संतान और मां का संबंध बेजोड़ है। मां बच्चे को जन्म देती है, सुरक्षा और संरक्षण देती है। जब बच्चा चलना सीखते हुए लड़खड़ाता है तो मां सहारा देती है। धरती ने भी मानव जाति को सहारा दिया है शायद इसलिए उसको भी “धरती मां” कहा गया है। मां जननी है, उसे देवी की संज्ञा भी दी गई है। मां के सैकड़ो रूप हैं। अलग-अलग युगों में मां की अलग भूमिकाएं भी रही हैं। सीमांत भारतीय किसान समाज में मां की हैसियत,भूमिका और जीवन क्या है? वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की यहां प्रस्तुत कहानी ‘मां’ हमें उसके जीवन और सामाजिक माहौल की एक झांकी दिखाती है। संपादक।
कहानी
माँ
ओमसिंह अशफ़ाक
वह माँ थी, जी नहीं वह गोर्की के नायक पावेल की माँ नहीं थी। न ही वह भगतसिंह की माँ थी, वह तो साधारण ग्रामीण महिला थी। अनपढ़ थी, धर्म-भीरु थी। हनुमानजी को सलाम करती थी। सैयद पर ज्योत जला़ती थी। होली-दीवाली, तीज-त्यौहारों पर सभी देवी-देवताओं की मनौती करती थी। फिर भी पीर-परमुख उससे बहुत प्रसन्न ना थे। सुबह-शाम चक्की-चूल्हा कूटती थी। और दिनभर खेत-क्यार में देह गला़ती थी। देर रात गये रुखी-सूखी खाकर खाट में पड़ रहती थी। यह उसका साल दर साल चलने वाला रूटीन था।
कभी वह घोर स्वार्थी थी, कभी अति परोपकारी थी। कभी अत्यन्त झगड़ालू थी, तो कभी परमदयालु थी। सौतेला पति उसे डांटता था। सौतन ताने कसती थी। सास उस पर बिगड़ती थी, तो ससुर उसे चुमकार देता था। बेटे उससे झगड़ते थे। बहुएं नाक-भौं सिकोड़ती थीं। उसके बावजूद भी वह संतुलन बनाये रखती थी। क्योंकि वह मां थी। वह पांच बच्चों की मां थी।
परसों वह मर गई। कोई अनहोनी नहीं हुई। एक न एक दिन सभी ने मरना है। पर चूल्हे-चक्की पर असर पड़ा, खेत-क्यार का धंधा बन्द रहा। उसकी अहमियत का कुछ अन्दाज़ पड़ा। मालूम पड़ा कि वह सिर्फ मां नहीं थी। एक कमाऊ बैल भी थी। कामधेनु गाय भी थी, उसके भूतकाल की चर्चा हुई। कई परतें खुलीं। पता चला कि बचपन में वह बिना मां की बच्ची थी। भाभी के आंगन में पली़-बढ़ी थी। मां का दुलार उसे नसीब न हुआ था।
यौवन की चौखट पर पैर रखते ही उसका विवाह हो गया था। पति के प्यार से वह संतृप्त होने लगी थी। वात्सल्य के अभाव की कचोट खोने लगी थी। अपने संभावित बच्चे में उसका मोह पल रहा था। तभी वह विधवा हो गई। पति को महामारी निकल गई। उसका दुभाग्य फिर लौट आया था। मन में फिर उदासी छा गई। दुनिया वीरान नज़र आने लगी। वह कुएं में कूद कर मर जाना चाहती थी, तभी गर्भ में पल रहे बच्चे का ख्याल आया। निश्चय किया कि वह अपने लिए नहीं, अपने बच्चे के लिए जिंदगी के दुर्भाग्य से लड़ेगी, पलायन नहीं करेगी।
