कहाँ गए वो लोग, जो रूठों को मना लिया करते थे?

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

कहाँ गए वो लोग, जो रूठों को मना लिया करते थे?

  • उस पीढ़ी की कहानी, जिसने बहस हारकर भी रिश्ते जीते और दरवाज़े बंद करने के बजाय बैठकर बात करना चुना

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

” पापा, चाचा जी का फोन आया था?” नेहा ने खाने की मेज़ पर बैठे पिता से पूछा।
पिता ने बिना नज़र उठाए कहा, “आया था… मैंने नहीं उठाया।”
“लेकिन पापा, तीन साल हो गए। आखिर कब तक नाराज़ रहेंगे?”
पास बैठी दादी धीरे से बोलीं, “तुम्हारे पिताजी भी बचपन में अपने भाई से खूब लड़ते थे। शाम तक दोनों फिर एक ही थाली में खाना खाते थे।”
पिता हल्का-सा मुस्कुराए, “तब बातें इतनी नहीं बिगड़ती थीं, माँ।”
दादी ने उनकी ओर देखा, “बातें तब भी बिगड़ती थीं बेटा… बस हम रिश्तों को बिगड़ने नहीं देते थे।”

कमरे में खामोशी छा गई।

दादी ने मेज़ पर रखा मोबाइल उनकी ओर सरकाया, “हमारे ज़माने में फोन नहीं थे, इसलिए रूठे हुए के घर जाना पड़ता था। तुम्हारे पास तो फोन भी है…”
पिता देर तक स्क्रीन देखते रहे। फिर नंबर मिलाया।
उधर से आवाज़ आई, “हैलो…”
उनके होंठ काँपे-
“छोटे… कैसा है?”
दादी ने चुपचाप अपनी आँखों का कोना पोंछ लिया।

शायद यही वह छोटी-सी कला थी, जिसे हमारी पिछली पीढ़ी हमसे कहीं बेहतर जानती थी – वे व्यक्ति से नाराज़ होते थे, रिश्ते से नहीं।

हमारे दादा-दादी और नाना-नानी की पीढ़ी के पास आज जैसी सुविधाएँ, तकनीक और आर्थिक स्वतंत्रता भले कम रही हो, लेकिन रिश्तों को सँभालने का धैर्य शायद अधिक था। उनके घरों में भी मतभेद होते थे, मन दुखता था, अहं टकराता था और कभी-कभी बात बहुत बढ़ भी जाती थी। फिर भी कोशिश यही रहती थी कि नाराज़गी स्थायी दूरी में न बदले।

दो लोगों में विवाद होता तो चार लोग जोड़ने के लिए खड़े हो जाते। कोई चाचा समझाता, कोई बुआ मनाती, कोई दादी दोनों पक्षों को बैठाकर सुनती। कभी एक थोड़ा झुकता, कभी दूसरा। कई बार बातचीत शिकायतों से शुरू होती और अंत चाय के प्याले या गले मिलने पर होता।
आज विडंबना देखिए- हमारे पास संवाद के साधन बढ़ गए, लेकिन संवाद स्वयं घटता जा रहा है।
मोबाइल में सैकड़ों नंबर हैं, सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हैं और दुनिया के दूसरे कोने में बैठे व्यक्ति तक हम कुछ सेकंड में पहुँच सकते हैं। लेकिन अपने ही भाई, बहन, मित्र या रिश्तेदार से नाराज़ हो जाएँ तो महीनों, कभी-कभी वर्षों बात नहीं करते।

किसी ने फोन नहीं किया।
किसी समारोह में अपेक्षित सम्मान नहीं मिला।
किसी ने हमारी बात काट दी।
किसी ने ऐसा शब्द कह दिया जो मन को चुभ गया।
और वर्षों की आत्मीयता कुछ क्षणों की नाराज़गी के नीचे दब जाती है।

मानो मानवीय रिश्तों में भी हमने ‘ब्लॉक’ और ‘डिलीट’ का विकल्प खोज लिया हो।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि पुरानी पीढ़ी के हर समझौते को आदर्श मान लिया जाए। उस समय कई लोग सामाजिक दबाव के कारण अपमानजनक और पीड़ादायक रिश्ते भी निभाते रहे। सहनशीलता का अर्थ अत्याचार सहना या आत्मसम्मान खो देना कभी नहीं हो सकता।

लेकिन आज कहीं हम दूसरी अति की ओर तो नहीं बढ़ रहे?

क्या हम आत्मसम्मान और अहं, स्वतंत्रता और असहनशीलता तथा सीमा तय करने और रिश्ता समाप्त कर देने के बीच का अंतर भूलते जा रहे हैं?

