भारतीय समाज वैदिक काल से ही वर्ग-विभाजित समाज रहा है। यहां “आदर्शवाद और यथार्थ” में न केवल बड़ा फासला रहा है बल्कि ये हमेशा दोनों एक-दूसरे के विरोधी दिखाई देते रहे हैं। भारत का विकास में पिछड़ने का एक कारण शायद यह भी हो सकता है कि हमारे नीति निर्माताओं ने “आदर्श की अवधारणा” बनाते वक्त “जमीनी यथार्थ” की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा है। संभवत इसीलिए हमारे आदर्शवादी सपने बिखरते रहे हैं क्योंकि उनका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं रहा है। वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की यहां प्रस्तुत कहानी ‘पलायन’ में भी हमें कुछ ऐसा ही परिदृश्य दिखाई पड़ता है : संपादक।
कहानी
पलायन
ओमसिंह अशफ़ाक
” रैतन!..अरे,ओ रैतन !… ज़रा सुनियो बेटा” बापू ने दूसरी बार आवाज दी तो रतन सिंह खेतों के बीच से गुजरने वाली इस पगडंडी पर दो एकड़ का फासला तय कर चुका था। अपने गांव से दो मील दूर के रेलवे स्टेशन से उसे गाड़ी पकड़नी थी। फिर नसीरपुर के रूरल बैंक में पहुँच कर ज्वाइनिंग रिपोर्ट देनी है। उसकी चिर-प्रतीक्षित अभिलाषा पूरी होनी जा रही है। उससे भी ज्यादा खुशी है उसके बूढ़े बाप निहालसिंह को। उसकी आंखों में छलछलाती प्रसन्नता को ऐनक के मोटे शीशों के उस पार भी बखूबी पढ़ा जा सकता है। हालांकि बापू ने अपनी साठ-साला जिन्दगी में खुशी के कई मौके गमी में बदलते देखे हैं। शायद उन्हीं तीखे अनुभवों का एहसास उन्हें इस मौके पर बाह्य रूप से खुशी की अभिव्यक्ति नहीं करने दे रहा है। उनके दिल में ज्वार-भाटे उठते हैं, लेकिन चट्टानी किनारे की तरह वे उनको बिना प्रकट किये अन्दर ही अन्दर झेले जा रहे हैं। फिर भी उनकी आंखों में आयी अपूर्व चमक और व्यवहारगत असामान्यता से उनके उत्साह का कुछ आभास जरूर हो जाता है। शरीर रूई की माफिक हल्का-फुल्का लग रहा है और चाल में बिजली की-सी फुर्ती आ गयी है।
रतनसिंह बापू की आबाज पर पुनः ठिठक गया है। बापू तेजी से उसके निकट झपट रहे हैं। निहालसिंह परदेश जाते बेटे को एक बार छाती से लगाकर गर्मी का एहसास कर लेना चाहते हैं- इस उम्र में जिन्दगी का क्या भरोसा ? खेत का डला है न जाने कब भीग जाये। इसी इरादे से उन्होंने रतनसिंह को आवाज दी थी। हिम्मत करके फुर्ती से लम्बे-लम्बे डग भरते हुए उसकी तरफ बढ़े भी थे। लेकिन निकट पहुँचते-पहुँचते फिर संयत हो जाते हैं। जो रतनसिंह अभी तक छोटा-सा बच्चा लग रहा था, पास पहुँचते-पहुँचते वह उन्हें भरा-पूरा नौजवान दिखने लगता है। और वे पुनः संकोच करके झिझक जाते हैं।