उसने अपने पहले बच्चे को जन्म दिया, कठिन प्रसव पीड़ा सही। गांव की नानकी दाई ने कहा कि जच्चा-बच्चा में से सिर्फ एक को बचाया जा सकता है। सुनकर ज़ख्मी शेरनी की तरह तड़प उठी थी- ‘मैं मरूं,चाहे जीऊं। मेरे बच्चे को कुछ हो गया तो तुझे मरकर भी माफ़ नहीं करूंगी नानकी। आज तेरा इम्तहान है, मेरे बच्चे को बचा ?’ कठिन घड़ी किसी तरह टल गई थी। मां और बेटा दोनों संकट से उबर आए थे।
मास-ससुर को अपने खानदान की आबरू का भय था। उसके भाई अपने फर्ज़ से उऋण होना चाहते थे। उसे अपने बच्चे के सरंक्षण की चिन्ता हो गई थी। सबके समझाने पर उसने अपने देवर का पतित्व स्वीकार लिया था। उसकी उलझने सुलझने के बजाय और उलझ गई। पहले गृहस्थ के रिश्तों में तनाव बढ़ा, सौतन कटाक्ष करने लगी क्योंकि वह व्याहता जो नहीं थी। वह कभी दाम्पत्य का सुख नहीं भोग पाई, हालांकि बच्चे कुल मिलाकर पांच हो गये थे। बड़ा प्रहलादसिंह, मंझला सेवाराम और छोटा रामकिशन। छोटी दो लड़कियां थी, भतेरी और भरपाई। भतेरी के जन्म के साथ ही सन्तान की तरफ से उसका मन संतुष्ट हो गया था, लेकिन तीन साल बाद जब भगवान ने भरपाई को भी भेज दिया तो वह तौबा करने लगी थी।
फिर उसके बच्चों से पक्षपात होने लगा था। इस मसले पर वह समझौता नहीं कर सकती थी। खूब हुज्जत होती। कई बार महाभारत टल जाता, कई बार कुहराम मच जाता। हर बार वह रणक्षेत्र के बीच खड़ी होती-दधीचि की तरह अपने दो मुट्टी हाड़ लिये। मुर्गी की तरह पंख पसार कर अपने बच्चों को समेट लेती। एक दिन अड़ियल घोड़े की तरह अड़ गई थी-‘धरती नीचे की ऊपर हो जाये; चाहे सूरज पूरब से पच्छम उग जाए, मैं अपने लड़के को ढोर चराने नहीं भेजूंगी। इसके बाप नहीं तो क्या ? – मैं तो जिन्दा हूं। किसी का दिया नहीं खाती, खेतों में हाड़ पेल़ती हूँ। इसकी बेटी स्कूल जाती है, तो मेरा बेटा भी कल से स्कूल जाया करेगा।’ इशारा सौतन की तरफ़ था। यह उसकी पहली जीत थी।
एक दिन प्रहलाद ने माँ के क्रोध की पराकाष्ठा भी देखी। उसका रौद्र रूप देखकर खौफ होता था। माँ ने प्रहलाद को तीन-चार घौल जड़ दिये थे। और वह फूट-फूटकर रोयी थी। लड़का सहम गया था। माँ को पहले कभी ऐसे बिगड़ते नहीं देखा था। वह हैरान था कि हमेशा दुलारने वाली माँ आज इतनी कठोर कैसे हो गई है? पीठ पर पड़ी कडुल्ले की मार भूलकर वह रोती हुई माँ के पास गया। वह माँ का यूं रोना सह नहीं सका। जाकर गोद में दुबक गया। सुबकते हुए अपना अपराध स्वीकार कर लिया था। तभी मां ने उसे अपने सीने से लगा लिया। सिर से पीठ तक हाथ फेरकर पुचकारा। मन ही मन पश्चाताप करने लगी। माँ का क्रोध अदृश्य हो गया था।
