वर्तमान हालात पर तीखा व्यंग्य करतीं ग़ज़लें

तल्ख़ियां : वर्तमान हालात पर तीखा व्यंग्य करतीं ग़ज़लें

मनजीत सिंह

प्रवीण फ़कीर द्वारा रचित ग़ज़ल संग्रह तल्ख़ियां का समीक्षा करने का अवसर मिला जो आज खुशी की अनुभूति हो रही है।जो साहित्य ग्राम प्रकाशन बिलासपुर छत्तीसगढ़ द्वारा प्रकाशित किया गया है यह भी भाग्यशाली हैं किताब के पन्नों से –

बढ़ गई जो बात थी वो बात देखिए,

किस तरह बिगड़े यहाँ हालात देखिए।

बेच डाली चूड़ियाँ माँ की चुरा कर,

गिर गई औलाद की औकात देखिए।

चार सूँ खामोशियाँ हैं फुसफुसाती,

खौफ़ में पलते हुए जज़्बात देखिए।

किस के कहने पर यहाँ दंगे हुए हैं,

इस सियासत की बदलती जात देखिए।

यह कविता समाज और देश की वर्तमान परिस्थितियों पर तीखा व्यंग्य करती है। कवि बताता है कि छोटी-छोटी समस्याएँ अब गंभीर रूप ले चुकी हैं और समाज के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। लोगों में नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है, यहाँ तक कि स्वार्थ के लिए अपने ही परिवार और संस्कारों की उपेक्षा की जा रही है। चारों ओर भय और खामोशी का वातावरण है, जिसके कारण लोग अपने मन की बात खुलकर नहीं कह पाते। कवि राजनीति की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों पर भी कटाक्ष करता है और संकेत देता है कि दंगे-फसाद अक्सर राजनीतिक हितों से प्रेरित होते हैं। अंत में वह किसानों और मज़दूरों की पीड़ा को चित्रित करता है, जिनके सपने प्राकृतिक आपदाओं और कठिन परिस्थितियों के कारण टूट जाते हैं। उनकी आँखों से बहते आँसू उनकी बेबसी और दुःख को प्रकट करते हैं। इस प्रकार कविता समाज की समस्याओं, राजनीतिक स्वार्थ, नैतिक पतन तथा किसानों-मज़दूरों की दयनीय स्थिति को उजागर करती है और पाठकों को इन विषयों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

 

कहीं हिन्दू कहीं मुस्लिम बताया जा रहा है,

इक ऊँचे पेड़ को जड़ से हिलाया जा रहा है।

नई बस्ती जहाँ तामीर करने का अहद था,

पुरानी को वहाँ ज़िंदा जलाया जा रहा है।

सियासी खेल में शामिल सभी दल चीखते हैं,

उन्हें इस खेल का मोहरा बनाया जा रहा है।

गरीबों को दिया राशन गिना देते हैं साहिब,

ज़मीनों ज़र अमीरों पर लुटाया जा रहा है।

प्रवीण फ़कीर की यह कविता समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता, राजनीतिक स्वार्थ, सामाजिक अन्याय और जनता के शोषण पर तीखा प्रहार करती है। कवि कहता है कि लोगों को धर्म के आधार पर बाँटा जा रहा है, जिससे समाज की एकता और भाईचारा कमजोर हो रहा है। जिस समाज को मजबूत और विकसित बनाने का वादा किया गया था, वहीं पुराने मूल्यों और बस्तियों को नष्ट किया जा रहा है।

कवि राजनीति की ओर संकेत करते हुए बताता है कि आम जनता को राजनीतिक खेलों का मोहरा बनाया जाता है। गरीबों को थोड़ी-सी सहायता देकर उसका प्रचार किया जाता है, जबकि असली लाभ अमीरों और प्रभावशाली लोगों को पहुँचाया जाता है।प्रेम और सच्ची भावनाओं को भी गलत समझा जाता है तथा सच्चाई बोलने वाले कवियों और विचारकों को बदनाम किया जाता है। अंत में कवि कहता है कि राजनीति में ही प्रतिष्ठा और धन का बोलबाला है, जबकि जनता से वास्तविक सच्चाई छिपाई जाती है।

