प्रतिभावान, धैर्यवान और दूरदर्शी नेता – ऊधम सिंह राठी

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग – 113

प्रतिभावान, धैर्यवान और दूरदर्शी नेता – ऊधम सिंह राठी

सत्यपाल सिवाच

उत्तरप्रदेश के मेरठ जिले पाथौली गाँव में 5 मार्च 1961 को जन्मे ऊधम सिंह राठी बचपन से ही होनहार हैं। माँ श्रीमती सोनबीरी और पिता श्री निरंजन सिंह के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हुईं। बेटे को ऊधम सिंह नाम दिया। इससे लगता है कि जागरूक माता-पिता आजादी के योद्धाओं से खास लगाव था। परिवार का निर्वाह कृषि पर आधारित था। इसलिए बचपन में ऊधम सिंह कठोर और परिश्रम का जीवन जीने के अभ्यस्त हो गए थे। बेटे ने सन् 1976 में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो पिता ने उन्हें डॉक्टर बनाने की इच्छा से मेरठ पढ़ने भेजा, लेकिन उस समय के राजनीतिक दौर में ये छात्र आन्दोलन के संपर्क में आ गए और आपातकाल के बाद छात्र संघ के चुनाव को लेकर आन्दोलन में कूद पड़े। फिर डॉक्टर तो नहीं बने लेकिन एम.एससी. (स्टेटिस्टिक्स), एम.कॉम, एम.ए. (इकॉनॉमिक्स), एम.एड. और पीजीडीसीए आदि डिग्रियां लेकर अपनी योग्यता का श्रेष्ठतम प्रदर्शन किया।

वे 1977 में छात्र संघ के निर्वाचित अध्यक्ष रहे। सन् 1978 में सुनीत चोपड़ा से संपर्क के बाद एस.एफ.आई. में राज्य उपाध्यक्ष बनाए गए। उन्हें 1978 से 1983 तक जिला सचिव और 1984 में जिला प्रधान रहे। इसी दौरान वे कार्ल मार्क्स के विचारों के अनुयायी होकर माकपा से जुड़ गए तथा अध्यापक लगने तक वे माकपा के मेरठ जिला सचिवमंडल के सदस्य रहे।

2 नवम्बर 1985 से 24.12.1986 तक मेलाराम हाई स्कूल करनाल में विज्ञान अध्यापक रहे। 26.12.1986 से वे हरियाणा में विज्ञान अध्यापक नियुक्त होकर अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ के महासचिव बने। इस समय उन्होंने अस्थायी शिक्षकों को हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के साथ जोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई। वे 24.10.1995 तक विज्ञान अध्यापक रहे और 25.10.1995 से 31.03.2019 तक कॉमर्स विषय के प्राध्यापक रहे। वे 31 मार्च 2019 को डाइट शाहपुर जिला करनाल से सेवानिवृत्त हुए। वे 1987-91 तक अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ के महासचिव रहे और इसी हैसियत से हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य रहे। उन्हें 1994-96 सत्र में अध्यापक संघ का जिला सचिव चुना गया और वे 1996 से 2000 तक दो राज्य कोषाध्यक्ष रहे। इस अरसे में सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा जिला कार्यकारिणी करनाल के सदस्य भी रहे। वे 2006-07 जिला साक्षरता समिति के सचिव रहे तथा जिले में ज्ञान विज्ञान आन्दोलन के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं।

छात्र जीवन में सक्रियता के साथ ही उत्पीड़न की कार्रवाइयों से रूबरू होने का सिलसिला भी चल पड़ा था। उन्हें 1978-83 तक अनेक बार गिरफ्तार किया गया और दो बार जेल में रहे। सन् 1981 में छात्रावास से निष्कासित कर दिया गया। सन् 1982 में कॉलेज से निलंबन और 1983 में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सन् 1993 में उनकी सेवाएं बर्खास्त कर दी गई और 1997 के पालिका आन्दोलन और 1998 के नर्सिंग आन्दोलन में सस्पेंड किया गया। वे उत्पीड़न की परवाह किए बिना सक्रिय रूप से लगे रहे। आन्दोलनों के समझौते के साथ उत्पीड़न की कार्रवाइयां भी निरस्त होती रही।