परन्तु प्रहलाद पढ़ाई में नहीं चल सका। आठवीं में ही तीन बार फेल हो गया। कोई पथ-प्रदर्शक नहीं था। बोर्ड की परीक्षा थी। वह आवारा लड़कों की संगत में पड़कर सिनेमा देखने की लत लगा बैठा था। लिहाज़ा घर बैठा लिया गया। शुरू-शुरू में प्रहलाद खेती के काम में भी नहीं चला। दो दांत बछड़े की तरह खैड़ मारता रहता। छौल में ईंख की पात्ती उसकी उंगलियां चीर डालतीं। और खलिहान में उसकै तूड़ चुभने लगते। नरम चमड़ी जेठ की लूह में झुल़स रही होती। लेकिन क्या किया जा सकता था ? यही किसान की नियति थी। दो बार वह घर से भाग गया। दस-बीस दिन मामा-फूफी के यहां बिताए। लेकिन ऐसे कब तक चल सकता था ? जब वहाँ भी काम में घसीटा जाने लगा तो घर की तरफ कूच किया। कुछ अरसे बाद प्रहलाद के शरीर को भी रंगत बदलनी पड़ी। बिना काम-धाम किये घर का गुजारा चल नहीं सकता था। सो, रोते-झींकते प्रहलाद खेती के काम में जुट गया। अब वह दूसरे सैकड़ों लोगों की तरह साधारण किसान था। खेत की डौल़ पड़ोसी की तरफ धकिया देना और नहर के औसरे में बेईमानी करना; उसके लिए सामान्य बात थी। इन्हीं मुद्दों पर कई बार खूनी संघर्ष की नौबत आ जाया करती थी, पर आदत जो बन गई थी।
डेढ़ पहर रात शेष रहती, तभी माँ चक्की झौ डालती। धड़ी-चार सेर चून पीसकर डंगर-ढोरों को सान्नी डालती। तब तक चूल्हा-बुहारी का समय हो जाता। फिर मुंह अंधेरे खेत में पहुंच जाती थी। पति की मृत्यु के बाद कभी किसी ने उसे नये वस्त्र पहने नहीं देखा था। गांव-गली वाले कहते थे-बहुत सुघड़ और नेक औरत है, किफ़ायतसार और कमाऊ है। सास ससुर कहते-हां, बिना कमाये किसका पेट भरा है। यहां कोई टाटा-बिरला थोड़े हैं, जो ठाल्ली बिठाकर काम चल जायेगा। अड़ौस पड़ौस वालों ने कहा-भगवान की माया है, पता भी नहीं चला कब उसके बच्चे जवान हो गये। पर उसका मन कहता कि पहाड़-सा युग बीता है। कभी आसपास की औरतें जिक्र छेड़ती तो इतना ही कहतीं कि भगवान जिस हाल में रखे, रहना पड़ता है। भगवान करे ऐसी बिपदा किसी पर न पड़े।
अब वह सुख की सांस लेने लगी थी। ज्येष्ठ पुत्र प्रहलाद और दोनों बेटियों, भतेरी और भरपाई का ब्याह हो गया था, उसके मन में एक विश्राम-स्थली की कल्पना साकार होने लगी थी। बेटे-बहू के दाम्पत्य सुख में वह अपना दुख भूलने लगी थी। पर बहू का स्वभाव अच्छा नहीं निकला। कई बार जली़-कटी सुना देती तो सौतन के दिये ज़ख्मों का दर्द हरा हो जाता। बैठकर अपनी ही क़िस्मत का खोट निकालती। फिर भी वह सन्तुष्ट थी।
सोचती थी-एक बहू गुस्सैल सही। दो बेटे और हैं। पढ़-लिखकर समझदार हो रहे हैं। माँ की दो जून की रोटी किसे भारी होगी? नौकरी लग जायेंगे तो उनके पास जा रहूंगी। इसी तरह पांच-सात साल गुजर गए थे।
मंझला बेटा सेवाराम तो चौदह जमात पास करके बी०डी०ओ० हो गया था; पर इधर घर का दिवाला़ निकल गया था। सीमान्त किसान परिवार था। छोटी खेती थी। उसके ऊपर लड़के की शहर के कालेज में पढ़ाई का खर्चा। कर्ज बढ़ता चला गया। नौकरी हथियाने में चढ़ाई गई दस हजार की रकम ने तो सबकी कमर तोड़ दी थी। बस एक ही आस थी। सेवाराम बड़ी नौकरी लग गया है। कुछ ही अरसे में सब दलिद्दर धो डालेगा !