रतनसिंह जानता है कि बापू क्या कहेंगे। फिर भी निकट आते ही पूछ लेता है, “क्या बात है बापू !” यह सीधा सवाल उन्हें फिर तनिक विचलित कर देता है और पुनः वही पुराना जवाब दोहरा जाते हैं…” कुछ नहीं बेटा… बस, यही कह रहा था कि रेल मोटर में तनिक संभल कर बैठना। जब खड़ी हो जाये तभी रेल में चढ़ना। टेशन का फर्श भी बहुत चिकना होता है। अनजाने ही पैर फिसल जाया करता है…।” और निहालसिंह को झटका-सा लगा। अचेतन में ही उन्हें खड़े-खड़े लगा-जैसे उनका पैर फिसल गया हो। रतनसिंह के कंधे का सहारा लेकर वे संभल गये। फिर उसकी पीठ और सिर पर आशीवीद का हाथ फेरा मानो अपनी भरपूर शक्ति के साथ बेटे को संपूर्ण सुरक्षा का कवच पहना देना चाहते हों। अव्यवस्थित गले से मंगलकारी शब्द निकले – जाओ बेटा, परमात्मा तुम्हें सुखी रखे। पहुँचते ही चिट्ठी जरूर डाल देना…देख भूलना नहीं, जाते ही लिख देना…।”
रतनसिंह बापू की भावनाओं को कई वर्ष पहले ही समझने लगा था। उसे बापू के चुकते हुए शरीर और सामर्थ्य का एहसास तब हो गया था, जब वह बी०एस०सी० (एग्रीकल्चर) की अन्तिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। उस दिन रात के ग्यारह बजे ही उसने लैम्प बुझा दिया था और बापू से सुबह तीन बजे जगा देने के लिए कह कर चद्दर से मुंह ढाँप कर सो जाने का प्रयास करने लगा था। लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। फर्स्ट-पोजीशन छीन लिये जाने की आशंका उसे सता रही थी बी०एस०सी० प्रथम तथा द्वितीय वर्ष की परीक्षाओं में उसने थ्योरी के पेपर्स में अस्सी प्रतिशत अंक लिये थे लेकिन प्रेक्टिकल्स के पेपर्स में बेहतरीन परफोर्मेंस के बावजूद उसे पचास प्रतिशत अंक ही मिल पाये थे। दरअसल जिनेटिक्स के विभागाध्यक्ष बी०एस०सी० के ही एक अन्य छात्र रामबलीसिंह को फर्स्ट-पोजीशन दिलवाना चाहते थे क्योंकि उक्त छाल रिश्ते में उनका साला लगता था।
थ्योरी के पेपर्स में रामबली सिंह को कभी 60% से अधिक अंक नहीं मिले थे, लेकिन प्रैक्टिकल्स में उसे नब्बे पचानबे प्रतिशत अंक दिलवाये जाते थे। यह बात अलग है कि खुद जैनेटिक्स में ही रामबलीसिंह को “मैन्डलल्स लॉ आफ इन्हेरिटैंस” भी एक अरसे तक याद नहीं हो पाये थे।
उसी कालिज में प्रोफेसर धीरजसिंह तैराक इकॉनामिक्स के काबिल प्रोफेसर थे। कक्षा में जब अर्थशास्त्र के मूल सिद्धान्तों की व्याख्या करते तो समां बंध जाया करता था। एग्रीकल्चर इकॉनामिक्स के पीरियड में एक दिन रतनसिंह ने पूछ लिया था- क्या चौधरी चरणसिंह भी एक योग्य अर्थशास्त्री नहीं हैं? इस पर क्लास में ठहाका लग गया था। लेकिन प्रोफेसर तैराक संयत रहे थे। उन्होंने कहा था- हाँ हो सकते हैं, लेकिन उनकी सोच प्रगतिशील नहीं है। इस पर रतनसिंह काफी देर तक प्रो० तैराक के साथ वाद-विवाद करता रहा था और प्रो० तैराक उसे संतुष्ट करने का प्रयत्न करते रहे थे। लेकिन रतनसिंह के विचारों पर जातिगत संस्कारों का प्रभाव था और प्रो० तैराक उसे किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से चरणसिंह विरोधी लगते थे। इसलिए उस समय वह उनकी बातों से सहमत नहीं हो सका था। एक कारण और भी था-प्रो० तैराक कम्युनिस्ट माने जाते थे और कम्युनिस्टों के बारे में रतनसिंह के दिमाग में बहुत सारी भ्रान्तियां थीं।
