर्तन हुआ जैसे लोकतंत्र से सीधे “लॉटरी तंत्र” में एंट्री। आधी रात को SMS आता है—“रिचार्ज करो वरना अंधेरा कायम हो जाएगा!” आम आदमी घबराकर मोबाइल ढूंढता है, जैसे कोई हॉरर फिल्म चल रही हो।
कुल मिलाकर वाराणसी में बिजली नहीं, किस्मत जल रही है—और बिल? वो तो बस कॉमेडी का पंचलाइन बन चुका है!
अंधेर नगरी में पहले तो एकमुश्त थोक के भाव में बिना किसी अनुमति के उपभोक्ताओं को पोस्टपेड से प्रीपेड में कन्वर्ट कर दिया गया। अब कहा जा रहा है कि प्री-पेड अनिवार्य नहीं है। अब इनमें जो प्रीपेड का सरदर्द नहीं पालना चाहते, वे कब पोस्टपेड में तब्दील होंगे? किसकी चिरौरी विनती करनी होगी?
पोस्टपेड इसलिए जरूरी है कि निर्धारित तिथि पर बिल जमा करने की सहूलियत रहे। प्रीपेड में चिरकूट की तरह कभी भी, यहां तक कि आधी रात गए भी एसएमएस टपक जाता है।
बिजली विभाग बिल का प्रारूप ऐसा बनाया है कि उसे पढ़ने समझने के लिए कोचिंग सेंटर ज्वाइन करना पड़ेगा।
आम लोग पाई पाई जोड़ कर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं। नेताओं और अफसरों की तरह उनकी आमदनी के कई स्रोत नहीं है।
कुछ तो रहम कीजिए…..
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लेखक – विजय शंकर पांडेय