सेवाराम ने दलिद्दर धोये भी। लेकिन घर के नहीं, खुद के-अपने। हुआ यूं कि बी०डी०ओ० बनते ही बड़ी-बड़ी जगहों से सेवाराम के रिश्ते आने लगे। आखिर एक थानेदार की लड़की से रिश्ता तय हो गया, यह प्रस्ताव खुद सेवाराम की मार्फ़त घर पहुंचा था। घर में भला किसे एतराज हो सकता था ? लेकिन बुढ़िया माँ को शंका जरूर हुई ‘बेटा पुलिस-उलिस की नौकरी ठीक नहीं बतावें हैं। कहीं ऐसा न हो कि बहू का मिज़ाज हमारे घर में खप ना सके।’
‘तुम नाहक चिन्ता करती हो माँ’ सेवाराम ने कहा था- ‘सब कुछ मेरा देखा-भाला है।’ और शादी हो गई थी।
घर की खस्ता हालत के कारण रामकिशन की पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। अव्वल दर्जे में 10वीं पास करके भी घर बैठा था। सोचा, सेवाराम ही अपने पास रखकर कोई नौकरी लगवा देगा। लेकिन दस दिन में ही भाभी को भार लगने लगा था। सेवाराम ने कहा कि जब कोई नौकरी निकलेगी तो वह घर पर चिट्ठी लिखकर बुला लेगा। अभी नाहक यहां बैठने से क्या फायदा? गांव में काम में कुछ हाथ तो बटायेगा। लेकिन जैसा कि होना था, सेवाराम के महकमे में कभी कोई नौकरी नहीं निकली। लम्बी प्रतीक्षा के बाद भी कोई चिट्ठी नहीं आई।
इधर माँ ने सोचा कि सेवाराम कहीं गफ़लत में भूल ही न गया हो ? रामकिशन की नौकरी का ख़याल ही न रहा हो ?
एक दिन जिद करके वह करनाल की मोटर में बैठ गई। सेवाराम के पास जा पहुँची। इतवार का दिन था। सेवाराम अपने ड्राईंगरूम में बैठा दोस्तों के साथ ताश खेल रहा था। हॉली-डे मूड में थे, ह्विस्की का दौर भी साथ-साथ चल रहा था। कालोनी के किसी परिचित ने रिक्शा वाले को हाथ से इशारा करके मकान बताया, तो माँ लपककर सीधी ड्राईंगरूम में जा घुसी। जैसे गोधूलि में चारागाह से लौटी लाग्गड़ गाय खूंटे पर बंधे बछड़े की तरफ
झपटती है। उसने सेवाराम को आंचल में समेट लिया। सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरा तो उसके सजे-संवरे बाल अस्त-व्यस्त हो गये थे। दोस्तों के चौंकने से सेवाराम अनमना सा हो गया। माँ अन्दर बहू-बच्चे को पुचकारने निकल गई थी। सेवाराम ने दोस्तों के मूक प्रश्न का उत्तर दिया मेरे गांव में पड़ोस की ही विधवा है। निस्संतान है, हमें सगे बेटों की तरह मानती है और वे सब बिना ध्यान दिए फिर ताश खेलने लगे थे। अबकी पीस सेवाराम पर ही चढ़ गई थी। माँ ने शायद सुनकर भी क्षमा कर दिया था। उसे बेटे की अफ़सरी का रुतबा बींध गया था। वह अपने आपको कमजोर महसूस करने लगी थी-मेरे लत्ते कपड़े मैले है ना, इसीलिए दोस्तों के सामने तौहीन होती होगी। शायद इसीलिए कह दिया होगा। लेकिन पता नहीं क्यूं अब माँ को सेवाराम नकली-सा लगने लगा था। अचानक पराया-सा हो गया था। वह याद करने लगी कि जिस सम्वत में सेवाराम पैदा हुआ था, बहुत मींह बरसा था। मक्की और कपास की फसल उस साल चौपट हो गई थी। बूढ़ा बैल भी उसी साल मरा था। उसे पक्का याद है, वह उसी साल हुआ था। नहीं, कोई भूल नहीं हो सकती। वह उसका सगा बेटा है-ऐसा सोचकर बार-बार मन को तसल्ली देती। लेकिन फिर भ्रम उसे घेर लेता था।
सप्ताह बाद एक दिन तो मानों कहर का पहाड़ ही टूट पड़ा। बेटे को वह बर्दाश्त कर सकती है। वह उसका अपना खून है। लेकिन उसकी बहु किसी के सामने उसे अपने पति की मौसी की बेसहारा रिश्तेदार बताये – यह कैसे सहन हो सकता है।
माँ के तन-बदन में आग लग गई। बहू को कुछ कहते न बन पड़ा। जब अपनी ही औलाद दगा कर जाए तो पराई से क्या कहें।
वह अपनी पोटली उठा, मोटर में बैठ, सेवाराम से मिले बगैर ही गांव चली आई। अपने दुर्भाग्य पर पछताने लगी कि वह गांव छोड़कर क्यूं गई। अपनी ठौर पड़ा पत्थर भारी होता है-बड़े-बड़ेरों ने कोई झूठ थोड़े ही कहा है। दोष उसी का है। उसे वक्त देखकर चलना चाहिए। हुश्यिारे के लड़के की बहू ने गढी वाली यानी सास की क्या कम दुर्गति बनाई है? हाय राम कैसा टेम आ गया है?