इन्हीं प्रो० तैराक ने एक दिन रतनसिंह को बताया था हो सकता है कुछ लोगों को तुम्हारी प्रगति से ईर्ष्या हो। वे तुम्हें सफलता के शिखर पर देखना न चाहते हों। लेकिन तुम में पस्त हिम्मती नहीं आनी चाहिए। तुम्हारी योग्यता तो कोई तुमसे छीन नहीं सकता ? संघर्ष का दूसरा नाम ही जीवन है, और हर व्यक्ति को आजीवन संघर्ष के लिए तत्पर रहना चाहिए। जिन्दगी में संघर्ष के रास्ते पर तुम जितना आगे बढ़ोगे, अर्थशास्त्र और राजनीति के सम्बन्ध तुम्हें उतने ही करीब से समझ आने लगेंगे। मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ हैं।
लगभग एक घंटे बाद बापू ने अन्दाजा लगाया कि रतन सिंह सो चुका होगा। उसने पास ही चारपाई पर लेटी रतनसिंह की माँ को जगाया” इतनी जल्दी सो गई है, क्या?” “नहीं तो”, माँ ने झपकी लेकर हड़बड़ाहट में कहा।
फिर निहाल सिंह ने अपने दिल के उद्गार उड़ेलने शुरू कर दिये थे, “बस अब तो कुछ ही महीनों की बात रह गई है, रैतन की माँ-सब दुःख छँट जायेंगे। तीन महीने बाद रैतन का नतीजा आ जायेगा। अव्वल निकलेगा, मुझे पूरा भरोसा है। जहाँ इतनी झेली हैं, कुछ महीनों की तंगी और सही। फिर बेटे की बढ़िया नौकरी लग जायेगी। बड़ा हाकिम बन जायेगा। तनख्वाह भी अव्वल दरजे की होगी। तभी पन्दह सेर दूध की एक भैंस लूँगा। बूढ़े बैल की जगह दो दाँत नये बछड़े ले लूंगा। झुंगे को अब और नहीं जोतूंगा। बहुत कमाया है इसने। पूरे दस साल मेरे साथ खटता रहा है। जिस तरह रैतन मेरी सेवा करेगा, उसी तरह मैं झुंगें (बैल) की सेवा करूंगा। जुगलाल नम्बरदार का कर्जा और करोड़ी बणिया की बाट बिनौले की उधार तो रैतन की एक साल की तनख्वाह में ही साफ हो जायेगी। फिर तो मौज ही मौज है। भगवान ने एक ही बेटा दिया है, चलो आबाद रहे। हमें तो यही बहुत है। दोनों बेटी अपने-अपने घर-बार की हो चुकी हैं। मुझ से तो इतना ही बन पाया है रैतन की माँ। अब तो कस्सी फावड़े का काम भी नहीं होता। घंटाभर बाद ही कमर टूटने लगती है। झेंगें की तरह अब तो मैं भी थक गया हूँ।… चलो कोई बात नहीं। उम्र के साथ ही सारी चीजें आणी जाणी होती हैं। अब तो बेटे की नौकरी लगने की देर है कि घर का अंधेरा आगे-आगे भाग लेगा…।”
लेकिन रतनसिंह को बी०एस०सी (एग्रीकल्चर) पास किये दो साल बीत चले थे। फर्स्ट पोजीशन उसके हाथ से छीन ली गई थी। पिछले दो सालों में कितने ही इन्टरव्यू दिये थे। मगर हर जगह रिश्वत की मोटी रकम अथवा तकड़ा जैक चाहिये था? रतनसिंह के पास इन दो चीज़ों के अलावा सभी कुछ थाः अपने विषय की अधिकारपूर्ण जानकारी, मजबूत स्वस्थ शरीर और चुस्त दिमाग़। इन्टरव्यू बोर्ड के सामने जब वह तकरीर करता तो ऐसा लगता जैसे कोई योग्य प्रोफैसर रिसर्च के विद्यार्थियों को पढ़ा रहा हो। लेकिन पूर्णतः प्रभावित होते हुए भी इन्टरव्यू-बोर्ड के मैम्बरान हर बार उसका चुनाव करने में नाकामयाब रहते थे।
आखिर दो साल बाद वह शुभ घड़ी आ ही पहुँची जब रतनसिंह की नियुक्ति एक राष्ट्रीयकृत बैंक में बतौर कृषि विकास अधिकारी हो गई थी।
