आज का समय और कविता की ताकत-2

कुछ निजी प्रसंग-2

आज का समय और कविता की ताकत-2

ओमसिंह अशफ़ाक

 

यह, दूसरी घटना सन् 2006 की है। ‘जतन’ पत्रिका का प्रकाशन उन दिनों कुरुक्षेत्र से होता था।

‘जतन’ का अंक 46 (जुलाई-सितम्बर 2006) छपा, तो उसके वितरण का सबाल सामने आया।

प्रो. राजबीर पराशर को रोहतक किसी मीटिंग में शामिल होने जाना था।

फैसला हुआ कि रोहतक और उसके आसपास के जिलों के पाठकों के दो बंडल प्रो. राजबीर बस में अपने साथ लेते जाएंगे, इससे डाकखर्च बच जाएगा।

वज़न भी था और बंडल भी दो थे। इसलिए प्रो. राजबीर ने रोहतक बस अड्डे से ‘सर्च’ कार्यालय तक रिक्शा कर ली।और बंडल उसमें रखकर बैठ लिए।

पता नहीं उनको क्या सूझी कि टाईम पास के लिए बंडल में से एक पत्रिका निकाल ली और पढ़ने लगे।

तभी उनकी नजर- ‘बंदा रिक्शा खींच रहा है’ कविता पर पड़ी और उन्होंने कविता रिक्शा चालक को सुनानी शुरू कर दी।

रिक्शा-चालक ध्यान से कविता सुनता रहा और रिक्शा भी चलाता रहा।

सामने से कोई भारी वाहन आता तो रिक्शा धीमा करके कच्चे में उतार लेता पर कविता से कान नहीं हटाता?

दस-पंद्रह मिनट में सर्च का दफ्तर आ गया तो प्रोफेसर राजबीर ने रिक्शा चालक से किराया पूछा।

चालक ने उल्टा उनसे उस किताब (पत्रिका को उसने किताब ही समझा) की कीमत पूछी,जोकि दस रुपए थी।

रिक्शा चालक ने कहा कि ‘बाबू जी, यहां तक का भाड़ा भी दस रुपए ही है। आप हमें नकद की बजाए यह किताब ही दे दो, हिसाब बराबर हो जाएगा।’

पाठक भी यहां उक्त कविता के जरिए रिक्शा चालक की संघर्षमय जिंदगी से साक्षात कर सकते हैं। और अपने समाज की आर्थिक-सामाजिक विषमताओं का कुछ जायजा ले सकते हैं।

निःसंदेह ऐसी स्थितियां किसी देश के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हो सकती हैं।

कविता किंचित संक्षिप्त रूप में यहां उद्धृत है:

बन्दा रिक्शा खींच रहा है

1

नया-नया किसी गांव से आया।

लगता है झिझका शरमाया।

ना रहने का कोई ठौर ठिकाना।

यूं शहर लगे उसको बेगाना।

संदर-सुंदर भवन बणे हैं।

ना रहते उनमें कई जणे हैं।

अभी,पास भवन के एक खड़ा है।

(देखो) लगता कैसा बड़ा बड़ा है।

क्या बाहर निकल कोई कह सकता है?

हां, तू भी इसमें रह सकता है!

बन्दा रिक्शा खींच रहा हैं !

 

2

जब उजड़ गांव से शहर में आया।

था पहली नजर में उसको भाया।

मुफ़्त की टूटी यहां चलती है।

दिन में भी बिजली जलती है?

चीजों की इफ़रात यहां है।

अब गांव में ऐसी बात कहां है।

शहर की तो है बात ही न्यारी।

खत्म हुई समझो दुश्वारी ?

निश-दिन मेहनत रोज करूंगा।

पीछे भी कुछ भेज सकूंगा

बन्दा रिक्शा खींच रहा है !

 

3

रिक्शे पर ही सो लेते हैं।

फिल्म देख खुश हो लेते हैं।

रेहड़ी पे खाना, खा लेते हैं।

टूटी पर ही नहा लेते हैं।

सच्ची बात बता देते हैं।

कभी पव्वा एक चढ़ा लेते हैं।

फिर ना मच्छर भी काटे हैं।

नींद में ठाठे-ही-ठाठे हैं!

फिक्र हमारी तुम ना करना।

उस जालिम की नजर से बचना।

नाम है जिसका ठाकुर रतना!

पूरा होगा, एक दिन सपना।

जी को अपने वश में रखना।

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

 

4

अरे,शहर में वो अपवाद नहीं है।

इकला ही बर्बाद नहीं है।

जब मोड़ से उसने रिक्शा मोड़ा।

लेबर चौक था-आगे थोड़ा।

वहां फौज कमेरी खड़ी हुई थी।

बाजू से बाजू अड़ी हुई थी।

कोई लिए हाथ में छैणी-हथौड़ी।

कोई कूची-ब्रश और बांस की घोड़ी।

कोई साथ लिए था,छोटी-सीढ़ी।

कोई बेच रहा था, मूढ़ा-पीढ़ी।

थी नज़र किसी की गाहक पे पैनी।

कोई पीता बीड़ी, मलता खैनी।

अरे,भूख ने यहां पे ला पटका है।

धंधा ना उसका पुश्तैनी।

ना ‘ऊँचे कुल’ में जन्म हुआ।

क्या इसीलिए उसे “नीच” कहा है?

बन्दा रिक्शा खींच रहा है !

 

5

ये रिक्शा ना उसका अपना है।

अभी स्थगित ये सपना है।

पर धीरे-धीरे हो जाएगा।

फिर पूरी कमाई खुद खाएगा।

ना मालिक को कुछ देना होगा।

शहर में घर एक लेना होगा।

फिर ना मारेगा कोई सिपाही।

ना ताड़ेगा कोई दरोगा !

आह! मुट्ठी दोनों भींच रहा है।

बंदा रिक्शा खींच रहा है !

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