प्रहलाद की बहू ने बताया कि कल ही रामकिशन की चिट्ठी आई है। वह मोदीनगर में लालटेन बनाने की फैक्ट्री में नौकरी लग गया है।
माँ समाचार सुनकर प्रफुल्लचित्त हो गई। पूछा- कब? बहू ने बताया कि तुम्हारे जाने के अगले ही दिन वह चला गया। ‘और क्या क्या लिखा है’- माँ बेसब्री से पूछने लगी। ‘बहुत बातें लिखी है’ बहू बताने लगी। बोलता है, फैक्ट्री वाले अख़बारों में कहते हैं- मोदी लालटेन चकाचौंद रोशनी देती है। पर यहां ससुर मजूरों की कोठरियों में धुंघियाता अंधेरा झोट्टे की तरह अड़ा है। साले़ फोकट की हांकते हैं..पर अभी एक साल चुप रहना होगा। तब नौकरी पक्की होगी। परमेसरे ने बताया है कि चूँ चपड़ करने से साले़ कच्ची में ही निकाल देते हैं। पक्का होने ही नहीं देते। अभी वह अपने दोस्त परमेसरे के साथ ही रह रहा है। अलग कोठरी नहीं मिली है। उतना बताकर बहू चौंक गई। बोली पर माँ, उसे कैसे पता चला कि चिट्ठी मिलने तक तुम गांव पहुंच जाओगी। माँ से कहो, चिन्ता न करे। तब माँ को मैं मोदीनगर ले आऊंगा।
माँ की आंखों से सुख-दुखके मिश्रित आंसू निकल गये। लेकिन प्रहलाद की बहू के व्यवहार से वह कौन अनभिज्ञ थी? फिर भी उसके साथ जैसे तैसे निबाह लेती थी। दिल में उठे रंजोगम के ज्वार को अन्दर ही अन्दर पचाकर बोली- ‘यही सोचा होगा कि शहर में कौण सा मां का जी लगने वाला़ है पांच सात रोज बाद आ ही जाएगी।
उम्मीदों के सहारे एक साल गुजरते देर न लगी। रामकिशन को कोठरी मिल गई। आकर माँ को साथ ले गया। खुशी-खुशी रहने लगे। सब्जी खुद छीलता चीरता, आटा भी गूंथ डालता। लेकिन माँ नहीं मानती। जिद करके रोटी खुद ही पकाती। माँ-बेटा दोनों आनन्द से खाते। फिर भी नमक मिर्च कम-ज्यादा होना आम बात थी। लेकिन इसकी परवाह वहां किसे थी ? रामकिशन सोने से पहले माँ के पैर दबा देने की जिद करता पर माँ नहीं मानती- ‘दो-दो बहुएं घर में बैठाकर बेटे से पैर भिचवाऊंगी। सीधे नरक में भेजना चाहता है क्या?’- मां गुस्सा होकर झिड़क देती।
लेकिन यह सहजता अधिक समय तक नहीं चल सकी। उसी मालिक के कपड़े वाले मिल में हड़ताल हो गई। क्लाथ सैक्शन के तीन मजदूर-राधेश्याम, जुम्मन मियां और गोधूराम भी कभी-कभी रामकिशन की कोठरी में खाना खाने लगे।
‘ताई, पालिस्टर-टेरिकाट’ बुनते-बुनते बुढ़ियाने लगे हैं पर ससुर अपने तन पर कभी कमीज़ साबुत ना मिली। ये तो ससुर तिज़ोरी ना हुई, कोई कुआं है जो भर ही ना सके है?’- उनके जुमले ऐसे सटीक लेकिन टेढ़े-मेढ़े होते कि माँ सोचती ही रह जाती। अकेले में रामकिशन से बतियाकर पूछती और उनका तात्पर्य जानकर खूब देर तक हंसी से लोट-पोट हो जाती-मरे, पता नहीं क्या फ़ारसी बतियाते हैं, बिना पूछे कुछ भी पल्ले ना पड़े है-कहकर एक बार फिर अपनी नासमझी पर खुद ही हंस देती।
मिल मालिक का रवैया अड़ियल रहा। महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी पर राजी होने का मतलब था मुनाफे में कमी। नहीं माना। हड़ताल लम्बी खिंचती गई। एक दिन मां ने रामकिशन से पूछा- ‘ये राधेश्याम, जुम्मन और और गोधू किस बिरादरी के हैं?
