ऊपर भौतिक विकास : भीतर बौद्धिक ह्रास!
शंभुनाथ
लेखक को कभी समाज का बौद्धिक-नैतिक प्रतिनिधि माना जाता था। अब उसकी जगह ले ली है टीवी चेहरों, सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसरों और डिजिटल कंटेंट राइटरों ने।
कृत्रिम दृश्यता पढ़ने को विस्थापित कर रही है। साहित्य पहले की तरह नागरिक जीवन का आकर्षण नहीं है। जाहिर है, जब समाज ही लेखकों को पढ़ना बंद कर देगा, उद्योगपति और व्यापारी उन्हें क्यों जगह देंगे! राजनेताओं ने भी उन्हें प्रमुखता देना बंद कर दिया, भले उनके लिए फिलहाल कुछ झुनझुनों का इंतजाम है। गांधी, जयप्रकाश नारायण, लोहिया जैसे नेता साहित्यकारों से मिलते थे। जवाहरलाल नेहरू एक बार बनारस में लेखकों से मिलने के लिए उनकी एक अंतरंग सभा में गए जहां प्रसाद और रामचंद्र शुक्ल उपस्थित थे। अब नेताओं को लेखक तुच्छ जीव लगते हैं।
पिछले लगभग पचास सालों की एक बड़ी घटना यह है कि साहित्य पढ़ने की संस्कृति का क्षय हुआ है। दुनिया में अंग्रेजी साहित्य के पाठक बढ़े हैं, हालांकि वे अमरीका और इंग्लैंड में उतने नहीं हैं जितने भारत में हैं। भारतीय भाषाओं का क्रीम पाठक वर्ग अपनी-अपनी मातृभाषा छोड़कर अंग्रेजी की तरफ चला गया है!
आमतौर पर खुद हिंदी लेखक हिंदी पुस्तकें नहीं खरीदते। वे लेखक हैं, इसलिए पुस्तकें मुफ्त चाहते हैं। विश्वविद्यालयों के शिक्षक पाठ्यक्रम से बाहर सामान्यतः नहीं झांकते। हिंदी अधिकारी-अनुवादक मशीन का पुर्जा बने-बने ही थक जाते हैं। हिंदी सेवियों के लिए हिंदी एक सरकारी गाय है, दूहो! ये सभी लोग संपन्न मध्यवर्ग के हैं, उनका यह रुख है!
यदि सभी लेखक, शिक्षक, हिंदी सेवी लोग संकल्प लेकर साल भर में सिर्फ 5 हजार रुपए की भी हिंदी किताबें अपने लिए खरीदें और पत्रिकाएं पढ़ें, हिंदी लहलहा जाए। पर नहीं, हिंदी पुस्तक खरीदना इस युग में अपना अपमान करना है!
फास्ट मनोरंजन ने गंभीर पाठकीयता को खोखला कर दिया है। इसका एक नतीजा है लोगों की मानसिक संरचना का बदल जाना। साहित्यिक कृतियां पाठक से कल्पनाशीलता, संवेदना और धैर्य की मांग करती हैं जबकि त्वरित मनोरंजन इन चीजों से विरत रखता है। वह क्षणभंगुर आकर्षणों की बाढ़ है जिसमें लोग आत्म-विच्छिन्न होकर बहे चले जाते हैं।
पाठक उपन्यास के पात्रों-विचारों में धीरे-धीरे उतरता है। प्रेमचंद या अज्ञेय-मुक्तिबोध जैसे लेखकों को पढ़ने का अर्थ है उनके साथ एक लंबी मानसिक यात्रा पर निकलना। सामान्यत: कविता का अर्थ धीरे-धीरे खुलता है जबकि शॉर्ट वीडियो, रील, मीम सहित मनोरंजन उद्योग की चीजें 20-30 सेकेंड के ऐसे उत्तेजक दृश्य सामने रख देती हैं कि यूजर हमेशा के लिए इस रोचक भूलभुलैये का कैदी हो जाता है। उसे उत्तेजना की इतनी लत लग जाती है कि वह अपनी गहराई खो देता है। उसकी तर्क, संवेदना और विवेक से सोचने की क्षमता मारी जाती है। वह हमेशा उत्तेजित करने वाली वस्तुएं खोजता है।
ऊपर भौतिक विकास-भीतर बौद्धिक ह्रास के दृश्य इधर प्रधान हो उठे हैं!
