खतरनाक बदलावः रोजगार की जगह राहत मांगने को मजबूर युवा
संजीव प्रसाद घिड़ियाल
देश में इस समय एक खतरनाक बदलाव बहुत चुपचाप हो रहा है। पहले सरकारों से लोग रोजगार मांगते थे, अब राहत मांगने पर मजबूर किए जा रहे हैं। पहले युवा नौकरी, अवसर और भविष्य की बात करता था, अब राशन, योजना और पात्रता की चिंता में फंसा हुआ है। यही इस दौर की सबसे बड़ी विडंबना है कि जिस देश को दुनिया “युवा देश” कहती है, उसी देश का युवा अपने जीवन का सबसे असुरक्षित समय जी रहा है।
सरकारें बार-बार कहती हैं कि करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है। इसे उपलब्धि की तरह पेश किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भी देश की सबसे बड़ी सफलता यही हो सकती है कि उसके नागरिक बिना कमाए जीवित रह सकें? क्या एक युवा की आकांक्षा सिर्फ इतनी होनी चाहिए कि उसका राशन कार्ड चालू रहे?
असल संकट भूख से कहीं बड़ा है। असली संकट यह है कि इस देश में धीरे-धीरे बेरोजगारी को सामान्य बना दिया गया है। लाखों पढ़े-लिखे युवा वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। भर्तियां निकलती हैं तो रद्द हो जाती हैं, परीक्षाएं होती हैं तो पेपर लीक हो जाते हैं, रिजल्ट आते हैं तो कोर्ट में फंस जाते हैं। उम्र निकलती रहती है और जीवन इंतजार में अटका रहता है। इस पूरी प्रक्रिया ने युवाओं से सिर्फ रोजगार नहीं छीना, उनका आत्मविश्वास भी तोड़ दिया है।
घर के भीतर इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई देता है। बेरोजगार बेटा धीरे-धीरे परिवार में असहज उपस्थिति बन जाता है। शुरू में उसे समझाया जाता है, फिर सलाह दी जाती है, फिर तुलना की जाती है और अंत में ताने दिए जाते हैं। भारतीय समाज में बेरोजगारी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं होती, यह सामाजिक अपमान में बदल जाती है। हर रिश्तेदार का पहला सवाल होता है — “अभी क्या कर रहे हो?” और इस सवाल के पीछे जिज्ञासा कम, निर्णय ज्यादा छिपा होता है।
स्थिति तब और कठोर हो जाती है जब वही युवा शादी की उम्र में पहुंचता है। समाज में उसकी पूरी पहचान नौकरी से तय होने लगती है। चरित्र, व्यवहार, शिक्षा, संघर्ष — सब पीछे छूट जाते हैं। स्थायी नौकरी नहीं है तो रिश्ता नहीं होगा। ऐसे में बेरोजगार युवा सिर्फ नौकरी नहीं ढूंढ रहा होता, वह सामाजिक स्वीकृति खोज रहा होता है।
इसी बीच योजनाओं और दस्तावेजों की एक दूसरी दुनिया खड़ी हो चुकी है। राशन कार्ड अब सिर्फ अनाज लेने का कागज नहीं रहा, वह अस्तित्व का प्रमाण बन गया है। कई घरों में आर्थिक दबाव या सरकारी नियमों के कारण पिता बेटे का नाम राशन कार्ड से हटवा देते हैं। कागजों में परिवार अलग हो जाता है, लेकिन असल में वह युवा हर तरफ से अधर में लटक जाता है। न उसके पास स्थायी रोजगार है, न अलग पहचान, न सामाजिक सुरक्षा। कई योजनाएं परिवार, विवाह या दस्तावेजों की शर्तों से जुड़ी होती हैं। ऐसे में बेरोजगार युवक धीरे-धीरे व्यवस्था के बीच एक अधूरी फाइल बनकर रह जाता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरी स्थिति को सामान्य बना दिया गया है। सरकारें रोजगार पर जवाब देने से बचती हैं, लेकिन मुफ्त राशन की घोषणा पूरे आत्मविश्वास से करती हैं। क्योंकि राहत देना आसान है, अवसर देना कठिन। आत्मनिर्भर नागरिक सवाल पूछता है, लेकिन आश्रित नागरिक लाइन में लगा रहता है। यही कारण है कि युवाओं को मजबूत बनाने की जगह उन्हें योजनाओं पर निर्भर रखने वाली राजनीति लगातार बढ़ रही है।
मुफ्त राशन किसी भूखे आदमी की मजबूरी में सहारा हो सकता है, लेकिन किसी राष्ट्र का भविष्य नहीं।
जिस देश का युवा नौकरी की जगह राशन बचाने में अपनी जवानी खर्च कर दे, वहाँ समस्या गरीबी नहीं, व्यवस्था की नीयत होती है।
