बच्चों के बीच भी सलीके से कैसे रहें

कम सामान में जीवन जीने वाले परिवारों से सीख सकते हैं

बच्चों के बीच भी सलीके से कैसे रहें

एम्बर मार्टिन-वुडहेड,  मैनचेस्टर मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी

बच्चों की जरूरतें खत्म नहीं होतीं, लेकिन वे खिलौनों से जल्दी ऊब जाते हैं, जबकि उनके कपड़े और फर्नीचर भी देखते-ही-देखते उनके काम के नहीं रह जाते।

ऐसे में कई परिवार घर में बढ़ते सामान और अव्यवस्था से परेशान रहने लगते हैं। इसकी झलक ‘बीबीसी वन’ के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘सॉर्ट योर लाइफ आउट’ में भी देखने को मिलती है, जहां परिवार अक्सर बच्चों के खिलौनों और कपड़ों के ढेर के बीच होते हैं और घर को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश करते हैं।

दूसरी ओर, बच्चों और उनके माता-पिता पर लगातार और सामान खरीदने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। विज्ञापन अब ऑनलाइन सामग्री और वीडियो गेम का हिस्सा बना दिए जाते हैं। सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर नए खिलौनों के डिब्बे खोलते हुए वीडियो साझा करते हैं, जिससे बच्चों में नयी चीजें खरीदने की इच्छा और बढ़ जाती है।

घर में जरूरत से ज्यादा सामान केवल जगह ही नहीं घेरता, बल्कि तनाव भी बढ़ाता है। चीजों के बेकाबू होते जाने का एहसास तो होता ही है, साथ ही पर्यावरण को लेकर चिंता भी बनी रहती है। उदाहरण के लिए, बिजली उपकरणों वाले अधिकांश प्लास्टिक खिलौनों को आसानी से पुनर्चक्रित नहीं किया जा सकता और वे अंततः कूड़े के ढेर में पहुंच जाते हैं।

बच्चों के सामान से पैदा होने वाले तनाव और उसके पर्यावरणीय प्रभावों को समझने के लिए, ‘मिनिमलिज्म’ (सादगीपूर्ण जीवनशैली) पर अपनी पुस्तक के शोध के दौरान मैंने कई ऐसे माता-पिताओं से बातचीत की, जो अपने और अपने बच्चों के जीवन में सामान कम रखने की कोशिश करते हैं। उन्होंने बच्चों के सामान से होने वाली अव्यवस्था को नियंत्रित करने के पांच प्रभावी तरीके बताए।

हर मांग तुरंत पूरी न करें

यह सबसे कठिन कामों में से एक है। एक अभिभावक ने बताया, “आप बच्चों के साथ बाजार जाते हैं और वे हर चीज देखकर कहते हैं-मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए।”

कुछ माता-पिता अचानक होने वाली खरीदारी से बचने के लिए बच्चों से कहते हैं कि जिस चीज की उन्हें इच्छा है, उसकी तस्वीर खींच लें और उसे जन्मदिन या किसी त्योहार के लिए बनाई जाने वाली इच्छा-सूची में शामिल कर लें।

इससे बच्चे की इच्छा को सम्मान भी मिलता है और जल्दबाजी में खरीदारी भी नहीं होती। एक अभिभावक ने कहा, “अगर कुछ महीनों बाद भी बच्चा उसी चीज को चाहता है, तो समझिए कि वह वास्तव में उसे पसंद करता है, यह सिर्फ कुछ दिनों का आकर्षण नहीं है।”

कुछ परिवार जन्मदिन और त्योहारों पर मिलने वाले उपहारों की संख्या भी सीमित रखते हैं। वे एक सरल नियम अपनाते हैं—एक ऐसी चीज जो बच्चा चाहता है, जिसकी उसे जरूरत है, एक पहनने के लिए और एक पढ़ने के लिए।

चीजों के बजाय अनुभव उपहार में दें

दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने वाले उपहारों को सीमित करना कई बार मुश्किल हो जाता है, खासकर दादा-दादी के मामले में।

अमेरिका में 2019 के एक अध्ययन में पाया गया कि दादा-दादी प्रत्येक वर्ष अपने पोते-पोती पर औसतन 805 डॉलर उपहारों के लिए खर्च करते हैं। वहीं ब्रिटेन में दादा-दादी क्रिसमस पर प्रत्येक बच्चे के लिए लगभग 100 पाउंड खर्च करने की योजना बनाते हैं।

