हिंदी वालों में हिंदी भाव क्यों नहीं पैदा हो पाया

हिंदी वालों में हिंदी भाव क्यों नहीं पैदा हो पाया

शंभुनाथ

 

हिंदी एक भाषा ही नहीं एक संस्कृति भी है जिस तरह बांग्ला, मराठी या तमिल भाषाएं ही नहीं संस्कृतियाँ भी हैं। सोचना यह है कि यह कैसी संस्कृति है? इसपर विचार किया जाना चाहिए कि हिंदी वालों के बीच धर्म, जाति, जिला आदि का भाव तो खूब है, हिंदी भाव क्यों नहीं पैदा हो पाया। हिंदी क्षेत्र में ही अंग्रेजों की ’फूट डालो’ नीति सर्वाधित सफल क्यों रही? हम सोच ही नहीं सके कि हमारी भी एक साझी संस्कृति है, साझा जीवन है। जितना कलह और वैर हिंदी इलाकों में है, किसी अन्य प्रान्त में नहीं है!


हिंदी लोगों के बारे में कभी भारतेंदु ने टिप्पणी की थी, ’छोट चित्त, अति भीरु, बुद्धि मन चंचल, विगत उछाह!’ अब उत्साह जरूर बढ़ा– चढ़ा है, ऐश्वर्य भी पहले से काफी बढ़ा है, पर हिंदी सेवा की भाषा से सेवन की भाषा ही ज्यादा है।
हिंदी एक ऐसी गाय है जिसका मुख वाला हिस्सा एक भाई के पास है और थन वाला हिस्सा दूसरे भाई के पास। एक खिलाये जा रहा है और एक दुहे जा रहा है! यह विडंबना भी हिंदी के सिर पर ज्यादा सवार है!
हिंदी दिवस पर सोचना चाहिए कि यदि हिंदी है तो हिन्दी संस्कृति भी है और वह उदार और समावेशी संस्कृति ही हो सकती है क्योंकि हिन्दी वह भाषा है जिसका निर्माण हिंदी क्षेत्र की 49 भाषाओं, उपभाषाओं और बोलियों ने किया है! हिंदी में रूढ़ियां हैं तो रूढ़ियों से विद्रोह भी है। कलह है तो प्रेम का गान भी है।
मुझे लगता है कि हिंदी अपने ही घर में धीरे– धीरे खो रही है, हिंदी ही नहीं इसकी 1300 साल में बनी और विकसित हुई आत्मा भी खोती जा रही है जिसके रचनाकार सरहपा –गोरखनाथ से लेकर कबीर, सूर, मीरा, तुलसी, जायसी, रैदास हैं और भारतेंदु तथा दयानंद सरस्वती जैसे कई व्यक्तित्व हैं, प्रेमचंद– प्रसाद हैं!

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