‘राधे पंडित, जुम्मन मुसलमान और गोधू चमार है।’ सुनकर मा सिहर गई-मरे, ये तो सब एकमएक हुए फिरते हैं। दीन-धरम का भी ख्याल नही करे हैं।
माँ ने किसी मज़दूर के हाथ पंसारी के यहां से एक शीशी गंगाजत मोल मंगाया। पानी में डालकर पिया। कोठरी में छिड़का और फिर दो बूंद बाल्टी में डालकर नहायी। उसने रामकिशन से कुछ न कहा।
लेकिन जब कभी जुम्मन गोधू उसकी कोठरी में खाना खाकर जाते वा पीतल के बर्तनों को भूभल़ में सेंक देकर मांजती। फिर उसने अपने बर्तन अलग रख लिए। अब वह रामकिशन की कटोरी में साग सब्जी डालकर नहीं खाती थी।
इधर माँ बीमार हुई तो रामकिशन ने जी-जान से उसका इलाज कराया। एक हफ़्ता अस्पताल में भी दाखिल रही। रामकिशन की शिफ्ट होती तो राधे, जुम्मन अथवा गोधू में से कोई एक और कभी-कभी दो भी, उसकी सेवा में रातभर हाज़िर रहते। कभी कोई डाक्टर नब्ज़ देखता, नर्स इन्जेक्शन लगाती, दूसरे मरीज़ के मुंह में इस्तेमाल किये गये थर्मामीटर से ही उसका भी बुखार देखा जाता। उसने महसूस किया कि ये सब उसे जिन्दा रखने के लिए ही तो करते हैं? जुम्मन और गोधू रामकिशन से भी ज्यादा टहल करते हैं। सारी-सारी रात पायंताने बैठे गुजार देते हैं। जब भी आंखें खोलती हूं-‘ताई पानी दूं। ताई दवाई पीलो। ताई थोड़ा दूध गरम करके लाया हूं।’ कहते हुए हाज़िर खड़े मिलते हैं। उसे वे रामकिशन का ही दूसरा रूप लगने लगे। उसकी पवित्रता की अवधारणा बदलने लगी।
कपड़ा मिल का संकट गहराता चला गया। कपड़ा मजदूरों के समर्थन में लालटेन फैक्ट्री की यूनियन को भी हड़ताल करनी पड़ी। और कोई चारा बचा न था। अब मज़दूरों की कोठरियों पर भी ऐर-गैर वक्त गुंडों के हमले होने लगे। माँ भयभीत रहने लगी। किसी अनिष्ट की शंका उसे हर समय सताती रहती। वह रामकिशन को अकेला छोड़ना चाहती न थी, पर इधर रामकिशन के चूल्हे पर बोझ बहुत बढ़ने लगा।
माँ ने दांव फेंका, बोली- रामकिशन रे? भैया मुझे प्रहलाद के बच्चे बहुत सता रहे हैं। अरे, उसका छुटकू रात मेरे कन्धे पर चिपक गया। उतर ही न रहा था, तभी मेरी नींद खुल गई। भोर का सपना, कहते हैं सच होता है। और फिर मुझे तो डाक्टर ने भी बताया है। कहता था-पीलिया में जिगर कमज़ोर हो जाता है। अम्मा जी, गन्ने का रस खूब पीओ ! भला, यहां तो बड़ा गिलास रुपये का देते हैं। क्यूं नाहक पैसे बरबाद करें? गांव में मुफ़्त ही ना पीवेंगे ?’ एक कारण यह भी था कि माँ को गली-मुहल्ले की औरतों की याद आने लगी थी। जिनसे वह अपनी जिन्दगी के दुख-दर्दों का इतिहास बतियाया करती थी। उनका यहां अभाव उसे खलने लगा था। रामकिशन को साथियों ने सलाह दी कि अब माँ को गांव छोड़ आये। यहां यूं भी हड़ताल खिंचती जा रही है, आसार अच्छे नहीं हैं। बेकार में कोई नया लफड़ा न हो जाये। बूढ़े हाड़ हैं। नाहक झंझट हो जायेगा, लेकिन घर पहुंच कर हफ़्ते बाद माँ की हालत बिगड़ गई। चिट्ठी मिलते ही राधे, जुम्मन और गोधू सब साथियों ने रामकिशन को गांव दौड़ा दिया। माँ के स्नेह से वे भी असंपृक्त न रह सके थे।
