लोकधर्मी नफ़ासत का कवि : भगवत रावत

(13-9-1939 — 25-5-2012)

लोकधर्मी नफ़ासत का कवि : भगवत रावत

ओमसिंह अशफ़ाक

विकास नारायण राय द्वारा सम्पादित भगवत रावत की ‘निर्वाचित कविताओं’ का संग्रह आज मेरे बुक-रैक में मुझे दिखाई पड़ा, तो मैं देखता ही रह गया।

एक बार फिर सारी यादें ताज़ा हो गईं। इस कविता संग्रह की कई कविताओं—‘कटोरदान’, ‘मालिक और नौकर’, ‘मेरे शहर के बीच’, ‘18 बरस’, ‘सजा हुआ कमरा’, ‘वह कुछ हो जाना चाहता है’, ‘दुख’, ‘समुद्र के बारे में’, ‘हे बाबा तुलसी दास’ आदि का सामूहिक पाठ हमने उनकी स्मृति में आयोजित 9 जून 2012 की कुरुक्षेत्र गोष्ठी में किया था।

संग्रह के अंतिम कवर पर छपी भगवत जी की फोटो मैं काफ़ी देर तक देखता रहा। ऐसा लगा जैसे भगवत जी भी मुझे दूर से देख रहे हैं और पहचानने की कोशिश कर रहे हैं।

कैसे पहचान पाते? वे इतने बड़े कवि-चिंतक और मैं एक गुमनाम-सा अनाड़ी लेखक। मुश्किल से दो-एक बार समूह में ही मुलाकात हुई थी। उस वक्त भी अपनी कहने की कोई हैसियत नहीं थी, सो तो आज भी नहीं है।

लिहाज़ा मूकदर्शक की तरह उनके मुख से निकलने वाले चंद शब्दों की प्रतीक्षा रही कि शायद गुरुमंत्र जैसी कोई चीज़ हाथ लग जाए और मैं उसे तुरंत लपक लूं।

वे शायद कम ही बोलते थे। उस दिन भी कम बोले, एक आध वाक्य, वह भी बातचीत के प्रसंग में ही।

पुस्तक खोलते ही सबसे पहले इस कविता से पाठक की भेंट होती है, जो उनके चिंतन की दिशा और कविता की प्रहार-शक्ति का पता देती है—

‘यह जानते हुए कि सबने/ अपने-अपने कपड़े उतार दिए हैं/ तब यह कौन/किसके लिए लाज से मरा जा रहा है / जब सबके पास अपने-अपने आईने हैं/ तब यह कौन किसकी आत्मा को दर्पण दिखा रहा है/..

‘दिल हो दिमाग हो या खून/जब जमता जा रहा है सब कुछ / तब यह कौन किसके लिए बर्फ की तरह पिघला जा रहा है’/..

संकलन में 130 से ज्यादा कविताएं हैं। एक से बढ़कर एक संवेदना के भीतर उतर जाने को आतुर। कहां से शुरू करें, पढ़ें, कहां समाप्त। उनके पास ‘एक्स-रे’ वाली दृष्टि थी। कौन हिरामन और कौन रूप कुमार है, वे स्पष्ट पहचान लेते हैं—

‘आओ हिरामन/आओ हिरामन/ इतने गुमसुम-गुमसुम क्यों हो/ कुछ तो गप्प सुनाओ हिरामन/ तुमने जब अपने बैलों पर हाथ उठाया/ क्या बोली थी हीराबाई/ क्या कहकर बरजा था तुमको/..

‘ठीक उस समय भी क्या तुमने उसका चेहरा देखा था/हीराबाई के उस मन का/कुछ तो मर्म बताओ हिरामन/बैठो अपना हाल बताओ/..

‘कितने दिनों बाद मिले हैं/सब कुछ कितना बदल गया है/ संगी-साथी बिछड़ गए हैं/कोई तो मुँह मोड़ गया है/ कोई बीच में छोड़ गया है/’…

अब ज़रा रूप कुमार से भी मिल लेते हैं। सवाल ये भी है कि ये रूप कुमार आते कहां से हैं? भगवत जी बताते हैं—

‘हर शहर के होते हैं/अपने-अपने रूप कुमार/किन्तु बिरले होते हैं, वे जो उड़ते-उड़ते हो जाते हैं अंतर्राष्ट्रीय/ और कहलाने लगते हैं/भगवान रूप कुमार/..

‘उनकी वाणी में अमृत होता है/ आँखों में सम्मोहन/चेहरे पर तेज/ और हाथों में चमत्कार’/…

इसी कविता में भगवत जी रूपकुमारों की करतूतें बताना भी नहीं भूलते—

‘आदमी तो अपनी लड़ाई लड़ रहा है/और रूप कुमार जी उसके आईने में/अपनी छवि निहार रहे हैं/ आदमी तो चीज़ों को अपना कहना चाह रहा है/और रूपकुमार जी उसकी इच्छा में/ स्वामित्व का उत्सव मना रहे हैं/..

‘आदमी तो अपनी पहचान के लिए जूझ रहा है/और रूपकुमार जी उसकी आड़ में/अपना झंडा फहरा रहे हैं।..

भगवत जी हमें कविता पढ़ने का सलीका सिखाना भी नहीं भूलते हैं—

‘दुनिया की आपाधापी से बच-बचाकर/बड़ी मुश्किल से पहुँचती हैं आपके पास कविताएं/ उनसे हड़बड़ी में न मिलें/ कम से कम अपना पसीना सुखा लें..

‘इतना समय उन्हें दें/उन्हें बस इतना अपना हो लेने दें/कि वे आपसे बातचीत किए बिना/ वापिस न जाएं/..

गौरतलब बात ये भी है कि भगवत रावत जी ने यह संग्रह एक पिता की ओर से दुनिया की सारी बेटियों को समर्पित किया था- केवल प्रज्ञा को नहीं। प्रज्ञा उन सबमें एक है। कितनी विशाल है विराट-कवि की दृष्टि! कितना विराट है उसका परिवार। बहुत खूब! कौन कह सकता है कि हिंदी में अब बड़े कवि नहीं होते हैं? अमर हो गई हैं भगवत रावत की कविताएं।

(जून,2012)

 

 

लेखक- ओमसिंह अशफ़ाक

 

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