ओमप्रकाश तिवारी की कविता – धन की प्यास 

कविता

धन की प्यास

ओमप्रकाश तिवारी

 

पानी जिंदगी के लिए जरूरी है

शरीर में जब पानी की कमी होती है

तब प्यास लगती है

पानी पीना पड़ता है

जिंदगी जीने के लिए

 

पैसा भी चाहिए जिंदगी जीने के लिए

लेकिन प्यास में नहीं बदलनी चाहिए

पैसे की प्यास कभी नहीं बुझती

 

छोटी छोटी ग़लतियाँ

करवाती है

एक दिन बड़ा हादसा

फिर सब बर्बाद हो जाता है

 

मनुष्यता और इंसानियत की दुश्मन है

पैसे की प्यास

ज़रूरत के नाम पर यह

लालच बनकर सामने आती है

फ़िर ठगता और ठगा जाता है मानव

 

पैसे की आभा चमत्कृत करती है

इसी चक्कर में फंसे हैं लोग

मोह-माया-त्याग-मोक्ष सब मिथ्या है

कहने वाले लोग भी इसी में लगे हैं

लगे ही नहीं लगा कर रखा है

 

ये लोग सच नहीं बोलते

न ही बताते हैं

बातों-बातों में भरमाते हैं

सबको लगा रखा है काम पर

मोक्ष और त्याग का प्रवचन चालू है

 

आगे बढ़ने की होड़

सफल होने की प्यास

बड़ा बनने की लालसा

श्रेष्ठ होने का अभिमान

प्रभुत्व बढ़ाने की अभिलाषा

 

जोड़-तोड़ येन-केन प्रकारेण के

रास्ते से गुजरते हैं

निजी संपत्ति को

अकूत बनाने की प्यास

राष्ट्र निर्माण तक ले आई

मानव सभ्यता को

सत्ता तंत्र पर काबिज होकर

अपने इर्द गिर्द घूमने वालों को

मालामाल बनाने वाली

व्यवस्था बनाकर

 

बढ़ाई और बचाई जा रही है निज़ी संपत्ति

आकूत संपत्ति की प्यास

कभी नहीं बुझती

बुझाई भी नहीं जा सकती

यह प्यास खुद बुझाने के ग़लत रास्ते खोजती है

लेकिन कभी नहीं बुझती

 

यह पानी वाली प्यास नहीं है

पानी की प्यास जिंदगी के लिए होती है

धन की प्यास समाज पर प्रभुत्व के लिए होती है

 

प्रभुत्व प्यास से निकल कर

नशा बन जाता है

नशा मनुष्यता के लिए

घातक होता है

विनाश की ओर ले जाता है।

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