तीज : लजा गई गुइयाँ
चंचल बीएचयू
भारत के हिन्दी पट्टी , ख़ासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के “संभ्रांत समाज “की मुग्धाओं का अकेला त्योहार है , जिस पर वे खुले में विशेष कर पुरुषों के बीच इस त्योहार पर नहीं बोलतीं । पूछने पर की यह त्योहार क्या है ?क्यों रखती हैं ? तो वे लजा जाती हैं , कनपटी इंदूरी हो जाती है , आँख झुक जाती है , चेहरे पर एक अजीब सी देदीप्यमान आभा फैल जाती है । यह दोनों में होता है , अबिआही बाला हो और मुग्धा की तरफ़ बढ़ रही हो , या परिपक्व विवाहित मुग्धा हो , लजाती दोनों हैं , मुहफट चुलबुली हो तो शायद मुंहतोड़ जवाब दे दे , और यह मुँहतोड़ काम अक्सर प्रौढ़ाओं या बेपरवाह बुढ़ापा औरतों के पास होता है –
– औघड़बाबा शिव शंकर माफ़िक़ मनसेधू पावे ख़ातिर ! अउर का बदे ?
– हम जैसन ना चाही ?
– आपन मुँह त देख लेता , कहाँ शिव , कहाँ ई मुसबिल्ला कि मूस ? ईही सहूरे त अब तक रुढ़ात पड़ा बाटे , में हरदी ना लगी । गाँव में अक्सर इसी तरह के बेबाक़ संवाद से संसद सज जाती है । गाँव ऐसे ही खलिहर लोगों का गजिन्ह बसावट रहा है पर हास – परिहास जो इंसानी सभ्यता के चलन में रहा है , गाँव में स्थायी रूप से स्थापित रहा , इस संवादी उत्सव में कोई भेद भाव नहीं रहा ।
जाति , संप्रदाय , मज़हब , लिंग , उम्र , ऊँच- नीच कभी भी सामने आकर रोड़ा नहीं बना , उल्टे गाँव के एकजुटता की गाँठ को कस के कसे रहा , गाँव कीअपनी यह खूबी , उसे उम्र देती रही , लेकिन अब यह गाँव आहिस्ता- आहिस्ता अपने ढलान की तरफ़ है ।
विकास के नाम पर शहर के बेजान और सड़े आडंबर को , सीधे सादे गाँव को ओढ़ाया जा रहा है नतीजे में गाँव की आर्थिक और सामाजिक रीढ़ टूट रही है , साथ ही साथ उसकी सांस्कृतिक बुनावट को भी मसक रही है और तो और , उत्सव धर्मी समाज का पुर्ज़ा पुर्ज़ा चटक कर बिखर रहा है ।
तकनीकी विकास जिससे गाँव को जोड़ कर मुख्यधारा में जोड़ने का सपना था , वही गाँव के सामूहिक तत्व को चट कर रहा है । तीज त्योहार अब फीके पड़ने लगे हैं ।
क्या है तीज ? क्या माँग है मुग्धाओं की , जिसे पाने के लिये उन्हें असाध्य तकलीफ़ से गुजरना पड़ता है ? तुर्रा यह कि इस माँग को खुल कर बोलने में , लड़की बोलने में भी मुग्धाओं को आड़ में जाना पड़ता है । इन सवालों को हल् करिए तो पुरुष समाज के सत्ता की क्रूरता , पाखंडी , नक़ली पाण्डित्य की पोल खुल जाती है ।
हमारे जितने भी त्योहार है सब लोकधर्मी रहे और उसकी जड़ मिथक की कथाएँ हैं । जब तक मिथक कथा लोक के साथ रहा उसका विस्तार उन्मुक्त रहा , आदिवासियों में यह आज भी ज़िंदा है , लेकिन जिन्हें संभ्रांत और सभ्य (?)कहते हैं , उसमे विकृति आ गई । उसमे पंडित , पत्रा , पंचांग , वर्जना , विधि विधान आ गया । यहाँ से कर्मकाण्ड का प्रवेश हुआ । सारा लोक उत्सव पंडित जी की डिबिया में बंद हो गया ।
तीज को खोलिये । मंझारी कुल छह बच्चों की माँ है । मनु स्मृति की व्याख्या में जिसे पिछड़ी जाति कहते हैं उससे आती है , उनके लिये भदेस आचरण सह्य है । वह बोलती है खुल्लम खुल्ला – तीज त्योहार है जो बिनबियाही है वो माँगती हैं उन्हें शिव की तरह वर मिले , और जो बियाही है वे माँगती हैं – अहिवात बना रहे । मंझारी शिव पार्वती कथा में इतना भर जानती है ।
इसका मूल तत्व उपासना है । पोंगा पंथ ने उपासना को उपवास में बदल दिया और पूरे उत्सव को तिथि , काल , विधि विधान की ज़ंजीर से बांध कर औरत को उसके मूल चरित्र से हटा दिया । हमारे समाज का पोंगा पंथ औरत के सवाल पर इकतरफ़ा चला है , मिथक कथा से वह उसी हिस्से को चमका कर पेश करेगा जिसमे नारी जूझे और पुरुष किनारे खड़ा होकर वाह वाह करे । तीज के साथ यही हुआ है शिव पार्वती के प्रेम की कथा से यह त्योहार निकला है । “
कुमार सम्भव “ में कालिदास ने बड़ी विद्वता से एक लोक्युक्ति को संस्कृत में उठाया है – रत्न पारखी की तलाश नहीं करता , पारखी रत्न खोजता है । भारत का वांगमय पारखी के स्थान पर नारी को स्थापित किया है , मिथक कथाएँ इसे बडीबेबाक़ी से तस्दीक़ करती हैं ।
उदाहरण के लिये त्रेता युग के दो चरित्र उठाइये सीता और राम । यहाँ सीता पारखी हैं , राम का वरण सीता करती हैं , राम नहीं । सीता , राम को धनुष की कसौटी पर कस कर रत्न की शिनाख्त करती हैं । द्वापर की द्रौपदी अर्जुन का वरण करती है , मछली की आँख तो कसौटी है । नारी युग था , जीवन साथी का चयन पुरुष नहीं करता था , नारी कराती थी । पाखंडी पुरुष समाज ने उसे पलट दिया । बहुत छल हुआ है इस नारी के साथ , इतना किवह लजाती है बताने में कि उसे शिव की तरह वर चाहिये
– लजाती क्यों हो खुल कर बोलो !
उसके बोलने के पहले पाखंड बोलेगा – लज्जा स्त्री का आभूषण है ।
इस तरह के अनगिनत “ आभूषण “ से लदी नारी गौरान्वित हो रही है
