स्वास्थ्य की बात
आज का दौर और हमारी सेहत
रणबीर सिंह दहिया
भारत की और हरियाणा के स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे में भी व्यापक स्तर की पुनर्गठन की प्रक्रियाएं जारी हैं और पिछले दशक से और तेजी पकड़ रही हैं। बड़े पैमाने पर प्राइवेट मेडिकल सेक्टर का फैलाव, स्वास्थ्य सेवाओं में प्रेवेट इंश्योरेंस कम्पनियों की दखलन्दाजी, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में मेडिकल सर्विसेज के लिए पेमेंट सिस्टम की शुरुआत पिछले दशकों में हुई तीन मुख्य तबदीलियां हैं।
मेडिकल एजुकेशन का बड़े पैमाने पर व्यापारीकरण साफ नजर आने लगा है जब कई राज्यों में प्राइवेट मेडिकल कालेजों में एम बी बी एस कोर्स की फीस दो करोड़ रुपये कर दी गई है। हरियाणा के बुढ़ेड़ा मेडिकल कालेज में भी एक करोड़ की फीस बताई जा रही है।
जिस तेजी के साथ ये बदलाव आ रहे हैं इससे एक संशय की बड़ी जगह संवेदनशील दिमागों में बनती है। हो सकता है कि यदि हम उस रफ्तार से चले तो आने वाले कुछ वर्षों में हम स्वास्थ्य क्षेत्र में अमरीकी मॉडल जो कि बहुत मंहगा है, मुनाफे से संचालित है, तकनीक;टेक्नोलोजी इंटेंसिव है, अन्यायपूर्ण व ना बराबरी पर टिका हुआ है, को भारत वर्ष में प्रस्थापित कर देंगे।
पूरी पूरी सम्भावना है कि बहुत जल्द ही हमारा स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जायेगा। हम में से काफी लोग यह भी महसूस करते हैं कि इससे उपजा असंतोष जन मंचों के माध्यम से अभिव्यक्ति पा रहा है और आने वाले समय में और तीखे स्वरों में उठाया जायेगा।
इसमें एक हैरानी की बात यह है कि सरकारें तथा उनकी एजेंसियां भी इस कोरस में शामिल हो रही हैं। ( शायद निजी करण को सपोर्ट करने के लिए) गुड गवर्नेंस के सिद्धान्त पर चलते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की दोहरी व्यवस्था- एक अमीरों के लिए और एक गरीबों के लिए- के नियम को आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि समता के मसले को आसानी से टैकल किया जा सके बिना उस प्रक्रिया के साथ छेड़खानी किये बगैर जिसके चलते विनिवेश की प्रक्रिया चालू रही रहे।