आज रतनसिंह उसी ओहदे पर पदासीन होने जा रहा था। पिछले दो वर्षों में उसकी सेहत काफी कमज़ोर हो गई थी। बेरोज़गारी की मार वही लोग समझ सकते हैं जिन्होंने इसको खुद भोगा है।
रतनसिंह की नियुक्ति के एक वर्ष बाद तक नसीरपुर बैंक का बिजनैस खूब फला-फूला था। सरकार तथा बैंक द्वारा प्रचारित ग्रामीण विकास तथा कल्याण की तमाम स्कीमों को रतनसिंह अमली जामा पहनाना चाहता था। डेयरिंग, पिगरी-फार्म, पोल्ट्री फार्म, फिशरी फार्म, स्मालस्केल एग्रो इंडस्ट्री आदि विभिन्न स्कीमों का उसने व्यक्तिगत तौर पर रूचि लेकर अध्ययन किया था। बहुत बड़ी संख्या में पूरे ब्लाक के 73 गाँवों में उसने बैंक की योजनाओं की रोशनी पहुँचाने का अथक परिश्रम किया था। इस साल उक्त योजनाओं के तहत पन्द्रह लाख रुपये के ऋण मंजूर कराये गये थे जो कि अपने आप में एक रिकार्ड था और प्रदेश की किसी भी ब्राँच को अब तक इतनी योजनाओं को कार्यान्वित करने का गौरव हासिल नहीं हो सका था। लेकिन इसी दौरान एक ‘वी०आई०पी० केस’ को लेकर रतनसिंह तथा ब्राँच मैनेजर मिस्टर सहगल के बीच मतभेद हो गये थे। सहगल साहब इस ब्लाक के एक जाने-माने अमीर व्यक्ति श्री दुर्गादास बतरा को ‘लोअर इन्कम ग्रुप स्कीम’ के तहत ब्याज की मामूली दरों पर लोन की मोटी रकम दिलवा देना चाहते थे। उन्होंने ‘दुर्गा-इंडस्ट्रीज’ की प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तैयार करवा ली थी। बस, इस केस पर रतनसिंह की अनुमोदन रिपोर्ट होनी आवश्यक थी ताकि ग्रामीण विकास योजना के तहत लोन कम ब्याज पर मिल सके।
दुर्गादास हंडे-फिरे व्यक्ति थे। यह ठीक है कि उन्होंने कभी खुद कोई चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन पंचायत के चुनाव से लेकर एम०एल०ए०, एम०पी० तक के चुनावों में उनकी अहम् भूमिका होती थी। इसी वजह से वह राजनीतिक दाँव-पेचों और उपयुक्त अवसरों के भरपूर दोहन के माहिर हो गये थे। उन्होंने सहगल साहब से सलाह मशविरा करके ‘दुर्गा-इंडस्ट्रीज’ के शिलान्यास पर एक गरमा-गर्म पार्टी के आयोजन का प्रोग्राम बनाया और तय पाया कि उसी मौके पर रतनसिंह से लोन सैंक्शन की सिफारिश करायी जाये।
रतनसिंह प्रायः ऐसी पार्टियों में शामिल होने में संकोच करता था। उसका अनुभव था कि उसे ऐसी पार्टियों में सिवाय बोरियत के और कुछ नहीं मिलता। नशे में लड़खड़ाते लोगों की फिजूल हरकतों पर उसका माथा भन्नाया करता था। दो-चार मौकों पर जब भी वह कभी शामिल हुआ या शामिल होना पड़ा-यही निश्चय करके लौटा था कि भविष्य में फिर कभी वह किसी को अपना समय बरबाद करने का मौका नहीं देगा। परन्तु ब्राँच-मैनेजर सहगल ने ज्यादा इनसिस्ट किया तो उसे जाना पड़ा।
