कलाकार होना दुर्लभ होता है
– मंजुल भारद्वाज
एक समय ऐसा आता है जब सब शिथिल हो जाता है। जड़ता पसर जाती है। सृजन वहीं ठहर जाता है।
ऐसा तब होता जब आप एक क्षितिज पार कर दूसरे क्षितिज में प्रवेश करते हो । नए क्षितिज को साधने की ऊर्जा नहीं रहती । उल्टा जो क्षितिज साधा है उसकी थकान हावी हो जाती है। क्षितिज साधने की प्रसन्नता आपको समाधान नहीं देती क्योंकि सृजन उपलब्धि ठोस नहीं चेतनात्मक होती है। निराकार होती है। कितना विरल साध्य है आप आकार हैं और आपका सृजन निराकार!
यह विरल साध्य आपको बेकार लगता है। क्योंकि आप उसका भौतिक मूल्य मापन करते हो । आपके आस पास की भौतिक उपलब्धियां आपकी निराकार सृजन सिद्धि के तेज़ को निरस्त कर देती हैं। और आप एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाते हो जहां आपकी विलक्षणता जिसके लिए दुनिया अंतिम क्षणों में प्राप्त करने की सोचती है… वो अर्थहीन लगती है।
समय से आगे होना,काल को आकार देना, मनुष्य में इंसानी चेतना जगाना । विध्वंस काल में … ज़िंदगी खूबसूरत है ….का राग गाना दुनिया को काल का ग्रास बनाने से बचाना है।
आप सृजनकार का क्षितिज साध लेते हो और भौतिक दुनिया की उपलब्धियों से परास्त हो जाते हो यह जानते हुए भी कि भौतिक उपलब्धियां क्षणभंगुर हैं।
भौतिक उपलब्धियों के भ्रम में काल को आकार देने वाले स्वयं काल का ग्रास बनने को आतुर हों….. तो दुनिया को कौन बचाएगा?
इसीलिए सत्ता कला को नुमाइश बना भोग में धकेल देती है ताकि कला के नाम पर नुमाइश करने वाले जिस्म भौतिक उपलब्धियों को ही कला की उपलब्धि माने और इस चक्रव्यूह को भेदने वाले भी इसी का शिकार हो अपने जीवन को सांप सीढ़ी के खेल से मात दे दें।
बड़ी त्रासद होती है यह अवस्था जहां काल के आगे होने वाले कलाकार भौतिक उपलब्धियों के भ्रम में खुद को पिछड़ा हुआ समझें! इसलिए कलाकार होना दुर्लभ होता है और नुमाइशी जिस्मों की भरमार होती है!