रामकिशन ने माँ को बचाने की लाख कोशिशें की लेकिन वह जैसे प्रस्थान का निश्चय ही कर चुकी थी। बारी-बारी से गांव के तीनों आर०एम०पी० बुलाये गये। रुअड़ से छाती का सेंक किया। गर्म पानी की बोतल पेट पर रखी। हथेलियों और तलवों पर मालिश शुरु की, लेकिन अबकी बार प्रयत्न सफल न हुए। और परसों वह मर गई।
सेवाराम के पास आदमी दौड़ाया गया, लेकिन छुट्टी का दिन था, और वह फेमिली सहित पिकनिक पर गया हुआ था। रामकिशन और प्रहलाद ने भारी मन से माँ को अंतिम विदाई दी।
दूसरे दिन सेवाराम गांव पहुंचा। दहलीज़, दालान, कोठे में निरर्थक ताक-झांक करता रहा। माँ वहां कहां थी? किवाड़ पीछे खूंटी पर माँ का फटा पुराना तिगना झूल रहा था। नीचे चक्की खामोश खड़ी थी। यह वही तिगना था, जिसे पहनकर मां सेवाराम के पास गई थी। वह तिगने से लिपट कर फूट पड़ा। मां का बिछोड़ा आज उसे बहुत सता रहा था। लेकिन माँ अब भला थी कहाँ ?
(जतन, 15-16, अप्रैल 1988)

अंग्रेजी के वरिष्ठ लेखक एवं आलोचक डॉ एनके नागपाल की यह टिप्पणी कहानीकार के व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई है:
“The story titled ‘Ma’ (The mother) authored by a famous short story writer Om Singh Ashfak is a very poignant tale of a mother with five children–a woman who loses her husband very early and has to live as a second wife of her devar. She does not get respect anywhere.Her eldest son who gets a good government job doesn’t care much for her.Another son who cares for her loses his job.So throughout her life she has to suffer.
She evolves only in one thing–the social evil of casteism. Her attitude towards two of her son”s friends changes when they serve her in her illness.
On the whole the story is a good read.”
-Dr. NK Nagpal, professor and principal retired from IGN college, Ladwa, kurukshetra (Haryana) India.
लेखक के व्हाट्सएप पर प्रतिबिंब मीडिया के नियमित-संजीदा पाठक श्री सुरेंद्र पाल तोमर की निम्नलिखित टिप्पणी प्राप्त हुई है;
“प्रकृति के बाद माँ ही निर्मात्री होती है. परन्तु पुरुष वादी व्यवस्था मे माँ को जो स्थान मिलना चाहिए अहंकार वश रूढ़ि वादी दुनिया मे वह नहीं मिल पाता है.किसी किसी का जीवन कष्ट मे ही गुजर जाता है.
-सुरेंद्र पाल तोमर, भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।