ओमसिंह अशफ़ाक की दो लोक-कविताएं
राम की महिमा
राम तो घट-घट बसै,उसे नहीं किसी से बैर !
जो ‘बणज’ करै हैं राम का,वो मांगै अपणी खैर !
राम लोक का और है,राजनीति का और !
प्रपंच रचै जो ‘नाम’ पै, वही राम का चोर !
कलुषित दिल में ना बसै,कभी राम और श्याम !
जो परोपकार में लीन है,उसे नहीं प्रपंचों से काम !
हम “सिया-राम” कहते रहे,उसनै सुणी ना एक !
अब वो उल्टी पड़ गई,”जयश्रीराम” की टेक !
गया सिकंदर महान रे बंदे !
वो भगवा पहन कै संत बणे नहीं,
जिस मन में बसै शैतान रे बंदे!
धन-सत्ता तो आणी-जाणी,
मत कर तू अभिमान रे बंदे!
‘तू और मैं किस खेत की मूली़,
वो गया सिकंदर महान रे बंदे !
मन की सोच्ची, मन में रहजा,
लिकड़ चलें जब पिराण रे बंदे!
सच के हक में बोलणा चाहिए,
ये माणस की पहचाण रे बंदे!
घणी खैंच्ची किसी दिन तो टूट्टेगी,
मत सबर का ले इम्तिहान रे बंदे!
हमने किसी तै बोल के लेणा?
हम मुफ़लिस तो इंसान रे बंदे!
सब अपणे करतब की रोट्टी खावैं,
इसमें किसका के एहसान रे बंदे!

ओमसिंह अशफ़ाक की ये दोनों कविताएँ जनता की जुबान पर जगह पाने की क्षमता रखती हैं।
कवि को धन्यवाद और अभिनंदन।
कवि के व्हाट्सएप पर नारनौल निवासी वरिष्ठ कवि व पत्रकार रघुवेन्द्र यादव जी ने यह टिप्पणी भेजी है :
“लोक के राम और राजनीति के राम अलग अलग हैं।” सही लिखा है, सर।
“यहां कोई स्थाई नहीं है, इसीलिए इसे नश्वर संसार कहा जाता है। सबको जाना है, मगर लोग भूल जाते हैं।”
-रघुवेन्द्र यादव, कवि एवं पत्रकार, नारनौल (महेंद्रगढ़) हरियाणा।
हम बहुत ही विनम्रता के साथ दोनों लोक-कविताओं पर बहुत ‘संक्षिप्त मगर सार्थक’ टिप्पणी करने वाले प्रतिष्ठित लेखक डा. बजरंग बिहारी तिवारी और श्री रघुवेन्द्र सिंह यादव जी का स्वागत और हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।
साथ-साथ उनसे और अन्य लेखकों-पाठकों से भी विनती करते हैं कि वे सब रचनाओं पर अपनी राय देंगे तो रचनाओं की उत्कृष्टता बढ़ेगी और हमें खुद में भी सुधार करने का अवसर मिलेगा।
“प्रतिबिंब मीडिया’ के नियमित और संजीदा पाठक श्री सुरेंद्रपाल तोमर की निम्न टिप्पणी प्राप्त हुई है। हम श्री सुरेंद्र पाल जी का बहुत-बहुत स्वागत और आभार व्यक्त करते हैं:
“अच्छी व सामयिक कविता है, राम लोक का और है राजनीती का और…नेताओं ने गड़ मड़ करके लोगों को भर्मित कर दिया है. जनता को असलियत पहचाननी चाहिए.धन्यवाद ”
-सुरेंद्र पाल तोमर, भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।