कविता
अचानक
जयपाल
आदमी या घर
अचानक नहीं टूटता
नदी, तालाब ,पेड़
अचानक नहीं सूखते
सूरज, चांद, सितारे भी
अचानक नहीं डूब जाते
फिर क्यों मर जाती है अचानक
मनुष्य की आत्मा
2
विस्थापित बहनें
बहनें विस्थापित कर दी गईं
कहा गया उनकी शादी हो गई है
विस्थापन का दर्द दिल में दबाये
उन्होंने बसाए घर-परिवार
गांव-नगर-बस्तियां
ताकि विस्थापित न रहे कोई दुनिया में
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वरिष्ठ जनवादी कवि जयपाल जी की दोनों कविताएं बहुत सरल लेकिन गहन गंभीर है जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम क्या हैं और ऐसे क्यों हो गए हैं?
इतने कम शब्दों में इतने बुनियादी दार्शनिक सवाल उठाना और पाठक को समझ के रास्ते पर खड़ा कर देना निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण काम है। और जयपाल की कविता हमेशा ही यह काम करते देखी जाती है। उनके कवि को बहुत-बहुत बधाई!
आभार ओम सिंह जी कविता पर प्रतिक्रिया देने के लिये