पिछले सप्ताह जनशक्ति वर्ली (मुंबई) में केरल के सामाजिक आंदोलन के इतिहास को केंद्र में रखते हुए प्रसिद्ध लेखक एवं जनवादिन लेखक संघ के संयुक्त महासचिव बजरंग बिहारी तिवारी का एक महत्वपूर्ण वक्तव्य हुआ। प्रस्तुत है इस कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट:संपादक
जाति उत्पीड़न के खिलाफ़ संघर्ष और कम्युनिस्ट आंदोलन : केरल का अनुभव
सामाजिक क्रांति के अगुआ पेरियार ई रामास्वामी और भगत सिंह के जन्मदिन के उपलक्ष्य में 27 सितंबर 2026 जनशक्ति वर्ली, मुंबई में प्रसिद्ध लेखक आलोचक और दलित साहित्य के अध्येता बजरंग बिहारी का वक्तव्य रखा गया। इस वक्तव्य का विषय था जाति उत्पीड़न के खिलाफ़ संघर्ष और कम्युनिस्ट आंदोलन : केरल का अनुभव । इस महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन ‘जाति अंत संघर्ष समिति’ और जनवादी लेखक संघ मुंबई की ओर से किया गया।

कार्यक्रम के आरंभ में सुबोध मोरे ने पेरियार ई रामास्वामी और भगत सिंह के विचारों पर संक्षिप्त रोशनी डालते हुए कहा कि पेरियार दक्षिण भारत में जाति उत्पीड़न के खिलाफ़ एक सशक्त आवाज़ बन कर उभरे वहीं भगत सिंह ने अछूत समस्या पर खुल कर लिखा। सामाजिक क्रांति के दोनों नायकों ने बराबरी के समाज की स्थापना के लिए संघर्ष किया था।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने सुचिंतित वक्तव्य में केरल के पौराणिक इतिहास से लेकर आधुनिक केरल की सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का विस्तार से जायज़ा लिया। बजरंग बिहारी तिवारी की केरल के सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य पर केंद्रित महत्त्वपूर्ण पुस्तक आई है। इस पुस्तक का मराठी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। अपने इसी शोध कार्य को केंद्र में रखते हुए उन्होंने जाति उत्पीड़न के खिलाफ़ संघर्ष और कम्युनिस्ट आंदोलन की भूमिका पर विस्तार से अपनी बात रखी।
उन्होंने केरल के सामाजिक ढांचे के बारे में कहा कि प्राचीन केरल की जाति व्यवस्था अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक क्रूर और जटिल रही है। केरल समाज में जातिगत भेद-भाव का यह आलम था कि देश में जहाँ ऊंची जाति के लोग छूने से अपवित्र हो जाया करते वहीं केरल में देखने मात्र से छूत का असर हो जाया करता था। ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों जैसे ईष़व और पुलय जाति के लोगों को क्रमश: छत्तीस से अड़तालीस क़दम तक की दूरी बनाए रखनी पड़ती थी।
दास प्रथा केरल की पुरानी जाति व्यवस्था का अंग थी। पुलय और परय जैसी दलित जातियाँ दास थीं जिनका बाकायदा व्यापार हुआ करता था। सारी दुनिया में जहाँ दास प्रथा का खात्मा हो रहा था, उस ज़माने में भी केरल में दास प्रथा चलन में थी। दो बैलों के एवज़ में गुलाम लड़के लड़की को खरीदा बेचा जा सकता था।
केरल में सामाजिक आंदोलन की शुरुआत दलितों ने की। इनका नेतृत्व भी उनके पास रहा। केरल में ईसाई मिश्नरियों के आगमन के बाद ही यहाँ ‘दास प्रथा’ पर सवाल उठाए गए। इन्होंने सरकार से गुलाम प्रथा के खिलाफ़ कानून बनाने का आग्रह किया गया। 1850 से 1860 के बीच समूचे केरल में दास प्रथा पर प्रतिबंध लग गया। यहीं से ईसाई मिशनरियों के लिए धर्म प्रचार की ज़मीन तैयार हुई। चानार दलित बड़े पैमाने पर ईसाई बने। 1860 में सबसे पहले इसी समुदाय ने सामाजिक आंदोलन की शुरुआत की।
केरल में इस्लाम के आगमन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि अरब व्यापरियों के साथ केरल में इस्लाम धर्म आया। व्यापारियों की सुविधा के लिए कोचीन के स्थानीय राजा ने फरमान निकाला था कि परिवार का कोई एक सदस्य मुसलमान हो जाए ताकि व्यापारी उनके साथ रह सके।
केरल ‘रेनेसा’ की बात करते हुए उन्होंने कहा कि केरल की सामाजिक क्रांति के तीन बड़े नायक हुए- पहले डॉक्टर पाल्पू, दूसरे पुलय जाति के महानायक अय्यनकाली और तीसरे धर्मांतरित ईसाई समुदाय के नायक श्रीकुमार गुरुदेवन (योहन्नान)। केरल समाज के सामाजिक परिवर्तन में इन तीनों नायकों का बड़ा योगदान रहा है।