पहले डिप्लोमेट ह्विस्की का गरमा-गर्म दौर चला तो दुर्गादास और सहगल दोनों ने अनुरोध किया कि ज्यादा नहीं तो सेहत के नाम पर कम-से-कम एक पैग वह भी जरूर ले। रतनसिंह ने जवाब दिया कि उसे न केवल क्वांटिटी बल्कि कामोडिटी पर भी ऐतराज है। सवाल एक पैग या एक बोतल का नहीं है। वह तो शराब पीना ही उचित नहीं समझता है। और हिन्दुस्तानी समाज में शराब के औचित्य पर- उसके आर्थिक तथा सामाजिक पहलुओं को लेकर… पाँच सात वाक्यों में ही उसने अकाट्य तर्कों का बाँध उनके सामने खड़ा कर दिया। उसका कहना था कि हमारी न तो आर्थिक-स्थिति और ना ही सामाजिक स्थिति इस बात की छूट देती है कि हम शराब पी सकें। साथ ही उसने यह भी कह दिया कि हिन्दुस्तान के आम लोगों के लिए यह एक बेहद महंगा शौक है, और हमारे सामाजिक मूल्य इसकी इजाजत नहीं देते हैं। जिस समाज में हम रहते हैं, उसके मूल्यों की कदर हमें करनी ही होगी।
प्रत्युत्तर में दुर्गादास और सहगल के तरकस में कोई तीर बाकी नहीं बचा था। वे झेंप-सी मिटाने लगे और रतनसिंह की हाँ में हाँ मिलाने लगे। दुर्गादास ने भाँप लिया कि अब तक जितने जीव उसके जाल में फँस कर उसका शिकार बनते रहे हैं, यह उन सबसे भिन्न है। ऐसे ‘टॅफ केस’ के लिए अब तक के राजनीतिक जीवन में उसे कोई रेडीमेड फार्मूला हाथ नहीं लग पाया था-जिसका प्रयोग वह आज कर देखता। अतः उसने हर बात के उत्तर में जी हाँ-जी हाँ कह के स्वीकृति में गर्दन हिलाना शुरू कर दिया। रतनसिंह ने संवाद एकतरफा जानकर चुप्पी साध ली। थोड़ी देर बाद बोतल की आवाज ने इस चुप्पी को तोड़ा जब दुर्गादास ने तीसरा पैग बनाया। तभी शीशे की खिड़की के सामने की तरफ की कुर्सी पर बैठे दुर्गादास के चचेरे भाई तथा बिजनैस पार्टनर कशमीरी लाल को बाहर कोई हरकत दिखाई दी। उसने उठकर खिड़की से बाहर झांका। रद्दी चीथड़े, कागज, शीशियाँ बीनने वाला एक दस-साला लड़का पीठ पर मैला-कुचैला कट्टा लटकाए नीचे झुका था और थोड़ी देर पहले खिड़की से बाहर फेंके गए बोतल के रैपर को उठा रहा था।
“अबे साले क्या उठा रहा है, यहीं डाल दें”, कशमीरीलाल चिल्लाया तो लड़के के दहशत भरे हाथों से बोतल का रैपर वहीं छूट गया और वह पेट से पैर लगाकर सरपट दौड़ गया। फिर कशमीरीलाल जैसे खुद ही स्पष्टीकरण देने लगा- “ऐसा है कि रद्दी चीजें उठाते-उठाते इन्हें चोरी की आदत पड़ जाती है। फिर रद्दी के बहाने कभी कोई कीमती चीज़ भी उठा ले जा सकते हैं इसलिए….!”
रतनसिंह ने शराब नहीं ली तो उसके लिए “चिल्ड जूस” मंगा दिया गया था और शिष्टाचार के नाते वह भी कामन डिस्क से काजू तथा सन्तरा, सेब के पीस उठाकर खाता रहा। देर होते देख उसे ऊब होने लगी थी। अब दुर्गादास ने काम की बात छेड़नी चाही, “सिंह साहब, ऐसा है कि ये जो सामने खाली जमीन पड़ी है, हम इसी में इंडस्ट्री लगाना चाहते हैं”-खिड़की के उस पार उंगली का इशारा करते हुए दुर्गादास ने मानो मिस्टर सहगल को याद दिलाने के लिए कहा। और सचमुच ही सहगल साहब को याद हो आया ! उन्होंने तुरन्त ही दुर्गादास का कहा वाक्य जैसे पूरा कर दिया, “मिस्टर सिंह, दुर्गादासजी की उस प्रोजैक्ट रिपोर्ट पर आपकी रिक्मंडेशन हो गयी है क्या ?