सादगीपूर्ण जीवनशैली अपनाने वाले माता-पिता रिश्तेदारों से आग्रह करते हैं कि वे केवल वही वस्तुएं दें जो बच्चे वास्तव में चाहते हैं। कई लोग किसी बड़े उपहार के लिए आर्थिक सहयोग या फिर चिड़ियाघर की सैर, सिनेमा टिकट जैसे अनुभव को उपहार के रूप में प्राथमिकता देते हैं।

वे खरीदारी की जगह कम खर्च वाले अनुभवों को भी महत्व देते हैं, जैसे पार्क में खेलना, प्रकृति के बीच समय बिताना या स्थानीय पुस्तकालय जाना।

ऐसे खिलौने चुनें जिनका उपयोग कई तरह से हो सके

बच्चों के मानसिक विकास और सीखने की प्रक्रिया के लिए खिलौने जरूरी हैं। लेकिन शोध बताते हैं कि खिलौनों की संख्या कम होने पर बच्चे बेहतर ध्यान लगा पाते हैं और अधिक रचनात्मक तरीके से खेलते हैं।

जिन माता-पिता से मैंने बात की, वे बच्चों को ऐसे सरल खिलौने देना पसंद करते थे जिनका उपयोग कई अलग-अलग तरीकों से किया जा सके। इनमें बिल्डिंग ब्लॉक, चुंबकीय टाइल आदि शामिल हैं।

ऐसे खिलौने बच्चों की कल्पनाशक्ति को बढ़ावा देते हैं और उन्हें एक ही वस्तु से कई तरह के खेल रचने का अवसर देते हैं।

हर चीज की एक निश्चित जगह तय करें

घर में बच्चों के खिलौनों को व्यवस्थित रखना हमेशा आसान नहीं होता। कई माता-पिताओं ने बताया कि उन्होंने इसका समाधान यह निकाला कि हर वस्तु के लिए एक तय स्थान निर्धारित कर दिया।

एक अभिभावक ने कहा, “जब मैंने सुनिश्चित किया कि हर चीज की अपनी जगह हो, तभी मैं बच्चों और अपने जीवन को व्यवस्थित रख पाई।”

एक अन्य परिवार ने सभी खिलौनों के लिए एक बड़ा बॉक्स रखा हुआ था। उनका नियम था कि सभी खिलौने उसी में समा जाने चाहिए।

यदि खिलौनों की संख्या इतनी बढ़ जाए कि बॉक्स भर जाए, तो बच्चों को कोई पुराना खिलौना हटाना पड़ता है। इससे उन्हें यह समझने में भी मदद मिलती है कि हर नयी चीज के लिए जगह बनानी पड़ती है।

एक अभिभावक ने यह भी बताया कि बच्चों को अपने कमरे अपनी पसंद से रखने की आजादी थी, लेकिन बैठक और रसोई जैसे साझा पारिवारिक स्थानों को अव्यवस्था से मुक्त रखना जरूरी था।

जो चीजें काम की नहीं रहीं, उन्हें किसी और को दें

जब बच्चे किसी वस्तु का उपयोग करना बंद कर देते हैं, तो माता-पिता उसे घर में बेकार पड़ा नहीं रहने देते। वे उसे बेच देते हैं, दान कर देते हैं या दोस्तों और रिश्तेदारों को दे देते हैं।

इससे घर में अनावश्यक सामान नहीं बढ़ता और वस्तुओं का उपयोग दूसरे परिवार भी कर पाते हैं। साथ ही, नए सामान की खरीदारी की जरूरत कम होती है, जिससे संसाधनों की बचत होती है।

इन अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि बच्चों के लिए कम सामान खरीदना, स्थानीय और सरल गतिविधियों को प्राथमिकता देना तथा अनुपयोगी वस्तुओं को दूसरों तक पहुंचाना कई तरह से फायदेमंद हो सकता है।

इससे न केवल खर्च कम होता है और घर व्यवस्थित रहता है, बल्कि जीवनशैली पर्यावरण के अनुकूल भी बनती है। कन्वर्सेशन से साभार

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