स्वामी विवकानंद जब शिकागो धर्म संसद से भारत लौटे तो उन्होंने केरल में ‘डॉक्टर पाल्पू’ से मुलाकात की। स्वामी जी की सलाह पर डॉ पाल्पू ने ‘एस एन डी पी योगम’ नामक संगठन बनाने की पहल की। इस संस्था की बाग़डोर किसी संन्यासी के हाथों में देने की सलाह भी स्वामी विवेकानंद ने दी। इस तरह श्री नारायण गुरु इस संस्था के प्रमुख बनाए गए। इस संगठन के अंतर्गत दलित उद्धार के कई कार्यक्रम चलाए गए। शिक्षा संस्थान खोले गए, 1910 में अस्पृष्यों के लिए विद्यालय के द्वार खुल गए। दलितों को व्यापार चलाने में आर्थिक सहायता प्रदान की गई। पत्रिकाएँ निकाली गईं। महिलाओं के अधिकार के लिए प्रयास किये गए।
केरल के सामाजिक विकास में जिस तरह डॉक्टर पाल्पू का योगदान रहा वैसे ही अति पिछड़ी जाति पुलय समाज को अय्यनकाली का क्रांतिकारी नेतृत्व मिला। अय्यनकाली को ‘केरल का मार्क्स’ कहा जाता है। अय्यनकाली (1863-1941) का जन्म तिरुअनंतपुरम के पास एक गाँव वेंगनूर में हुआ था। अपने जाति के अधिकारों के लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया। उस समय पुलय जाति के लोगों को बैल गाड़ी के उपयोग की इजाज़त नहीं थी। अय्यनकाली ने एक बैलगाड़ी खरीदी। उस पर सवार होकर सवर्णों के दमन के खिलाफ़ बग़ावत का बिगुल फूंका।
इन्होंने दलितों के लिए पाठशालाएँ खोलीं। सवर्ण जाति के लोगों ने पुलय जाति की शिक्षा का विरोध करते हुए कई बार इन स्कूलों को जलाया। लेकिन अय्यनकाली ने हार नहीं मानी। यहाँ तक कि दलितों को न्याय मिल सके इस लिए उन्होंने ‘कम्युनिटी कोर्ट’ की स्थापना की। उस समय दलित अपना मुकदमा ठीक से लड़ नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें सवर्णों से निश्चित दूरी बनाए रखनी होती थी। ईसाई समुदाय के नायक श्रीकुमार गुरुदेवन (योहन्नान) ने धर्मांतरित ईसाइयों का नेतृत्व किया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि बाइबिल में स्थानीय अछूत जातियों और उनकी समस्याओं का उल्लेख नहीं है तो इस धर्म से हमारा उद्धार कैसे होगा ? ईसाई समुदाय के बीच व्याप्त भेद-भाव के विरुद्ध योहन्नान ने लगातार संघर्ष किया।
विभिन्न जातियों में बटे केरल समाज में जाति के आधार पर बहुत से ‘संघम’ बने, जैसे नायर सभा, नंबूदरियों की योगक्षेम सभा। इन संगठनों द्वारा अपनी-अपनी जाति के भीतर समाज सुधार की प्रक्रिया भी चलती रही।
इस तरह हम देखते हैं कि आध्यात्मिक और जाति संगठनों द्वारा चलाए जा रहे समाज सुधार आंदोलन को आधार बनाते हुए केरल समाज लगातार उन्नत होता चला गया। केरल समाज का यही प्रयास ‘केरल रेनेसां’ के नाम से जाना जाता है। इन सामाजिक आंदोलनों के चलते ही केरल समाज में आमूल परिवर्तन भी आए।
इसी आधार पर केरल समाज अब रेनेसां से दो क़दम आगे बढ़कर रेवोलुशन के लिए तैयार होने लगा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घट रही गतिविधियाँ उसे भी प्रभावित कर रहीं थीं। रूस की क्रांति की चर्चा यहाँ पहुँच रही थी और सोवियत संघ को केरल के बुद्धिजीवियों का समर्थन मिल रहा था। मलयालम की लोकप्रिय पत्रिका ‘मितवादी’ ने दिसम्बर 1917 में संपादकीय लिखकर रूसी क्रांति का समर्थन किया और जनता के शासन की हिमायत करते हुए मलयाली समाज की रूसी समाज से समानता दिखाई।
मलयाली समाज में हो रहे परिवर्तनों को क्रांति की तरफ़ मोड़ने का काम इस दौर के लेखकों और बुद्धिजीवियों ने ख़ूब किया। इन सामाजिक परिस्थियों में ज़मीन पर कम्युनिस्टों ने मोर्चा संभाला। कम्युनिस्टोंने जो सब से अहम काम किया वह यह कि उन्होंने जाति आधारित संघर्ष को धार देते हुए इस उथल पुथल को वर्ग संघर्ष में इसे बदला।

केरल में 1935 कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना हुई ब्रिटिश इनके विचारों से ख़ौफ़ खाते थे इन्होंने पार्टी पर पाबंदी लगा दी। कम्युनिस्ट इस दौरान कॉंग्रेस और उसके बास सोशलिस्टों के साथ मिलकर काम करने लगे। गाँव-गाँव घूम कर लोगों को शिक्षा देने का काम किया। नाईट स्कूलों में पढ़ाने लगे। वे लोगों के बीच जा कर उन से संवाद स्थापित करने का काम किया जनता से जुड़ने के लिए उन्होंने पारंपरिक तरीकों अपनाया, जनता के अनुभवों से सीखा। उनके बीच रह कर छोटे छोटे संगठन बनाए गए।