उसको हमने इसी सप्ताह हैडआफ़िस को फॉर्मल एप्रूवल के लिए भेज देना चाहिए।”
“लेकिन यह केस तो ‘लोअर इन्कम ग्रुप स्कीम’ के तहत आता ही नहीं है? और ना ही प्रस्तावित कारखाने का रूरल ड्वैल्पमैंट से कोई लाजिकल रिलेशन बनता है,” रतन सिंह ने प्रश्न दाग दिया।
“सो तो सारी फारमेलिटीज हैं मिस्टर सिंह! यह समझिये कि यह केस पर्सनल इन्ट्रेस्ट लेकर कराना है,” सहगल साहब ने मंतव्य स्पष्ट करना चाहा। लेकिन रतनसिंह तैयार नहीं हो रहा था। उसका कहना था कि दुर्गादास की हैसियत क्या है-इस बात से ब्लाक की सारी जनता वाकिफ है। इस केस को किसी भी तरह से जैनुइन नहीं ठहराया जा सकता है। और लगे हाथ यह भी कह डाला कि दुर्गादास जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति को ऐसी धोखाधड़ी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। बस, फिर क्या था ? दुर्गादास जी उल्टे पड़ गये, “आप हम पर धोखाधड़ी का इल्जाम लगाते हैं? यदि कोई ऑपोजीशन का आदमी ये शब्द कह देता, तो मैं उस पर डीफेमेशन का केस दायर कर देता। आप सरकारी मुलाजिम हैं सिंह साहब, इसलिए छोड़े दे रहा हूँ। मैं अपने लिए इन्डस्ट्री नहीं लगा रहा हूँ। मैं तो इसके जरिये इस पिछड़े इलाके का बिकास करना चाहता हूँ। आप शायद हमें गलत समझ रहे हैं।”
“नहीं, मैं आपको बिल्कुल ठीक-ठीक समझ रहा हूँ। जो आदमी किसी ग़रीब के हाथ से कूड़ा-करकट भी छीन सकता है- वह इलाके का विकास नहीं कर सकता- अलबत्ता उसका हक जरूर हड़प सकता है,” नि रतनसिंह ने करारी चोट कर दी। दुर्गादासजी बौखला उठे, “आप अपनी हद से बाहर जा रहे हैं, शायद आपको मालूम नहीं कि मैं यह काम मिनिस्ट्री लेवल से भी करा सकता हूँ।”
“फिर मुझसे कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी,” कहकर रतनसिंह उठ खड़ा हुआ और चलने लगा। तभी सहगल साहब बीच में पड़ गये, “अरे छोड़िये यार ! सबेरे बात करेंगे, बैठिये मिस्टर सिंह-बी सीटेड प्लीज!”
“नहीं, मुझे देर हो रही है,” कह कर रतनसिंह वहां से सीधे अपने कमरे पर चला आया।
उसी दिन से रतनसिंह और सहगल के बीच में शीत युद्ध चल रहा है। यह कहना भी नाजायज नहीं होगा कि सहगल की ओर से युद्ध की कमान मोर्चे के पीछे से दुर्गादास ने संभाली हुई है। हुआ यह कि बैंक के हैड आफ़िस को रतनसिंह के आचरण के खिलाफ पहले तो बेनामी शिकायतें भेजी गयीं, और जब उन पर कोई एक्शन होता नज़र नहीं आया तो नकली नामों से कम्पलेन्ट की गयी कि उक्त कृषि अधिकारी ने असामियों से रिश्वत खा कर गलत लोगों को कर्जे दिलवाये हैं। बोगस लोन केस मंजूर कराये हैं और बैंक का सारा पैसा डूब सकता है।
इस पर ब्राँच मैनेजर के कमेन्ट्स मांगे गये तो उन्होंने घूमा-फिराकर यह लिखा कि लोन की रिकवरी स्पीड-अप की जाये अन्यथा बैंक को जबरदस्त रिस्क उठाना पड़ सकता है। लिहाजा कर्जा उगाही अभियान छेड़ दिया गया और रतनसिंह के नाम हैड आफिस से डेट-बांउड चिट्ठियाँ आने लगी कि फलाँ फलाँ तारीख तक फलाँ फलाँ रिकवरी टारगेट पूरे होने चाहिएं। रतनसिंह समझ गया कि उक्त वेल्फेयर स्कीमें कागजों में प्रचार के लिए ही सुन्दर हैं और हकीकत में कोई नहीं चाहता कि उनका प्रयोग समाज कल्याण हेतु किया जाये।
