हिन्दी दिवस : बधाई के पीछे छूटा सवाल
रत्ना भदौरिया
आज हिन्दी दिवस है, इसलिए हिन्दी को याद किया जा रहा है। शुभकामनाएँ लिखी जा रही हैं, हिन्दी के गौरव की बातें हो रही हैं, भाषा की दुर्दशा पर चिंता जताई जा रही है। अच्छा लगता है—लेकिन इस सारे उत्सव के बीच एक सवाल लगातार अपनी जगह बनाए रखता है : जिस हिन्दी को हम सार्वजनिक रूप से इतना चाहते हैं, क्या उसे निजी जीवन में भी उतनी ही जगह दी है?

हिन्दी ने हमसे कभी अपना परिचय नहीं माँगा। वह उन लोगों तक भी पहुँची जिन्हें शिक्षा की औपचारिक सीढ़ियाँ नसीब नहीं हुईं। खेत, खलिहान, गलियाँ, चौपालें, रसोई और घर की देहरी—उसने वहीं से मनुष्य को जीवन के अर्थ दिए। उसने किताब से पहले अनुभव को भाषा दी और अक्षर से पहले रिश्तों को। फिर आज जब हम हिन्दी के भविष्य को लेकर इतने चिंतित हैं, तो यह चिंता सबसे पहले हमारे अपने घरों में दिखाई क्यों नहीं देती?
हम बच्चों को दुनिया से जोड़ने के लिए दूसरी भाषाएँ सिखाते हैं, यह आवश्यक भी है; पर क्या उसी उत्साह से उन्हें अपनी भाषा के भीतर भी उतारा है? क्या वे हिन्दी केवल पढ़ते हैं या उसमें अपने मन की बात कह भी सकते हैं? क्या घर में हिन्दी सहज संवाद है या केवल बुज़ुर्गों के साथ बची हुई आदत? हमने बच्चों के भविष्य के लिए बहुत-से दरवाजे खोले, मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी भाषा की खिड़की धीरे से बंद कर दी?
भाषा का संकट यहीं से शुरू होता है—शब्द कम होने से नहीं, संबंध कम होने से।
हम हिन्दी को प्रेमपत्र की तरह साल में एक दिन खोलते हैं और बाकी दिनों में उसे अलमारी में रख देते हैं। सोशल मीडिया पर हिन्दी की महिमा लिखना आसान है; घर में हिन्दी की किताबों को बच्चों की पहुँच में रखना, उनके साथ पढ़ना और उन्हें अपनी भाषा में सोचने की स्वतंत्रता देना उतना आसान नहीं। हिन्दी के सम्मान की माँग करना सरल है; हिन्दी बोलते हुए अपने भीतर बैठे उस संकोच को पहचानना कठिन है, जो हमें अपनी भाषा से अधिक दूसरी भाषा को प्रतिष्ठित मानने के लिए तैयार करता है।
यहाँ समस्या किसी दूसरी भाषा की नहीं है। कोई भाषा हमारी शत्रु नहीं। दुनिया की हर भाषा मनुष्य के अनुभव का एक नया भूगोल खोलती है। संकट तब पैदा होता है जब दूसरी भाषा सीखना अपनी भाषा से शर्म करने का पर्याय बना दिया जाता है। जब अंग्रेजी अवसर की भाषा और हिन्दी पिछड़ेपन की निशानी समझी जाने लगे, तब चोट हिन्दी को कम और हमारी आत्मचेतना को अधिक लगती है।
इसलिए हिन्दी दिवस पर प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमने हिन्दी के लिए कितना कहा; प्रश्न यह होना चाहिए कि हमने हिन्दी के साथ कितना जिया।
क्या हमारे बच्चों के पास हिन्दी की किताब है? क्या उनके घर में हिन्दी में कहानी सुनाने वाला कोई है? क्या वे अपने दुख, प्रेम, क्रोध और जिज्ञासा को हिन्दी में बिना झिझक व्यक्त कर सकते हैं? क्या हमारी मातृभाषा सचमुच हमारी अगली पीढ़ी की भाषा भी है, या हम उसे केवल अपनी पीढ़ी की स्मृति बनाकर छोड़ रहे हैं?
हिन्दी को बचाने के लिए बड़े-बड़े संकल्पों से पहले इन छोटे सवालों के उत्तर चाहिए। भाषा संसदों और मंचों से कम, घरों की आवाज़ों में अधिक बचती है। वह तब जीवित रहती है जब कोई माँ बच्चे को अपनी सहज भाषा में समझाती है, जब कोई पिता उससे दिनभर की बात करता है, जब कोई बच्चा बिना यह सोचे अपनी पहली कविता लिखता है कि वह भाषा उसे आधुनिक बनाएगी या नहीं।
शायद हिन्दी दिवस का सबसे सच्चा उत्सव यही होगा कि आज हम बधाई भेजने से कुछ देर रुकें और अपने घर की ओर देखें। वहाँ हिन्दी कितनी है—और केवल इसलिए नहीं कि हम उसे बोलते हैं, बल्कि इसलिए कि हमने उसे अगली पीढ़ी के लिए जिया भी है।
क्योंकि भाषा किसी सरकारी घोषणा से नहीं बचती, न किसी दिवस की बधाई से। वह तब बचती है जब उसके अपने लोग उसे अपने जीवन से बाहर जाने नहीं देते।
और अगर हिन्दी दिवस पर हिन्दी के नाम पर हजारों संदेश भेजे जाएँ, मगर हमारे अपने घर का बच्चा अपनी ही भाषा में अपने मन की बात कहने से हिचके—तो हमें हिन्दी को बधाई देने से पहले अपने भाषायी आचरण पर सवाल उठाना चाहिए।
शायद यही सवाल हिन्दी दिवस की सबसे जरूरी शुभकामना है।