लेखक ईएमएस की ऑटोबायोग्राफी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब पहली बार केरल में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आई तो उन्होंने सब से पहले ‘तीन अहम’ कार्य किये। सब से पहले उन्होंने पाठशालाओं की वास्तविक स्थिति को बेहतर बनाने का निश्चय किया। धार्मिक मूल्यों पर आधारित पुस्तकें पहले से पढ़ाई जा रही थीं लेकिन प्रथम कम्युनिस्ट सरकार ने संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप पुस्तके तैयार करवाई।। शिक्षकों की नियुक्तियों के लिए एक मानक बनाया गया। उनके इस प्रयास से स्कूलों की स्थतिति में काफ़ी सुधार हुआ। अपनी सरकार बनते ही उन्होंने पुलिस के हाथों से लाठी-डंडे को हटा दिया। इससे लोगों के मन का ख़ौफ़ दूर हो गया। भूमि सुधार योजना के तहत दलितों को स्थाई रूप से अपना घर बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ।
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई भूस्वामियों के संगठन सरकार के इस फैसले का विरोध करने के लिए एक हो गए। उन्होंने इसे विमोचन समरम या ‘लिबरेशन स्ट्रगल’ का नाम दिया। इस संघर्ष में कई कॉमरेड्स मारे गए। स्थानीय कॉंग्रेसी नेताओं के दबाव में केरल की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। जिससे लेन्ड रिफॉर्म ड्राफ्ट पर अमल नहीं हो पाया। कम्युनिस्ट शासन के दौरान दलितों पर होने वाले संस्थागत हिंसा का खात्मा हुआ। अन्य राज्यों की तुलना में केरल में जातिवादी हिंसा नहीं के बराबर है। केरल में समाज के स्ट्रक्चर को बदला गए उन्होंने यहाँ चारपाई का उदाहरण दिया आस्तिकतावादी चार पाई पर बैठ कर समस्या का समाधान नहीं होगा चारपाई को पूरी तरह पलटना होगा। तभी एक बराबरी वाली दुनिया का निर्माण हो सकता है।
करीबन डेढ़ घंटे तक चले वक्तव्य के बाद मंत्रमुग्ध श्रोताओं की ओर से केरल के सामाजिक आंदोलन को लेकर कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछे गए। जिन में से कुछ प्रश्न इस तरह से हैं। दीपक पवार ने पूछा कि महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और बाबा साहब अंबेडकर का केरल के सामाजिक आंदोलन पर क्या प्रभाव रहा? मुख्तार खान ने जानना चाहा कि केरल में मुस्लिम समाज सुधारकों की क्या भूमिका रही? मुकेश शर्मा ने प्रश्न पूछा कि उत्तर भारत से सम्बंध रखते हुए आप ने दक्षिण प्रदेश की भाषाई चुनौती को कैसे पार किया गया ? एडवोकेट संजय पांडे ने केरल में दहेज जैसी समस्या के बारे में अपना प्रश्न रखा ? कॉमरेड प्रकाशन ने पूछा कि एक धार्मिक सोससाइटी के बीच काम करते हुए हमें कौन सा रास्ता अपनाना चाहिए ताल-मेल का या संघर्ष का? केरल समाज में मातृमूलक सत्ता की वास्तविकता क्या है? प्रोफेसर स्वाती ने केरल समाज पर अयप्पा मूमेन्ट का के प्रभाव के बारे में प्रश्न पूछा? ऐसे और कई और महत्त्वपूर्ण प्रश्न राजू देशपांडे, अरविन्द माने, आरमायटी और अन्य दर्शकों की ओर से पूछे गए, इन सभी प्रधनों का बजरंग बिहारी तिवारी ने बड़े धैर्य के साथ उत्तर दिया।
इस वैचारिक कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध मराठी कथाकार बाबू राव बागुल की सुपुत्री ‘शोभा बागुल’ उपस्थित रहीं। बजरंग बिहारी ने उन्हे अपनी पुस्तक ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ भेंट की। वहीं लेखिका हुस्ना तबस्सुम नेहा ने अपनी पुस्तक ‘गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता ‘ बजरंग बिहारी को भेंट की।
कार्यक्रम का सूत्र संचालन दीपक पवार और डॉ. मुख्तार खान ने किया वहीं जनवादी महिला संगठना की ओर से सुगंधी फ्रान्सिस ने मुख्य वक्ता बजरंग बिहारी, उपस्थित श्रोताओं और आयोजकों का आभार प्रकट किया।
