शब्दयात्री
कुलपति बनाम कुलगुरु
डॉ. सुशील उपाध्याय
रूढ़ हो चुके शब्दों को बदलने की मुहिम अब विश्वविद्यालयों तक पहुँच गई है। इसकी जद में ‘कुलपति’ शब्द भी आ गया है। जेएनयू के बाद कई अन्य विश्वविद्यालयों में भी कुलपति अब ‘कुलगुरु’ हो गए हैं। निस्संदेह कुलपति और कुलगुरु दोनों ही प्राचीन शब्द हैं, लेकिन दोनों के अर्थ काफी हद तक भिन्न हैं।
सामान्य तौर पर देखें तो कुलपति किसी आश्रम (गुरुकुल) का अधिष्ठाता है, जबकि कुलगुरु किसी राज परिवार अथवा वंश परंपरा का आध्यात्मिक एवं धार्मिक मार्गदर्शन करता है। पौराणिक उदाहरण से समझें तो कृपाचार्य गुरु वंश के कुलगुरु हैं, जबकि ऋषि व्यास, ऋषि विश्वामित्र आदि कुलपति हैं। कुलगुरु किसी विशिष्ट परंपरा अथवा जाति परंपरा के आधार पर भी हो सकता है, जैसे कालिदास को कवि कुलगुरु कहा गया है, उन्हें कवि कुलपति नहीं कहा गया।
रामचरितमानस जैसे आधुनिक धार्मिक ग्रंथों को आधार मानें तो पुरोहित की भूमिका निभाने वाला, राजा के आश्रय में रहने वाला आचार्य कुलगुरु है—
‘कुंवर सो कुसल छेम अलि तेहि कुलगुरु कह पहुँचाई।’
भगवान राम जब ऋषि भारद्वाज और ऋषि अगस्त्य आदि के आश्रम में गए, तो वे कुलपति से मिले, कुलगुरु तो पहले से ही उनके साथ थे। समग्रता में देखें तो कुलपति पदनाम एक स्वायत्त व्यवस्था का प्रतीक है, वह कुछ सीमा तक स्वतंत्र सत्ता भी है, जबकि कुलगुरु राजा अथवा वंश अथवा संप्रदाय के आश्रय में है। बुद्धकालीन ग्रंथों में भी ऐसे व्यक्ति को कुलपति के रूप में संबोधित किया गया है, जो सामाजिक, पारिवारिक एवं शैक्षिक नेतृत्व करता हो। आज के संदर्भ में भी कुलपति केवल शैक्षिक प्रमुख नहीं, बल्कि प्रशासनिक, वित्तीय और नीतिगत निर्णयों का केंद्र भी होता है।
कुलपति शब्द पर हमले के पीछे इसमें जुड़ा हुआ ‘पति’ शब्द है। यह समस्या इसलिए पैदा हुई क्योंकि ‘पति’ को हसबैंड के पर्याय के रूप में ग्रहण किया गया। जहाँ स्त्री-पुरुष के दांपत्य जीवन की बात आएगी, वहां पर संबंधित पुरुष पति ही होगा, लेकिन ‘पति’ शब्द को यदि अन्य शब्दों के मामले में भी हसबैंड के रूप में ग्रहण किया जाए, तब यह अर्थ की बजाय अनर्थ का द्योतक बन जाएगा।
व्यापक संदर्भ में देखें तो ‘पति’ का अर्थ संरक्षक, स्वामी (दार्शनिक, आध्यात्मिक, लौकिक), मार्गदर्शक है। यह पदानुक्रम की वरिष्ठता का द्योतक भी है, जैसे राष्ट्रपति, स्थानापति (थानापति), न्यायाधिपति और कुलपति। यहां रूढ़ि और व्युत्पत्ति के अंतर को समझना आवश्यक है, क्योंकि भाषा में अनेक शब्द अपनी मूल व्युत्पत्ति से हटकर नए अर्थ में स्थिर हो जाते हैं और वही उनका व्यावहारिक अर्थ बन जाता है।
रूढ़ अर्थ में ग्रहण करने पर किसी भी शब्द के साथ ‘पति’ की उपस्थिति अनर्थ पैदा नहीं करती, लेकिन इसे कु-अर्थ तक घसीटना हो, तब कुलपति के सामने कुलपत्नी को खड़ा करके दिखाया जा सकता है। यह वैसा ही विवाद है, जैसे कि श्रीमती प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने के बाद यह काल्पनिक प्रश्न खड़ा किया गया कि उन्हें राष्ट्रपति क्यों कहा जाए, जबकि राष्ट्रपति तो पुलिंग शब्द है।
