जयपाल की दो कविताएं
(जेल में बंद आदि वासी कार्यकर्ता 84 वर्षीय फादर स्टैन स्वामी जेल प्रशासन की क्रूरता के कारण 5 जुलाई, 2021 को दम तोड़ गए थे! उनकी शहादत को सलाम को सलाम करते हुए… !)
फादर स्टैन स्वामी का जाना
काट दिया गया एक जंगल का पेड़
जिसके पत्तों में बजती थी जंगल की धड़कन
शाखाओं पर लटके रहते थे जंगल के संघर्ष
फूलों में बसती थी जंगल के हाथों की महक
फलों में रहती थी सपनों की मिठास
जो जोड़ता था
नदियों और पहाड़ों को
आदमी और जानवरों को
धरती और आकाश को
पैदा करता था एक संगीत
जिसकी लय में जीते थे आदिवासी
जिसके पास उग आती थी विद्रोह की घास चुपचाप
फैल जाती थी जंगल की आग की तरह
राजा के महल तक
खबर है
वह पेड़ फिर उग आया है
उसकी शाखाएँ फिर फैलने लगी हैं
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मजदूर और ईश्वर
मजदूर…
पेड़ के बीज में छिपा होता है
बन जाता है जड़, तना और पत्ते
महक जाता है फूल की तरह
पक जाता है फल की तरह
मिट्टी में उगता है
पलता है खेत में
बनता है फसल
दाने में ढलता है
पानी में रहता है
वाष्प में उड़ता है
बरसता है बारिश में
नदी सा बहता है
पृथ्वी-सा घूमता है
सूरज सा तपता है
चमकता है चांद-सा
तारे-सा दमकता है
मजदूर ईश्वर तो नहीं है
लेकिन कण-कण में रहता है

जयपाल की दोनों कविताएँ बेहतरीन हैं। फादर स्टेन स्वामी की स्मृति के साथ न्याय करती हैं। संभावना पर पूरी होती है। फादर स्टेन स्वामी के विचारों को मारा नहीं जा सकता।
वरिष्ठ जनवादी कवि जयपाल की पहली कविता में कविता में एक पेड़ को फादर स्टैन स्वामी के प्रतीक के रूप में कल्पित करते हुए एक पेड़ का जंगल से, नदियों से, धरती से, आकाश से, वातावरण से, धड़कन से रक्त से कैसे संबंध जुड़ता है यह बहुत ही विश्वसनीय तरीके से चित्रित किया गया है। कविता में जितना कहा गया है उससे ज्यादा पाठक की कल्पना के लिए छोड़ दिया गया है। और यही कविता की एक विशेष खूबी होती है।
ऐसा ही एक मजदूर का चित्रण एक रूपक के जरिए किया गया है जिसमें मजदूर के रूप में “श्रम की महिमा” का विस्तार और महत्व सुंदर काव्यात्मक विवरण के जरिए दर्शाया गया है जिसका निष्कर्ष यह है कि भगवान की तरह ही श्रम के रूप में श्रमिक की मौजूदगी प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, बस जरूरत उसको देखने पर रखने की दृष्टि की है।
दोनों बेहतरीन कविताओं के लिए जयपाल के कवि को बधाई और साधुवाद।