खुशी की दौड़ में क्यों पिछड़ गया भारत?
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प्रकृति, रिश्तों और संतुलन से मिल सकता है समाधान
डॉ रीटा अरोड़ा
भारत को हमेशा से संस्कृति, परिवार और आध्यात्मिकता का देश माना जाता रहा है। समृद्ध पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपरा हमारी पहचान रही है। हाल ही में जारी ‘विश्व हैप्पीनेस रिपोर्ट’ ने एक बार फिर हमें आईना दिखाया है। 147 देशों में भारत का 118वां स्थान चिंताजनक है। फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड जैसे देश लगातार शीर्ष पर बने हुए हैं। सवाल उठता है-जिस देश ने दुनिया को ‘योग’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश दिया, वह खुद खुशी के पैमाने पर इतना पीछे क्यों है?
इसका सबसे बड़ा कारण हमारी सफलता की बदलती परिभाषा है। हमने खुशी को भौतिक संपदा और आर्थिक उपलब्धियों से जोड़ दिया है। एक हालिया सर्वे के अनुसार, शहरी भारत की लगभग 60% आबादी काम के दबाव के कारण ‘बर्नआउट’ का शिकार है। हम ऐसी दौड़ में हैं जहाँ बड़ा घर और ऊँचा वेतन तो मिल रहा है, लेकिन मानसिक शांति पीछे छूटती जा रही है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, हर सात में से एक भारतीय मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ लगभग खत्म हो चुका है। जहाँ स्कैंडिनेवियाई देशों में सप्ताह में 35-37 घंटे काम सामान्य है, वहीं भारत में 50-60 घंटे काम करना आम बात है। इसके बाद बचा समय मोबाइल और सोशल मीडिया में बीतता है, जिससे वास्तविक मानवीय संवाद कम हो रहा है।
भारत की असली ताकत उसका पारिवारिक ताना-बाना रहा है। संयुक्त परिवारों की परंपरा भावनात्मक सहारा देती थी, लेकिन शहरीकरण ने हमें एकल परिवारों में बाँट दिया है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार, अकेलापन और पारिवारिक तनाव मानसिक समस्याओं के प्रमुख कारण बन रहे हैं। हम एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं।
एक और महत्वपूर्ण कारण है प्रकृति से दूरी। जिन देशों में खुशी का स्तर ऊँचा है, वहाँ लोग प्रकृति के करीब रहते हैं। साफ वातावरण और हरियाली उनके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है। भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और प्रदूषण ने हमें प्रकृति से दूर कर दिया है, जिससे तनाव और असंतोष बढ़ रहा है।
स्पष्ट है कि समस्या जटिल जरूर है, लेकिन समाधान संभव है। सबसे पहले, हमें मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात करनी होगी। इसे कमजोरी नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति के रूप में स्वीकार करना होगा। कॉरपोरेट जगत में ‘मेंटल हेल्थ लीव’ और तनाव प्रबंधन कार्यक्रमों को बढ़ावा देना जरूरी है।
दूसरा, हमें प्रकृति से जुड़ाव बढ़ाना होगा। शहरों में ‘अर्बन फॉरेस्ट’ और सामुदायिक पार्कों को बढ़ावा देना चाहिए। तीसरा, योग और ध्यान को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा।
इसके साथ ही, परिवार के साथ समय बिताने की आदत को फिर से जीवित करना होगा। सप्ताह में एक दिन ‘नो गैजेट डे’ जैसी पहल रिश्तों को मजबूत कर सकती है।
अंततः, जीडीपी किसी देश की आर्थिक स्थिति जरूर बताती है, लेकिन लोगों की मुस्कान नहीं। जब तक हम अपनी प्राथमिकताओं में ‘स्वयं’, ‘परिवार’ और ‘मानसिक संतुलन’ को स्थान नहीं देंगे, तब तक वास्तविक खुशहाली संभव नहीं है।
अब समय आ गया है कि हम ‘क्या कमाया’ से आगे बढ़कर ‘कितना जिया’ पर ध्यान दें-यही भारत की असली समृद्धि और खुशहाली का मार्ग है।