रतनसिंह ने ज्यादातर कर्जा खेतिहर परिवारों को दिलवाया था। उनके पास आजीविका का कोई और स्थायी साधन नहीं था। अतः रतनसिंह द्वारा दिलाये गये कर्जे से खरीदी गई भैंसों का दूध बेचकर – अपने दुधमुँहे बच्चों का मुंह पोंछ कर ही ये परिवार रोटी जुटा रहे थे। एक-एक भैंस के पीछे सात-सात, आठ-आठ जीवों की रोटी जुड़ी हुई थी। ऐसी स्थिति में बेचे गए दूध से जो रकम हासिल होती थी, वह पूरे कुणवे के लिए अनाज जुटाने में भी अपर्याप्त थी। जिस पर अगस्त-सितम्बर का महीना, जब बामुश्किल ही कभी मेहनत-मजूरी की दिहाड़ी मिल पाती थी।
लेकिन रतनसिंह द्वारा दिलाई गई भैंस का सबसे बड़ा सहारा यह था कि जहाँ पहले ये परिवार इस मौसम में फाके कर जाया करते थे, अबकी बार रूखा-सूखा खाकर पेट भरजाता था। ईंधन-गोसे का काम भी कुछ हद तक भैंस के गोबर से चल जाता था। बाकी चोरी-छिपे सड़क किनारे खड़े कीकर के पेड़ों पर से सूखी टहनियाँ तोड़कर इकट्ठा कर ले आते थे। ऐसी हालत में भी ये लोग रतनसिंह और उसके बैंक के बेहद अहसानमंद थे ?
हैड आफिस के अनाप-शनाप रिमाइन्डरों और ब्राँच-मैनेजर सहगल के असहयोगवादी रवैये ने रतनसिंह की दिनचार्य में बेहद तनाव पैदा कर दिया था। उसकी उलझनें रोज़ाना बढ़ती जाती थीं। रतनसिंह ने ब्लाक के प्रायः सभी गाँवों का दौरा कर लिया था। लगभग सभी असामियों से वह सम्पर्क कर चुका था। लेकिन किसी भी तरह से बीस-प्रतिशत से अधिक रिकवरी नहीं हो पायी थी। असामियों की आर्थिक हालत उससे छिपी नहीं थी। बल्कि वे लोग तो उससे अपने व्यक्तिगत सुख-दुख की बातें कहकर जी हलका कर लिया करते थे।
सोमवार का दिन था। रतनसिंह दफ्तर में बैठा काम कर रहा था। तभी डाक में उसे दो चिठ्ठियाँ मिलीं। घर से बापू ने चिट्ठी भिजवायी थी कि इधर झूंगा बैल गुज़र गया है और उधर बेटी शान्ति के लड़का पैदा हुआ है। यदि जल्दी ही बैल न खरीदा गया तो अबकी गेहूँ की फसल भी नहीं बोई जा सकेगी। उधर शान्ति के पीलि़या-छूछक भेजने के लिए पाँच-सौ रुपये का जुगाड़ तुरन्त चाहिए। बाकी बेटा तुम खुद समझदार हो… वगैरा, वगैरा। अन्तिम वाक्य की गुप्त परिभाषा रतनसिंह खूब समझता था! मतलब था, जैमल लम्बरदार का कर्ज़ा और करोड़ी बणिया का बही खाता।
दूसरी चिट्ठी हैड-आफिस से थी। लिखा था कि आपका अगस्त माह का वेतन तभी भुगतान किया जायेगा जबकि आप बकाया ऋणों की सत्तर प्रतिशत वसूली जमा करा देंगे। एक महीना वह ज्यों-त्यों करके निकाल सकता था, लेकिन महीना बाद भी किसी स्थिति से सत्तर प्रतिशत वसूली नहीं हो सकती थी। असामियों की आर्थिक स्थिति की नस-नस से वह पूरी तरह वाकिफ़ था।फिर भी वह बैंक का मोटर साइकिल स्टार्ट करके निकल पड़ा।
अगस्त की दोपहरी की धूप में उसका सिर भन्ना रहा था। सड़क लगभग वीरान थी। सड़क के दोनों तरफ की कच्ची पटड़ियों पर उगी घास में कुछ पशु चर रहे थे। और ग्वाले शीशम के पेड़ की छाँह में जोड़-तोड़ खेल रहे थे। सड़क पर सबसे पहला गाँव खेड़ा था जोगिया खेड़ा। गाँव से दो फलांग पहले मोड़ पर मोटर साईकल का एक्सीडैन्ट होते-होते बचा। भैंस सड़क पार कर रही थी और रतनसिंह का दिमाग़ गैर-हाज़िर था।
गाँव में घुसते ही सबसे पहले मंगलू आसामी का घर था। मंगलू रतन सिंह को देखते ही चारपाई से खड़ा हो गया। उसके साथ ही बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे दो अन्य व्यक्ति भी आदर में खड़े होकर नमस्ते करने लगे। मोटर साईकिल खड़ा करते-करते रतनसिंह कड़का, “बैंक की किश्त क्यों जमा नहीं करायी ?” “आपको तो पता ही है हुज़ूर कि लड़की की बीमारी में…” मंगलू इतना ही कह पाया था कि रतनसिंह फिर गरज पड़ा, “मैं कुछ नहीं जानता ? मैं पूछता हूँ कि बैंक की किश्त क्यों नहीं भरी ?”
रतनसिंह ने महसूस किया कि उसका शरीर बेतरह तप रहा है और उसके हाथ भी काँपने लगे हैं। तभी अन्दर बेहड़े से मंगलू की औरत की डकराहट गूँज गयी- “हॉय मेरी बच्ची चली गयी… इसके तो पैरों की नब्ज भी छूट गयी रे।” “रतनसिंह को लगा कि उसके हाथों की काँपती उंगलियों पर लम्बे-लम्बे नाख़ून उग आये हैं। उन्होंने पंजों की शक्ल अख़्तियार कर ली है। उसके जबड़ों में दोनों तरफ नुकीले किल्ले निकल आये हैं और देखते-देखते वह खुद भेड़िये में तब्दील हो गया है। वह निरा-पुरा भेड़िया बन गया है, – खूंखार भेड़िया। भेड़िये ने लड़की की गर्दन में नुकीले किल्ले गड़ा दिये हैं, भेड़िया लड़की को नोचने लगा है…तभी रतनसिंह के मुँह से एक कसैली चीख निकली और इससे पहले कि मंगलू और उसके साथी उसे संभाल पाते, वह धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा। मंगलू चिल्लाया, “अरे कोई डाक्टर को तो बुलाओ ? बैंक वाले बाबू को दौरा पड़ गया।… हाथ पैर अकड़ कर लकड़ी हुए जा रहे हैं…इनकी तो जुबाड़ी भी बुच गयी है।”
मंगलू का एक साथी डॉक्टर को लाने के लिए दौड़ा। दूसरे ने जमीन पर पड़े रतनसिंह के मुँह पर ठण्डे पानी के छींटे दिये। फिर एक कागज मोड़कर, उसकी बत्ती-सी बनाकर रतनसिंह की नाक में घुसेड़ दी। फौरन ही रतनसिंह की जुबाड़ी खुल गई। कुछ समय बाद वह होश में आ गया। मंगलू और उसके साथी ने उसे चारपाई पर लिटा दिया था। होश आते ही रतनसिंह उठ बैठा। उसने मंगलू और उसके घर को एक बार फिर अपरिचित की-सी दृष्टि से देखा और मंगलू की आँखों में आँखें डाल कर किसी निश्चय के साथ उठ खड़ा हुआ।
वापिस लौटकर बैंक जाने के बजाय वह सीधा अपने कमरे पर गया और प्रो० तैराक को एक विस्तृत पत्र लिखा जिसमें उसने यह भी सूचित किया कि वह नौकरी से त्याग पत्र दे रहा है।
उत्तर में प्रो० तैराक ने लिखा था कि वह व्यक्तिगत प्रयासों के बजाय सामूहिक संघर्ष के लिए अपने विभाग की कर्मचारी यूनियनों के साथ जुड़े और यदि उसके विभाग में पहले से स्थापित कोई यूनियन नहीं है, तो उसे चाहिए कि दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयत्न करे।
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जब रतन सिंह की आगे की जिन्दगी के बारे में मैंने जानना चाहा तो खोजबीन करने पर पता चला कि उसने संन्यास ले लिया था और आजकल वह किसी जगह ‘योग-आश्रम’ की स्थापना करके योगाभ्यास के द्वारा दुनियादारी के दुःख-तकलीफों का निवारण करने का उपाय कर रहा है।
‘कहानी यात्रा चार’ 1985
(कहानी संकलन, हरियाणा साहित्य अकादमी)
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