हर असहमति अपमान नहीं होती।
हर नाराज़गी विषाक्त रिश्ता नहीं होती।
और हर गलती वर्षों पुराने संबंध को समाप्त करने का कारण नहीं हो सकती।

रिश्ते दो अलग-अलग व्यक्तित्वों के बीच बनते हैं। जहाँ दो मन होंगे, वहाँ दो विचार भी होंगे। अपेक्षाएँ टकराएँगी, गलतफहमियाँ होंगी और कभी शब्द भी चुभेंगे। यदि हमें केवल वही व्यक्ति स्वीकार है जो हमेशा हमारी तरह सोचे, तो शायद हमें रिश्ता नहीं, अपना प्रतिबिंब चाहिए।

आज हम बच्चों को आत्मनिर्भर होना सिखाते हैं, अपनी बात दृढ़ता से रखना सिखाते हैं, प्रतियोगिता जीतना और आगे बढ़ना सिखाते हैं। यह सब आवश्यक है। लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि हर बार झुकना हारना नहीं होता?

कभी रूठी बहन को स्वयं फोन कर लेना कमजोरी नहीं।
कभी भाई के घर पहले चले जाना सम्मान की हार नहीं।
पति-पत्नी के बीच “शायद इस बार गलती मेरी थी” कह देना पराजय नहीं।
और किसी अपने को क्षमा कर देना उसकी हर गलती को सही ठहराना नहीं।

कई बार एक छोटा-सा “माफ़ करना” दो घरों के बीच वर्षों से खड़ी दीवार गिरा सकता है।
सबसे बड़ी चिंता आने वाली पीढ़ी की है।

बच्चे रिश्तों का अर्थ हमारी सीख से कम और हमारे व्यवहार से अधिक समझते हैं। यदि वे हमें भाई-बहनों से वर्षों बात न करते देखें, माता-पिता से मतभेद होते ही दूरी बनाते देखें और छोटी नाराज़गी पर पुरानी दोस्ती खत्म करते देखें, तो वे भी यही सीखेंगे कि रिश्ते निभाने के लिए नहीं, सुविधानुसार रखने के लिए होते हैं।

फिर शायद कल माँ-बाप से महीनों बात न करना सामान्य लगेगा। भाई-बहन त्योहार के औपचारिक संदेशों तक सीमित हो जाएँगे। चाचा, ताऊ, बुआ और मौसी जैसे रिश्ते नामों में तो रहेंगे, लेकिन जीवन में उनका अपनापन खो जाएगा।
हमारे घर बड़े होंगे, लेकिन उनमें आने वाले अपने कम होंगे।
फोन में संपर्क बहुत होंगे, लेकिन संकट में दरवाज़ा खटखटाने वाले कम होंगे।

और तब शायद हमें समझ आएगा कि हमने स्वतंत्र होना तो सीख लिया, लेकिन एक-दूसरे के साथ रहना भूल गए।

हमें पुरानी पीढ़ी की हर बात वापस नहीं लानी, लेकिन उसकी एक खूबसूरत आदत अवश्य बचानी चाहिए- रिश्ते में समस्या आए तो रिश्ता नहीं, समस्या खत्म करने की कोशिश की जाए।

नाराज़ हैं तो बात कीजिए।
गलती हुई है तो स्वीकार कीजिए।
फोन की प्रतीक्षा मत कीजिए, कभी स्वयं मिला लीजिए।
और किसी अपने की एक भूल को उसके पूरे व्यक्तित्व का फैसला मत बनने दीजिए।

जीवन बहुत छोटा है। आज जिस व्यक्ति से हम अहं के कारण बात नहीं कर रहे, संभव है कल उसकी तस्वीर से बातें करनी पड़ें। तब शायद वह बहस भी याद न रहे जिसके कारण वर्षों दूरी बनाए रखी- बस एक टीस रह जाए:

“काश… उस दिन मैंने फोन कर लिया होता।”

हमारी पिछली पीढ़ी हमें केवल घर, ज़मीन, गहने और संस्कार देकर नहीं गई। वह एक अनमोल विरासत भी छोड़ गई है – रूठे हुए अपनों को फिर अपना बना लेने की कला।

अब यह हम पर निर्भर है कि अगली पीढ़ी को हम क्या देकर जाएँगे- अहं की ऊँची दीवारें या लौटकर आने के लिए खुला एक दरवाज़ा।

क्योंकि बहस जीतकर भी यदि अपना कोई हार जाए, तो वह जीत आखिर किस काम की?
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी जीत बस इतनी-सी होती है-

कोई रूठा था, हम थोड़ा झुके, उसने दरवाज़ा खोला……..और रिश्ता फिर से मुस्कुरा उठा।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर,करनाल

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