‘पैर’ – सिर्फ शरीर का हिस्सा नहीं, जीवन का फलसफ़ा

‘पैर’ – सिर्फ शरीर का हिस्सा नहीं, जीवन का फलसफ़ा

डॉ. रीटा अरोड़ा

रोज़मर्रा की भागदौड़ में हम अक्सर उन चीज़ों को अनदेखा कर देते हैं, जो हमारे सबसे करीब होती हैं। हमारे शरीर का वह हिस्सा, जो सुबह बिस्तर से उतरते ही सबसे पहले ज़मीन को छूता है और रात को थककर सोने तक हमारा पूरा बोझ उठाए रहता है – हमारे पैर।

प्रायः हम पैरों को केवल चलने का साधन मान लेते हैं। पर यदि ज़रा ठहरकर सोचें, तो यही साधारण-से दिखने वाले पैर जीवन का सबसे असाधारण दर्शन अपने भीतर समेटे हुए हैं। ये सिर्फ शरीर को आगे नहीं बढ़ाते, ये इरादों को दिशा देते हैं, सपनों को रास्ता देते हैं और जीवन को गति देते हैं।

कभी किसी से पूछा गया, “कहाँ जा रहे हो?”

उसने सहजता से उत्तर दिया, “जहाँ पैर ले जाएँ।”

सुनने में यह बात बहुत सामान्य लगी। पर मन में एक प्रश्न उठा – क्या सचमुच पैर रास्ते तय करते हैं? फिर लगा, शायद पैर रास्ते तय नहीं करते, लेकिन वे हमारे भीतर बैठे निर्णयों, इच्छाओं और हिम्मत को मंज़िल तक पहुँचाने का माध्यम ज़रूर बनते हैं। मन चाहे जितना भी सोच ले, सफ़र तो पैरों से ही शुरू होता है।

एक दिन किसी को कहते सुना, “उसके तो पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे।”
हमने देखा, पैर तो सचमुच ज़मीन पर ही थे। फिर समझ आया कि यह बात शरीर की नहीं, मन की थी। सफलता जब संतुलन खो देती है, तो इंसान ज़मीन पर चलते हुए भी ज़मीन से कट जाता है। तब पैर केवल चलने का प्रतीक नहीं रहते, वे विनम्रता और अहंकार का आईना भी बन जाते हैं।

फिर एक बुज़ुर्ग ने प्यार से कहा, “बेटा, अपने पैरों पर खड़ा होना सीखो।”

उस वाक्य में जीवन की पूरी शिक्षा छिपी थी। अपने पैरों पर खड़ा होना केवल चलना सीखना नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर बनना है। अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी लेना है। दूसरों के सहारे से आगे बढ़ना आसान हो सकता है, लेकिन जीवन की असली गरिमा तब आती है, जब इंसान अपने पैरों पर खड़ा होना सीख जाता है।

एक दिन एक छोटे बच्चे को चलते हुए देखा। वह बार-बार गिरता था, फिर उठता था, फिर डगमगाते कदमों से आगे बढ़ता था। कोई शिकायत नहीं, कोई हार नहीं। बस फिर से कोशिश।
तब समझ आया कि पैर हमें सबसे पहले चलना ही नहीं सिखाते, गिरकर उठना भी सिखाते हैं। जीवन में हर बड़ा सफ़र ऐसे ही शुरू होता है – लड़खड़ाते हुए, गिरते हुए, फिर उठते हुए। जो गिरने से डर गया, वह चलना नहीं सीख पाया। और जो उठता रहा, उसने एक दिन दौड़ना सीख लिया।

किसी यात्री के बारे में सुना, “उसने तो पूरी दुनिया अपने पैरों से नाप ली।”

पहले यह बात अतिशयोक्ति लगी। क्या सचमुच पैर दुनिया नापते हैं? फिर लगा, हाँ, हर यात्रा पैरों से ही शुरू होती है। मंज़िलें चाहे पहाड़ों पर हों, शहरों में हों या सपनों में – वहाँ तक पहुँचने के लिए पहला कदम पैरों को ही बढ़ाना पड़ता है। रास्ते नक्शों में दिख सकते हैं, लेकिन तय पैरों से ही होते हैं।

मंदिर में देखा कि लोग बड़ों के चरण स्पर्श कर रहे थे। वही पैर, जिन्हें हम अक्सर धूल-मिट्टी से जुड़ा हुआ समझते हैं, सम्मान का प्रतीक बन गए थे। तब लगा कि पैर केवल शरीर का आधार नहीं, संस्कारों का भी आधार हैं। जिन चरणों ने जीवन का लंबा सफ़र तय किया हो, जिनमें अनुभव की थकान और आशीर्वाद की गरिमा हो, उन्हें छूना केवल परंपरा नहीं, विनम्रता का अभ्यास है।

