जसवीर त्यागी की फुटपाथ पर नींद और कुछ अन्य कविताएं

जसवीर त्यागी की फुटपाथ पर नींद और कुछ अन्य कविताएं

फुटपाथ पर नींद
———————

बहुत सारे गरीबों को
फुटपाथ पर
सोते हुए देखा

कुछेक के पास बिस्तर थे
कुछ बगैर बिस्तर

कुछ ने कोई कपड़ा ओढ़ रखा था

कुछ ऐसे भी थे
जिन्होंने खुद को
खुद से ही ढाप रखा था।

दिन और रात
÷÷÷÷÷÷÷÷

कभी दिन बड़ा
और रात छोटी होती है

कभी रात बड़ी
और दिन छोटा होता है

साल में दो दिन
दिन और रात समान होते हैं

हम और तुम
साल के वही दो दिन हैं

उन्हीं दो दिनों में
हम दोनों का संपूर्ण जीवन है।
0000000000000000000

इतिहास
÷÷÷÷÷÷

जवान लड़का
बुज़ुर्ग बाप को कहता है-

आपको कुछ नहीं पता
बूढ़े हो गये हैं आप

लड़के का यह कथन
इतिहास का निषेध करता है

और जिसका इतिहास नहीं होता
उसका कोई भविष्य भी नहीं होता।

 

|| जब तुम थे ||

 

जब तुम थे
तुमसे जुड़ी हज़ार बातें थीं

पर वे शब्द कहाँ थे?
जिनमें उतार पाता
तुम्हारे होने का अहसास

मैं निकल पड़ा
शब्दों की टोह में
इस छोरहीन संसार में

भटकता रहा यहाँ से वहाँ
बड़ी मशक्कत से तराशकर लाया
अपनी अँजुरी में कुछ शब्द

जब लेकर उन्हें
इठलाता हुआ
मुड़ा अपनी राह की ओर

उस समय न जाने तुम
कितनी दूर जा चुके थे।

000000000000000000000000

गुम हुई चीजों की स्मृति
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

जीवन में समय-समय पर
बहुत कुछ गुम होता है

गुम हुई चीजों की स्मृति
ध्यान के द्वार पर खड़ी होकर
संवेदनाओं की साँकल खटखटाती है
उनकी खटखटाहट की आवाज़
देर तक और दूर तक गूँजती रहती है
हमारी स्मृतियों के संदूक में
उनका पहला प्राकृतिक रूप ही सुरक्षित रहता है

गुम हुई चीजें दोबारा मिलती नहीं
कभी-कभी मिल भी जाती हैं
लेकिन!उस रूप में नहीं
जिस रूप में गुम हुई थीं

उनका आकार-प्रकार
भाव-स्वभाव बदल चुका होता है
हमारा अंतर्मन
बदले रूप को स्वीकार नहीं कर पाता
हम गुम हुई चीजों की स्मृति में जीते हैं।

रिश्ते
÷÷÷÷

 

रिश्तों को
समय-समय पर

परिचय के पानी से सींचते रहिये
ध्यान की धूप लगाते रहिये

यदा-कदा
खुशियों की खाद भी जरूरी है

उपेक्षाओं और अनदेखेपन की
आंधियों से बचाते रहिये

रिश्ते पौधों की मानिंद होते हैं
ध्यान न देने पर
मुरझाकर सूख जाते हैं।

 

कई बार
÷÷÷÷÷

 

कई बार उससे बात करने का
मन होता है

फिर सोचता हूँ
वह कोई काम कर रही होगी
संभव है आराम कर रही हो

यह भी हो सकता है
इन सब अनुमानों से इतर
कुछ अन्य कर रही हो
यही सोचकर सब्र करता हूँ
कि वह है इतना क्या कम है?

चाहत की चिड़िया
उससे बात करने को
मन की मुंडेर पर आ बैठती है
और इधर-उधर ताकती है

देर तक बाट जोहने के बाद
जब वह नहीं आती
चिड़िया अगले दिन की
मुलाकात की चाह को पँखों में दबाकर
घोंसले की ओर उड़ जाती है।

Comments

Your email address will not be published.

0