प्रस्तुत कविता बहुजन न्यायवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की पुस्तक ‘अन्याय गाथा’ के खंड सात से ली गई है। कबीर का सबद है: माया महा ठगिनी हम जानी”। तिरगुन फांसि लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।..
राजनीतिक संदर्भ में हम “माया” को समझना चाहें तो वह महाठगिनी “सत्ता” ही है जोकि श्रमजीवी जनता के साथ हमेशा छल करती रहती है? कविता में एक रूपक के जरिए इसी छद्म को ‘एक्सपोज़’ किया गया है। इसीलिए सरकारें आज तक भी जनता की मुश्किलों और मुसीबतों को हल नहीं कर पाई है ! आखिर क्यों ? -संपादक)
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खंड सात: ये हुई सत्ता की बात
ओमसिंह अशफ़ाक
कविता: सत्ता बनाम फत्ता
1.
इंजीनियर में क्या रक्खा है ?
रक्खा क्या है देश-विदेश ।
सत्ता होगी हाथ में अपने-
यहीं बुला लेंगे ‘परदेश’ !
आदेश हुआ है नेता जी का-
कुछ दिन खातिर बदलो भेष !
सूट-बूट तो भीतर रख दो-
खादीबाणा रहे हमेश !
संसद में पहुंचे ही समझो
भली करेंगे श्रीगणेश !
मतपेटी को खुलने दो, फिरे-
उड़नखटोला देश-विदेश !
2
करता रहा कैसी नादानी !
पापाजी की बात ना मानी !
‘पढ़े-लिखे’ में क्या रक्खा है-
विद्या तो है ‘आनी जानी’ !
चलो मगर अब जीत गए हैं !
गफ़लत के दिन बीत गए हैं !
शाम का भटका सुबह जो आए-
छिप जाएं सब कारस्तानी !
लोग यही समझे हैं अब तो-
पेशा अपना-खानदानी !..
बच्चों को भी समझा दूंगा
ना कभी करेंगे नाफ़रमानी !..
3
अब फत्ता बोला झगड़ा ये है !
जड़ झगड़े की रगड़ा ये है-
म्हारे बाल़क फिरते बेरुजगार,
झूठ्ठा थारा सब प्रचार !
नित नये तुम जाल़ बिछाओ ।
दंद-फंद सारे बेकार !
चपड़ासी एक भर्ती हो ना-
फॉरम आवें साठ हजार !
रोटी के ही लाले पड़गे-
किसने ध्यावै चटनी-प्याज !
कर्जे में तो गिरवी होगे-
ब्याज के ऊपर चढ़ता ब्याज !
रात-दिना की चिंता खागी-
कैसे लाज बचे म्हारी आज ।
4
दुखड़े फत्ते के सब सच्चे थे-
जीवन में संग मढ़े हुए थे ।
घपलेबाज भी कहां कच्चे थे-
साजिशों में कढ़े हुए थे ।
हर लफ्ज़ और लहज़ा तौल रहे थे।
कुछ कानाफूसी बोल रहे थे ।
पलभर में छिड़गी तकरार ।
चार चफे़रे मार-म-मार !
कर दो इसको धार-म-धार !
ना चूकने पाए एक भी वार !
कूड़ा करकट, खर पतवार-
लूटेंगे कल को घर-परिवार..
पर फत्ता तो था बात का सच्चा !
दिया भीड़ को उसने गच्चा !
देख कै मौक्का भाग लिया था !
फिर मुहल्ला उसका जाग लिया था।
5
अब श्रीमंत सब मिलकर सोचें-
कैसे इस संकट को मोचें ?
ऊंचे-ऊंचे किले बनाओ-
ऊंची-ऊंची चिनो मीनार !
फॉर्महाऊस को बाड़ से घेरो-
तार हो जिसकी कांटेदार !
फाटक उनका बंद ही रखना-
साथ बिठाओ पहरेदार !
पहरेदार करें नमक-हरामी ?
‘अलशेसन’ दो-हों खूंखार !
बेपरवाह फिर भी मत होना-
लोड ही रखना सब हथियार !
6
फिर एक शातिर ने चुप्पी तोड़ी !
बातचीत की दिशा यूं मोड़ी !
वाद-विवाद अब सब छोड़ो !
बदले वक्त से नाता जोड़ो !
बिज़नेस तो फल-फूल रहा है-
उसमें अपने दिल को जोड़ो !
पांच साल का पट्टा मिला है-
चार साल तक ऐश करेंगे !
शेष बचे फिर एक साल को-
आगे के लिए कैश करेंगे !
दंद-फंद को चलने दो बस !
पठ्ठे अपने पल़ने दो बस !..
7
आखिर क्षत्रप ने एक यूं फरमाया !
दुखती रग का मर्म बताया !
एक ही चिंता अब बाकी है !
‘ये जनता अपनी भी काकी है’
मींच आंख पगुराय रही है !
सबकुछ सुनती जाय रही है !
जैसे कुछ भी ना जाने है-
झूठ हमारा सच माने है !
बस एक ही बात समझ ना आए-
फिर कैसे एकदम ये सुस्त पड़ी है?..
अब फत्ता तो था दूर से बोला !
भेद पुराना उसने खोला-
ऐन वक्त लतियाए ससुरो !
इसीलिए ख़ामोश खड़ी है !
हां, इसीलिए ख़ामोश खड़ी है!
(रचना काल 2006)
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नोट: उपरोक्त कविता में मौजूद रूपक में फत्ता नामक युवक श्रमजीवी जनता का एक प्रतिनिधि है जोकि सत्ताधारी शासक शोषक वर्ग के झुंड के बीच बहस में फंस जाता है। लेकिन अपनी होशियारी से उनके चंगुल से न केवल बच निकलता है बल्कि अपने “तर्कों और तथ्यों” के द्वारा शासक वर्ग के झूठ और छल-कपट को भी उद्घाटित कर देता है। पाठकों के लिए भी युवा फत्ते के सब तर्क और तथ्य विचारणीय तो हैं।