वो नश्शो-पा को अपने मिटा कर नहीं गया,

अहसास की ज़मीं को भुला कर नहीं गया।

जाना था उसको जान से, वो जान से गया,

लेकिन पता वो अपना बता कर नहीं गया।

मैं मर गया हूँ इसकी तसल्ली थी क्या भला,

जाते हुए वो मुझको हिला कर नहीं गया।

कमियाँ हज़ार मेरी निकाला किये था वो,

लेकिन मेरा क़ुसूर बता कर नहीं गया।

यह कविता विरह, पीड़ा और बिछड़ने के दुःख को व्यक्त करती है। कवि अपने प्रिय व्यक्ति के जाने के बाद की मनःस्थिति का वर्णन करता है। वह कहता है कि जाने वाला व्यक्ति उसकी भावनाओं और यादों को मिटाकर नहीं गया, बल्कि उन्हें और गहरा कर गया।कवि को सबसे अधिक दुःख इस बात का है कि वह व्यक्ति बिना कोई कारण बताए चला गया। वह उसकी कमियाँ तो गिनाता रहा, परन्तु वास्तविक दोष कभी नहीं बताया। उसके जाने से कवि का अस्तित्व और जीवन प्रभावित हुआ, फिर भी उसने जाते समय कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। कवि यह भी कहता है कि जाने वाले को समाज की बदनामी का डर नहीं था, क्योंकि उसने प्रेम की निशानियों (ख़तों) को भी नष्ट नहीं किया। अंत में कवि अपनी शिकायत व्यक्त करता है कि वह व्यक्ति अपना सब कुछ समेटकर चला गया, लेकिन उसके अधिकार और हिस्से की खुशियाँ लौटाकर नहीं गया।

मार कुदरत की पड़ी तो हाल ढीले हो गए,

जो नगर आबाद थे वो आज टीले हो गए।

इस बदलते दौर का ऐसा पड़ा इन पर असर,

आज मेरे दौर के बच्चे हठीले हो गए।

याद करके जाम के बरसी आँख मेरी इस बरस,

ख़त तेरे अहसास के थे जो वो गीले हो गए।

क्या पता कैसी नशीली ये हवाएँ चल पड़ी,

नौजवां सूखे हुए पत्तों से पीले हो गए।

सूखी रोटी उसके ऊपर इश्क़ डली गुड़ की लिए,

बोल मेरे गाँव वालों के रसीले हो गए।

इस कविता में कवि ने प्रकृति के प्रकोप, बदलते सामाजिक वातावरण, युवाओं की स्थिति और प्रेम की भावनाओं का चित्रण किया है। कवि कहता है कि जब प्रकृति का प्रहार होता है तो बड़े-बड़े समृद्ध नगर भी नष्ट होकर मिट्टी के ढेर बन जाते हैं। बदलते समय का प्रभाव लोगों के स्वभाव पर भी पड़ा है, जिससे नई पीढ़ी अधिक जिद्दी और असहिष्णु होती जा रही है।कवि अपने अतीत की यादों में खो जाता है। प्रिय व्यक्ति के पत्र और उनसे जुड़ी भावनाएँ आँसुओं से भीग जाती हैं। वह युवाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहता है कि नकारात्मक वातावरण के कारण उनका उत्साह और ऊर्जा कम होती जा रही है।कविता में गाँव के जीवन की सादगी और प्रेम का भी सुंदर चित्रण है। सूखी रोटी और गुड़ जैसे साधारण भोजन में भी अपनापन और मिठास है, जिससे गाँव वालों की बोली भी मधुर लगती है। आगे कवि बताता है कि शहरों का बिगड़ता वातावरण और कठिन परिस्थितियाँ लोगों को अपने घर-बार छोड़ने पर मजबूर कर देती हैं।अंत में कवि अपनी प्रेम-भावना व्यक्त करता है और कहता है कि प्रिय से मिलना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। प्रेम के रास्ते अब काँटों से भरे प्रतीत होते हैं।

पुस्तक परिचय

किताब – तल्ख़ियां (ग़ज़ल संग्रह)

शायर- प्रवीण फ़कीर 

समीक्षक  –  मनजीत सिंह 

प्रकाशन – साहित्य ग्राम प्रकाशन, बिलासपुर,छत्तीसगढ़ 

क़ीमत – दो सौ रुपए भारतीय 

संस्करण – पहला 

समीक्षक – मनजीत सिंह

मनजीत सिंह ,सहायक प्रोफेसर उर्दू , कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *