भारत में प्रवासी श्रमिक: पहचान से सम्मान तक
डॉ रामजीलाल
सन् 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में लगभग 456 मिलियन प्रवासी श्रमिक हैं, जो कुल आबादी का लगभग 40 % हैं. इनमें से, 13.9 करोड़ से ज़्यादा को मौसमी श्रमिक (जैसे कृषि श्रमिक)के तौर पर वर्गीकृत किया गया है, जो मुख्य रूप से वंचित समुदायों से आते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ज़मीनहीन लोग और अलग-अलग लेवल की पढ़ाई वाले प्रवासी श्रमिक शामिल हैं. देश के वर्कफ़ोर्स और डेवलपमेंट की रीढ़ होने के बावजूद, इन लोगों को अक्सर बेसिक सुविधाओं की भारी कमी का सामना करना पड़ता है. विकसित भारत का निर्माण करने के लिए प्रवासी श्रमिकों को अदृश्य मत समझिए.उन्हें अधिकार दीजिए क्योंकि जब तक प्रवासी सुरक्षित नहीं है तब तक विकसित भारत स्वपन साकार होना संभव नहीं है.
मुख्य समस्याएँ:
गांव में काम नहीं,और प्रवासी शहर में सम्मान नहीं.जो गिना नहीं गया ,वो है नहीं अर्थात अदृश्य हो गया. प्रवासी श्रमिक को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जो उनकी ज़िंदगी की क्वालिटी और काम करने के हालात पर बहुत बुरा असर डालती हैं:
1. आर्थिक असुरक्षा:
सन् 2021-22के सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 80% कार्याबल अनौपचारिक है. 26 जनवरी 2026 को ई-श्रम पोर्टल पर 41.48 करोड़ अनौपचारिक श्रमिकों का पंजीकरण दर्शाया गया है. अनौपचारिक मजदूरों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है.भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों की संख्या सबसे अधिक है।प्रवासी श्रमिक अक्सर अस्थायी और कम वेतन वाली नौकरियों -निर्माण, भट्ठों, घरेलू काम, और अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन इनके पास न तो कोई अनुबंध होता है और न ही कोई सुरक्षा.जिससे उनकी आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है. उन्हें नियमित आय की कमी और वित्तीय सुरक्षा की चिंता का सामना करना पड़ता है.उदाहरण के लिए, कोविड-19 के दौरान, 64% श्रमिकों को पूरा वेतन नहीं मिला, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई.
प्रवासी श्रमिकों में से 98.5 प्रतिशत समाज के हाशिए पर रहने वाले निम्न वर्गों से आते हैं, जो उनकी स्थिति को और भी गंभीर बनाता है। यह श्रमिक वर्ग देश और समाज की सबसे निचली परत से है, गरीबी और वंचना के दुष्चक्र में फंसा हुआ है. उनके संघर्ष और मेहनत के बावजूद, उन्हें अक्सर अपने अधिकारों और अवसरों से वंचित रखा जाता है.
2.जातिगत भेदभाव:
जाति है कि जाती नहीं और साय की भांति साथ-साथ चलती है . अन्तर-राज्य प्रवासी श्रमिकों मेंअनुसूचित जाति के श्रमिक16% तथा अनुसूचित जनजातियों के श्रमिक 8% हैं .शहरों में भी आवास और नौकरी में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है और उनके पर ‘दलित’ तथा ‘बाहरी होने का ठप्पा’ लगा हुआ है. डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जातिवाद को समाज में गहरी खाई पैदा करने वाला एक प्रमुख कारक माना. उनके अनुसार, जातिवाद ने मजदूरों के बीच विभाजन और असमानता को बढ़ावा दिया है, जिससे उनकी एकता और संघर्ष की क्षमता कमजोर हुई है.
उन्होंने यह भी कहा कि यदि मजदूर वर्ग जातिवाद के बंधनों को तोड़ सके, तो वे एक मजबूत और संगठित शक्ति बन सकते हैं, जो सामाजिक और आर्थिक न्याय की प्राप्ति के लिए आवश्यक है.इसलिए, उन्होंने जातिवाद के खिलाफ संघर्ष करने और समानता के सिद्धांतों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि मजदूर वर्ग अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो सके और समाज में वास्तविक परिवर्तन ला सके.
3. COVID-19 लॉकडाउन -प्रवासी श्रमिक के सामने आने वाली चुनौतियाँ:
(Indian Police on duty) COVID-19 लॉकडाउन ने भारत में प्रवासी मज़दूरों के लिए चुनौतियों को काफी बढ़ा दिया. अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों की अचानक नौकरी चली गई. 64% श्रमिकों को पूरा वेतन नहीं मिला, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई.उन्हें खाना और रहने की जगह जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ा, उनके पास स्वास्थ्य बीमा व बेरोजगारी सहायता नहीं था.भीड़भाड़ वाली रहने की जगहों ने सामाजिक दूरी और साफ़ पानी तक पहुँच को लगभग नामुमकिन बना दिया, जिससे उनके इंफ़ेक्शन का खतरा बढ़ गया। ट्रांसपोर्टेशन रुकने से कई प्रवासी शहरों में फँस गए, जिससे उन्हें अपने गाँवों के लिए चिलचिलाती गर्मी में सैकड़ों किलोमीटर पैदल खतरनाक सफ़र करना पड़ा, जहाँ उन्हें अक्सर भूख और पुलिस व लोगों की हिंसा का सामना करना पड़ा। लौटने पर, उन्हें वायरस कैरियर समझकर भेदभाव का सामना करना पड़ा. यहां मुझे सन् 1963 में बनी ‘भरोसा’ फिल्म के मशहूर दर्द भरे गीत जिसकी रचना राजेन्द्र कृष्ण ने की थी तथा सदाबहार गीतकार मोहम्मद रफी ने गाया था याद आता है:
इस भरी दुनिया में ,कोई भी हमारा ना हुआ ,
गैर तो गै़र थे,अपनों का सहारा ना हुआ.
राहत पैकेज के बावजूद, खाना, कैश ट्रांसफ़र और ट्रांसपोर्ट तक पहुँच सीमित रही, जिससे सोशल वेलफ़ेयर सिस्टम की कमियाँ सामने आईं। लॉकडाउन ने गहरी असमानताओं को सामने लाया, जिसमें पुलिस की क्रूरता और राज्य की सीमाओं पर रुकावटें शामिल हैं।
4. प्रवासी महिला श्रमिकों व बच्चों की समस्याएं: दोहरा-तिहरा शोषण:
प्रवासी महिला श्रमिकों को ज़िम्मेदारियों का दोहरा बोझ झेलना पड़ता है. ज़्यादातर महिला श्रमिक घरेलू काम करती हैं, और उनके काम को ‘अनदेखा’ अथवा ‘अदृश्य’ माना जाता है. लंबे समय तक काम करने के बावजूद भी कानूनों व नियमों को ताक पर रख कर उन्हें 20 % -30% कम वेतन मिलता है. प्रवासी महिला श्रमिकों को कार्य स्थल पर लैंगिक हिंसा और गलत व्यवहार का ज़्यादा खतरा होता है.क्योंकि घर से दूर होने के कारण, उनके पास सामाजिक सुरक्षा तंत्र नहीं होता . यौन उत्पीड़न की शिकायत का मतलब नौकरी से हाथ धोना है. निर्माण स्थलों पर 50 से अधिक महिला श्रमिक होने पर क्रेच स्थापित करने का कानून है. परंतु भारत में लगभग 95% कार्य स्थलों पर इसका पालन नहीं होता .परिणाम स्वरूप 2 साल का बच्चा सीमेंट और मिट्टी के बीच खेलता है.पीएम मातृ योजना का पैसा बैंक का खाता न होने या आधार लिंक में न होने से अटक जाता है. बच्चों की शिक्षा की सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है .मौसमी प्रवास के कारण 80% से अधिक प्रवासी बच्चे बीच में स्कूल छोड़ देते हैं.अन्य शब्दों में गांव में टीसी (TC)नहीं मिलती ,शहर में भाषा समझ नहीं आती.स्थानीय पहचान या राशन कार्ड न होने के कारण, वे सार्वजनिक वितरण प्रणालीऔर स्वास्थय बीमा जैसी कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा भी नहीं उठा पाती,कौशल और वेतन के बीच का अंतर साफ़ दिखता है, जो अक्सर प्रवासी महिला श्रमिकों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करता है जिन्हें ‘अकौशल’ माना जाता है, जो अक्सर उनकी योग्यता के हिसाब से सही नहीं होते हैं.
5.डेटा का अंधकार जो दिखता नहीं, उसके लिए बजट भी नहीं
आर्थिक सर्वेक्षण 2016-2017में पहली बार इस बात को स्वीकार किया कि 13.9 करोड़ मौसमी प्रवासी सरकारी आंकड़ों से गायब हैं .पीएलएफएस यानि अल्पकालिक प्रवास को ठीक से नहीं पकड़ा जाता. नियोक्ता श्रम कानून से बचने के लिए पंजीकरण नहीं करते- ई-श्रम पोर्टल पर 30 करोड़ पंजीकरण हुए पर स्किल और लोकेशन अपडेट न होने से वह भी अधूरा रह जाता है. जब तक हम नहीं जानेंगे कि कहां कितने प्रवासी हैं तब तक उनके लिए अस्पताल,स्कूल और घर का बजट कैसे बनेगा.
6.कल्याणकारी योजनाओं का निवास प्रमाण पत्र में उलझना:
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत 20 करोड़ से अधिक वंचित लोग कवर हैं जिन में बड़ी संख्या प्रवासियों की है.परन्तु हकीकत यह है बिहार अथवा यूपी का राशन कार्ड मुंबई अथवा महानगरों की राशन की दुकानों पर इनवैलिड हो सकता है .’वन नेशन, वन राशन कार्ड’ योजना सन् 2020 में लागू हुई.परन्तु सन् 2023 तक 100% एफपीएस इस से नहीं जुड़े और प्रवासियों में जागरूकता 40% से कम है .आयुष्मान भारत का गोल्डन कार्ड है तो सही पर दिल्ली जैसे महानगरों के अस्पताल यह कह देते हैं कि यूपी अथवा बिहार का कार्ड यहां नहीं चलेगा. बच्चे का आधार स्कूल के दाखले के समय अपडेट न हो तो साल बर्बाद हो जाता है .परिणाम स्वरूप कल्याणकारी योजनाएं है पर प्रवासियों के लिए वे राज्यो की सीमाओं पर ही दम तोड़ देती है.
7.शहरी आवास -विकास की छाया में झुग्गी-झोपड़ियाँ:
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, देश की लगभग 65.49मिलियन आबादी झुग्गी-झोपड़ियों (slums) में निवास करती है। हालिया अनुमानों में यह संख्या और भी अधिक (करीब 9.3 करोड़) आंकी गई है. यह आबादी जर्मनी अथवा इंग्लैंड की जनसंख्या से अधिक है.नवीनतम अनुमानों के अनुसार, जर्मनी की जनसंख्या लगभग 83.5 मिलियन व इंग्लैंड की जनसंख्या लगभग 69.5 मिलियन है.
ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर नदी-नालों के किनारे, रेलवे ट्रैक के पास और फ्लाईओवर के नीचे टिन- तिरपाल की झुग्गियों में रहते हैं. मजबूरी में 6-7 मज़दूर एक कमरे में रहते हैं. पीने का पानी भी टैंकर माफिया से खरीदना पड़ता है. इन झुग्गियों की समस्याओं का हल नामुमकिन लगता है क्योंकि वोटर ID ट्रांसफर न होने की वजह से इनका कोई पार्षद या विधायक( MLA )नहीं है. इन झुग्गियों को स्मार्ट सिटी का अतिक्रमण कहा जाता है, और बुलडोज़र सबसे पहले प्रवासी मज़दूरों की बस्तियों में पहुँचते हैं और उनको बेघर और बेदर बना देते हैं.
8. कानूनी सुरक्षा की कमी:
प्रवासी श्रमिकों को अपने अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के उपायों के बारे में जानकारी नहीं होती है. इस जानकारी की कमी की वजह से वे शोषण और बुरे बर्ताव के शिकार हो सकते हैं, जिससे वे अपने मुद्दों के लिए न्याय पाने से चूक जाते हैं.वे नतीजों के डर से बोलने में हिचकिचा सकते हैं, या बस यह नहीं जानते कि मदद के लिए कहाँ जाएँ. यह चौंकाने वाली सच्चाई उन्हें ऐसी स्थिति में फँसा देती है जहाँ अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना नामुमकिन लगता है, और अक्सर उन्हें एक अनजान कानूनी माहौल की मुश्किलों से निपटने के दौरान ज़रूरी मदद के बिना छोड़ दिया जाता है. जानकारी में यह खतरनाक कमी न केवल उनके अलग-अलग तरह के शोषण के प्रति उनके कमज़ोर होने को बढ़ाती है – जिसमें कम वेतन, असुरक्षित काम की जगहें और मालिकों का बुरा बर्ताव शामिल हैं.बल्कि शिकायतों का सामना करने पर न्याय पाने की उनकी क्षमता को भी काफी कमज़ोर कर देती है.अन्य शब्दों में प्रवासी श्रमिकों को अपने अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के बारे में जानकारी नहीं होती। इससे उन्हें शोषण और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है, और वे अपनी समस्याओं के लिए न्याय की मांग नहीं कर पाते.
समाधान-नीति से नियत तक,कागज से जमीन तक:
1.पोर्टेबल अधिकार-
नागरिक जहां जाए, साथ में अधिकार ले जाए: संविधान केअनुच्छेद 19(1), (डी), व(ई)के अनुसार हर नागरिक को देश में कहीं आने-जाने और बसने का अधिकार है. फिर यह योजनाएं इस अधिकार को सीमा में क्यों बांधती हैं .वन नेशन, वन राशन कार्ड सख्ती से लागू होना चाहिए.वन नेशन, वन राशन कार्ड सभी 5.45 लाख सेअधिक उचितमूल्य की दुकानों (एफपीसी) या राशन की दुकानों को 100% बायोमेट्रिक से जोड़ना चाहिए. भारतीय खाद्य सुरक्षा अधिनियमम के अंतर्गत यह दुकानें 81.35 करोड़ (कुल आबादी का 57%-60 %)भारतीयों को रियायती दरों व मुफ्त राशन उपलब्ध कराती हैं. प्रवासी श्रमिकों के लिए हेल्पलाइन14445 पर इसका प्रचार किया जाना चाहिए.(स्त्रोत -पीबीआई).आयुष्मान भारत कार्ड की पोर्टेबिलिटी होनी चाहिए.यदि कोई अस्पताल यह कहकर मना करें कि यह दूसरे राज्य का कार्ड है. यह सरासर कानूनी अधिकार व कानून का उल्लघन है क्योंकि आयुष्मान भारत कार्ड समस्त भारत के लिए है.इस पर किसी राज्य का नाम अंकित नहीं है . उल्लघन करने वाले अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया जाना जाए.आधारकार्ड पर आधारित भारत वर्करकार्ड बनाया जाए जिसमें श्रमिक का कौशल, बैंक का खाता, स्वास्थ्य रिकॉर्ड,व पारिवारिक डिटेल हो और यह पूरे भारत में लागू होना चाहिए.शिक्षा केअधिकार को लागू करने के लिए स्त्रोत पंचायत माइग्रेशन सर्टिफिकेट दे. जिसके आधार पर गंतव्य राज्य में 7 दिन में बिना टीसी के प्रवासी श्रमिकों के बच्चों को स्कूल में दाखिला प्राप्त हो सके.
2. कानून की धारा लागू करो, नहीं तो सजा दो
अंतर -राज्य प्रवासी कामगार अधिनियम 1979 के अनुसार ठेकेदार पंजीकरण कराए व उपयुक्त आवास ,यात्रा भत्ता व, विस्थापन भत्ता दें. लगभग 47 वर्ष पुराने कानून को ठेकेदारों -अधिकारियों -नौकरशाहों-राजनेताओं के भ्रष्ट गठबंधन के द्वारा लागू नहीं किया जाता क्योंकि इसे 90% प्रवासी श्रमिक तथा आम नागरिक नहीं जानते. अत: हर जिले में प्रवासी श्रमिक प्रकोष्ठ की स्थापना हो जिसमें लेबर इंस्पेक्टर, पुलिस, प्रवासी श्रमिक की यूनियन के प्रतिनिधि, व स्थानीय विपक्षी दल के नेता को सम्मिलित किया जाए. ई -श्रम पर नियोक्ता द्वारा तिमाही अपडेट अनिवार्य होना चाहिए. एंट्री न करने पर जीएसटी रजिस्ट्रेशन कैंसिल कर दिया जाए तथा सजा भी होनी चाहिए.सरकारी टेंडर उसी ठेकेदार को मिले जो 100%श्रमिकों का ईपीएफ जमा करें. ठेका लेने के पश्चात यदि ऐसा न करे तो सख्त सजा होनी चाहिए. प्रवासी श्रमिकों के संबंधित विवादों में श्रमिक न्यायालय के द्वारा 90 दिन में फैसला देना चाहिए. यदि श्रमिक न्यायालय ऐसा नहीं करते तो संबंधित अधिकारी पर जुर्माना होना चाहिए.
3.शहर सब के लिए: आवास और सम्मान
अमृत काल2.0 व पीएमएवाई-अर्बन में 10 परसेंट बजटकिफायती किराये के आवास के लिए निर्धारित व आंवटित होने चाहिए. सभी स्मार्ट शहरों में वर्कर्स हॉस्टल स्थापित किया जाए. नगर निगमों को 3 महीने से ज्यादा रहने वाले प्रवासी श्रमिकों को सिटी सर्विस कार्ड देने चाहिएं ताकि इसके आधार पर स्थायी पत्ते पर पानी कनेक्शन ,बैंक खाता और लेबर कार्ड इन प्रवासी श्रमिकों को प्राप्त हो सके. ‘वहीं जहां झुग्गी ,वहीं मकान की नीति’ को अपनाना चाहिए और किराए से मालिकाना हक का कानूनी मॉडल लागू करके बुल्डोजर की मार से सुरक्षित किया जा सकता है.
4.महिला और बाल केंद्रित बजट
महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए हर कार्य स्थल पर बच्चों के लिए क्रेच,महिला शौचालय,विश्राम घर,इत्यादि अनिवार्य तौर से स्थापित किए जाने चाहिए तथा सीसीटीवी भी लगाने चाहिएऔर महिला सुरक्षा समिति के द्वारा महिलाओं व युवतियों को तीव्रगति से सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए.पीएम मातृ वंदना योजना का पैसा आधार इनेबल्ड खाते में डीबीटी करने से अन्य राज्यों में जाने पर कोई रोक नही लगनी चाहए.गंतव्य राज्य व शहरों में स्कूलों में प्रवेश से पूर्व तीन महीने के ‘ब्रिज कोर्स’ हेतु स्कूलों की स्थापना की जाए ताकि मातृभाषा व स्थानीय भाषा का सेतु बन सके व मुख्यघारा के स्कूलों में प्रवेश ग्रहण करने के पश्चात स्थानीय बच्चों के साथ पारस्परिक मेल-जोल व शिक्षा ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न न हो. स्कूलों प्रवासी किशोरियों की सुरक्षा मुख्य मुद्दा होना चाहिए.प्रवासी किशोरियों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा किट,अलग शौचालय, हेल्पलाइन नंबर व आत्म सुरक्षा के प्रशिक्षण की व्यवस्था ,निगरानी समितियां होनी चाहिए.किशोरियों के साथ किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की शिकायत पर तुरंत छानबीन करके दोषी व्यक्ति पर कानूनी कारर्वाई होनी चाहिए ताकि उनके मान-सम्मान की सुरक्षा हो सके व पढाई में बाघा उत्पन्न न हो.
5 डाटा क्रांति- गिनो तो जानो, जानो तो योजना बनाओ: ई-श्रम 2 .0 फैसियल रिकॉग्निशन से डुप्लीकेट हटाकर स्किल, लोकेशन, और परिवार हर 6 महीने में अपडेट किया जाना चाहिए.जनगणना 2026 पिछले एक साल में 30 दिन से अधिक काम के लिए घर से बाहर रहे ,तो अलग से कोड किया जाना चाहिए. .रेलवे ,बस और मोबाइल टावर डाटा से माइग्रेशन ट्रेंड का डैशबोर्ड जिला केलक्टर के द्वारा हर रोज देखा जाना चाहिए.जिला केलक्टर की एसीआर में ‘प्रवासी कल्याण सूचाकांक ‘जोडने कीआवश्यकता है.इस सूचकांक में स्कूलों में प्रवेश,संस्थागत प्रसव,ईपीएफ इत्यादि जोड़े जाने चाहिएं .
निष्कर्ष :प्रवासी श्रमिक भारत के ग्रोथ इंजन में ईंधन का काम करता है .उन्हें समस्या कहना बंद कीजिए .वे भारत के वोटर हैं,टैक्सपेयर हैं ,और सम्मानित नागरिक हैं.कोविद-19 ने यह सिद्ध कर दिया कि जब वे प्रवास से अपने घरों की ओर लौटते हैं तो इंजन बंद हो जाता हैऔर शहर थम जाता है .हमें संकट के प्रवास को विकल्प के विकास में बदलना चाहिए तभी भारत की अर्थ व्यवस्था की नींव मजबूत होगी. परन्तु इसके लिए वर्तमान नवउदारवादी,कार्पोरेटवादी,व पूंजीवादी शोषणकारी नीतियों की अपेक्षाकृत वैक्लपिक राज्य समाजवादी व उत्पादन संसाघनों के राष्ट्रीयकरण की नीतियों को अपनाकर गरीब वअमीर के मध्य बढ़ती हुई खाई को रोक कर रोजगार के स्थायी अवसर प्रदान करने होंगे. केवल यही नहीं अपितु श्रमिकों की स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक है कि हम उनके प्रति संवेदनशीलता और समझ विकसित करें. शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों में सुधार से ही हम इस वर्ग की जीवनशैली में बदलाव ला सकते हैं.
सिर्फ आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक समर्थन भी आवश्यक है ताकि श्रमिक वर्ग को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अवसर मिले. यह सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है कि वे समाज के विकास में सक्रिय भागीदार बन सकें. इन श्रमिकों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है. इन समस्याओं को हल करने के लिए सामाजिक सुरक्षा,रहने की स्थितियों और गाँव-शहरी असमानताओं में सुधार की ज़रूरत है.

Thanks for the publication of the article—migrant workers in India:From Indentity to Dignity.