कुलगुरु के पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि यह शब्द लैंगिक रूप से तटस्थ है, जबकि कुलपति पुरुषवाचक है, लेकिन यह याद रखिए कि कुलपति पदनाम है। यह पदनाम इसे ग्रहण करने वाले व्यक्ति के लिंग को देखकर नहीं बदल जाएगा। जैसे न्यायपालिका में ‘न्यायाधीश’ या ‘न्यायमूर्ति’ आदि पदनाम व्यक्ति के लिंग के अनुसार नहीं बदलते, वैसे ही कुलपति को भी बदलने की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि बदलाव की धुन के शिकार व्यक्ति प्राचार्य के सामने प्राचार्या, आचार्य के सामने आचार्या, अध्यक्ष के सामने अध्यक्षा जैसे शब्दों को प्रस्तुत करके अपनी बात को सही साबित करने का प्रयास करते हैं। यह सही है कि शब्द के आखिर में आने वाली ‘आ’ ध्वनि किसी पद अथवा जाति-नाम को स्त्रीवाचक बनाती है, लेकिन पदनाम और विशिष्ट अर्थ में रूढ़ हो चुके शब्दों के साथ भी यह प्रयोग किया जाए, इसकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। और यदि बदलने की जिद ही आ जाए, तो फिर सेनापति, सभापति आदि को किन शब्दों से बदलेंगे ?
यह मान लेते हैं कि विश्वविद्यालय के मामले में कुलगुरु को ग्रहण कर लिया गया, ऐसे में महाविद्यालयों के प्रमुख को प्राचार्य ही कहा जाएगा अथवा उनके लिए कुलाचार्य जैसा कोई शब्द गढ़ा जाएगा? यदि कुलपति में से ‘पति’ जैसे पुल्लिंग शब्द को हटाकर ‘गुरु’ जैसा शब्द जोड़ा गया है, तो लैंगिक तटस्थता की दृष्टि से यह भी गलत है क्योंकि गुरु भी पुल्लिंग (भावरूप में भी) ही है।
वस्तुतः भाषा की प्रकृति उसके समग्र परिवेश (सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, भौगोलिक, राजनीतिक आदि) से निर्धारित होती है। उसकी प्रकृति को किसी अन्य परिवेश के अनुरूप परिवर्तित करना सदैव उचित नहीं होता। ऐसे में, अध्यक्ष की तर्ज पर चेयरपर्सन, बैट्समैन के लिए बैटर बनाने की कोशिश को हिंदी तक लाने की कोई उल्लेखनीय आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। और बदलने की ठान ही ली है, तो फिर कुलसचिव को भी बदलना होगा, क्योंकि कुलगुरु (गुरु) के साथ कुलसचिव (सचिव) का क्या काम? पुरानी परंपरा के लिहाज से भी, सचिव तो अधिपति अथवा कुलपति का होगा, कुलगुरु का कोई सचिव बनाए जाने का औचित्य प्रतीत नहीं होता।
इस सारे उपक्रम में यदि कुलगुरु जैसे किसी पद को स्थापित करना ही था, तो यह पदनाम प्रतिकुलपति जैसे पद के लिए उचित हो सकता था, क्योंकि पूर्व में भी गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय आदि में कुलपति के साथ आचार्य पद (पदनाम) होता था, जिसकी समकक्षता प्रतिकुलपति की होती थी।
कुछ लोग इस मामले में गुरुकुल और कुलगुरु के घालमेल से भी अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन इस घालमेल से भी बात नहीं बनेगी, क्योंकि गुरुकुल का आचार्य शैक्षिक दायित्व ही संभालेगा, जबकि समग्र भूमिका गुरुकुल (आश्रम) के कुलपति के पास ही रहेगी। आधुनिक संदर्भ में देखें, तो कुलपति के अधीन वित्त, प्रशासन, दंड देने का अधिकार आदि भी होगा, जबकि कुलगुरु का काम सर्वोच्च आचार्य के रूप में शैक्षिक मार्गदर्शन करने से अधिक नहीं होगा। किसी भी भाषा में परिवर्तन स्वाभाविक है, किन्तु वह तर्क, परंपरा और व्यवहार—तीनों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