ऊधम सिंह राठी के कॉलेज दौर के सहपाठी और छात्र आन्दोलन में साथ ही निष्कासित किए गए  राजकुमार सांगवान अब बागपत के सांसद हैं। उनके एक मित्र प्रमोद कुमार सेशन जज हैं। साक्षरता अभियान के समय देवेन्द्र सिंह, राकेश गुप्ता, बलबीर सिंह मलिक, रोहतास खरब, लाजबीर सिंह आदि वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क रहा है। बाद में लाजबीर सिंह के अलावा किसी अन्य अधिकारी से मुलाकात नहीं हुई। कभी किसी नेता या अधिकारी से निजी नहीं निकलवाए।

संगठन के बारे में टिप्पणी करते हुए वे बताते हैं कि उन्होंने 2000 में अध्यापक संघ में सक्रिय भूमिका से विशेष कारण से अलग कर लिया था। वे संगठन को जरूरी मानते हैं। औपचारिक गतिविधियों तक सीमित रहने के चलते अब जैसा जज्बा न रहने का उन्हें मलाल है। उन्हें भरोसा है कि यदि तत्परता, लगन और हालात के अनुरूप आगे बढ़ा जाए तो पुनः बड़ा आन्दोलन खड़ा हो सकता है।

परिवार में उनकी पत्नी सुश्री मुकेश रानी, दो बेटियां और एक बेटा हैं। उनका विवाह छात्र जीवन में ही सन् 1981 में हो गया था। बड़ी बेटी एम.कॉम. हैं और आईटीआई तरावड़ी में कम्प्यूटर इंस्ट्रक्टर हैं। छोटी बी.ए.एम.एस. और बिलासपुर यमुनानगर में क्लीनिक चलाती हैं। दोनों बेटियां विवाहित हैं। बेटा आईआईटी रोपड़ से पी.एचडी. कर रहा है जो एकाध महीने में पूरी हो जाएगी।

यादों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि पढ़ते हुए राजनीतिक जागरूकता बढ़ी तो छात्र संघ के चुनाव करवाने के लिए सक्रिय हो गए। मेरठ कॉलेज में छात्र संघ का अध्यक्ष चुने जाने के बाद कामरेड सुनीत चोपड़ा से संपर्क हुआ तो एस.एफ.आई. में शामिल हो गए। उस समय प्राचार्य के द्वारा बनाए गए मुकदमे उनकी सेवानिवृत्ति के बाद समाप्त हो गए। सन् 1982 के एस.एफ.आई. के बनारस सम्मेलन के समय जेल में रहते हुए उन्हें उपाध्यक्ष चुना गया था। वे पढ़ते समय ही वामपंथी विचारों से प्रभावित हो गए थे और 1979 में सीपीआई(एम) के सदस्य बन गए। बाद में उन्हें जिला सचिवमंडल में भी लिया गया। सन् 1981 में कानपुर में हुए राज्य सम्मेलन में उन्हें प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने का मौका मिला। उस समय कामरेड बी.टी.रणदिवे, कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत और मेजर जयपाल सिंह के विचार सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। विशेषकर मेजर जयपाल से नजदीकी सम्बन्ध बन गया। सन् 1982 उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली आना जाना कम हो गया। सन् 1983 में सीटू की अखिल भारतीय कांफ्रेंस में वालंटियर के रूप में शामिल हुआ। 1981 में मुम्बई और 1984 में दमदम सम्मेलनों में शामिल रहे। वे अगस्त 2000 में एसटीएफआई के साल्ट लेक कोलकाता सम्मेलन में भी शामिल थे। छात्र जीवन से अब तक जिम्मेदारी मिलने पर मुंह नहीं चुराया लेकिन कभी स्वार्थ या पद के पीछे नहीं भागे।

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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