फिर किसी ने कहा, “उसके पैर उखड़ गए।”

पहले तो यह सुनकर मन घबरा गया। बाद में समझ आया कि यहाँ बात शरीर की नहीं, हौसले की थी। जीवन में कई बार परिस्थितियाँ ऐसी आती हैं, जब इंसान का आत्मविश्वास डगमगा जाता है। पैर वहीं होते हैं, लेकिन भीतर की पकड़ ढीली पड़ जाती है। तब ज़रूरत होती है फिर से ज़मीन पकड़ने की, फिर से संतुलन पाने की और फिर से खड़े होने की।

एक खिलाड़ी को दौड़ते देखा। पसीना बह रहा था, साँसें तेज़ थीं, शरीर थक चुका था, लेकिन पैर रुकने को तैयार नहीं थे। वहाँ समझ आया कि पैर मेहनत की भाषा भी बोलते हैं। वे बताते हैं कि संघर्ष का कोई विकल्प नहीं होता। जीत केवल चाहने से नहीं मिलती, उसके लिए कदमों को दर्द से, थकान से और रुकावटों से गुज़रना पड़ता है।

कभी किसी के बारे में सुना, “गलत संगत में पड़कर उसके पैर फिसल गए।”

यह वाक्य भी बहुत कुछ कह गया। पैर केवल आगे बढ़ने का साधन नहीं हैं, वे दिशा का संकेत भी हैं। वे हमें सही रास्ते पर भी ले जा सकते हैं और भटका भी सकते हैं। इसलिए जीवन में यह ज़रूरी है कि कदम तेज़ हों या धीमे, पर सही दिशा में हों। क्योंकि गलत दिशा में तेज़ दौड़ने से बेहतर है सही दिशा में धीरे चलना।

फिर एक ज्ञानी व्यक्ति ने बहुत सरल बात कही – शरीर का पूरा भार पैर उठाते हैं। वे कभी शिकायत नहीं करते। न उन्हें ताज मिलता है, न प्रशंसा, न मंच, न तालियाँ। फिर भी वे चुपचाप जीवन भर हमारा बोझ उठाते रहते हैं।

यह बात मन को गहराई तक छू गई। सचमुच, दुनिया में सबसे महान वे लोग होते हैं, जो बिना शोर किए अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं। जो नींव की तरह होते हैं – दिखाई कम देते हैं, लेकिन पूरे घर को संभाले रहते हैं। पैर भी ऐसे ही हैं। सबसे नीचे होते हुए भी पूरे शरीर को ऊँचा रखते हैं।

और एक बात और भी अद्भुत है।

चलते समय दोनों पैर कभी एक साथ आगे नहीं बढ़ते। एक पैर आगे जाता है, तो दूसरा पीछे रहकर उसका सहारा बनता है। फिर जो पीछे था, वह आगे आता है और पहला उसका संतुलन बनता है। यही तो जीवन का सबसे सुंदर गणित है।

परिवारों में, मित्रताओं में, जीवनसाथी के रिश्तों में भी यही होता है। हर समय हर कोई आगे नहीं रह सकता। कभी हमें किसी का सहारा बनना पड़ता है, तो कभी कोई और हमारा सहारा बनता है। कभी हम आगे बढ़ते हैं, तो कोई पीछे रहकर हमें संभालता है। और कभी हमें पीछे रहकर किसी और को आगे बढ़ने देना होता है। इसी तालमेल, इसी संतुलन और इसी सहयोग का नाम जीवन है।

एक साधारण-सा “पैर” हमें जीवन का बड़ा सत्य सिखाता है। मंज़िल कितनी भी ऊँची क्यों न हो, वहाँ तक पहुँचने के लिए एक-एक कदम ही बढ़ाना पड़ता है। कोई एक छलांग स्थायी सफलता नहीं दिलाती। सफलता उन्हीं को मिलती है, जो निरंतर चलते रहते हैं – धैर्य से, संतुलन से और सही दिशा में।

इसलिए अपने कदम सोच-समझकर बढ़ाइए। रास्ता चुनते समय सावधान रहिए। सफलता मिले तो पैर ज़मीन पर रखिए। कठिनाई आए तो पैर जमाकर खड़े रहिए। गिरें तो फिर उठिए। और जब कोई आपके साथ चल रहा हो, तो कभी उसका सहारा बनिए, कभी उसका साथ स्वीकार कीजिए।

क्योंकि

जीवन की असली खूबसूरती मंज़िल में ही नहीं, उस यात्रा में भी होती है जिस पर हमारे पैर हमें धीरे-धीरे, कदम-दर-कदम आगे ले जाते हैं।

लेखिक –  डॉ रीटा अरोड़ा

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