सर्वाधिक वंचित प्रवासी आबादी : समस्याएं और समाधान

सर्वाधिक वंचित प्रवासी आबादी : समस्याएं और समाधान

डॉ रामजीलाल

हरियाणा के करनाल जिले को चावल का कटोरा कहा जाता है. दानवीर कर्ण के करनाल शहर में 4 जून 2026 को दो सदियां आमने -सामने नजर आ गई .एक ओर 21 वीं सदी पूरी चमक धमक के साथ खड़ी शीशे की इमारतें,फ्लाईओवर ,करनाल मार्केट की वातानुकूलित दुकानें व मॉल, चांद पर घर बसाने के सपने, तेज रफ्तार व हॉर्न बजाते हुए आधुनिक वाहन तथा दूसरी ओर जनजातीय युग की भांति धीरे- धीरे बढ़ रहा था बैल गाड़ियों का एक खामोश काफिला उन परिवारों को लेकर जो आज की दूरी को इस बात से नापते हैं कि उनके बैल सूरज ढलने से पहले कितना चल सकते हैं . करवां ने शहर की रफ्तार को एक पल के लिए रोक दिया .हर बैल गाड़ी एक चलता- फिरता घर है.ऊपर छतरी पर खाटे बंधी हैं और खाटों पर पानी के ड्रम कसे हुए थे. बच्चे अंदर से झांक रहे थे, शहरी जीवन के तमाशे को आंखें फाड़ कर देख रहे थे. एक बांस में पिंजरा लटक रहा था शायद उसमें कोई परिंदा था .गाड़ी के आर -पार बंधी रस्सी पर कपड़े सूख रहे थे और पीछे मवेसी चल रहे थे.उनके गले में बंधी धीरे- धीरे बज रही थी जैसे मन को शांति प्रदान कर रही हों.काफिले के साथ -साथ शिकारी खूंखार कुत्ते ऐसे चल रहे थे जैसे मंत्रियों के काफिले में कमांडो चलते है. अपने पालकों प्रति उनकी वफादारी , पहरेदारी अथवा परिवारों के रखवाली पुलिस व कमांडों से भी बेहतरीन दृष्टिगोचर हो रही थी . इन वंचितों ने न कभी ताला लगाया और न ही दरवाजा देखा .

ये आधुनिक भारत की सर्वाधिक वंचित आबादी अपने ही महान देश में प्रवासी है .यह घुमंतू जनजातियां हैं .विमुक्त समुदाय हैं,पशुपालक समूह हैं .इनका पता बदलते मौसम के अनुसार बदलता रहता है. आधार कार्ड वाले नागरिक तो हैं पर उनके पास ऐसी कोई जगह नहीं जिसे ये निवास कह सकें. जब पूछा गया कि कहां के रहने वाले हो बस इतना कहा धूप बहुत तेज है बात नहीं कर सकते .सम्भवत: वह कहना चाह रहे हों, ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तान हमारा, रहने को घर नहीं सारा जहां हमारा’. उनका काफिला आगे बढ़ता चला गया अन्य शब्दों में अमीर भारत और गरीब भारत की बड़ी भयावह तस्वीर भारतीय अर्थव्यवस्था, अच्छे दिनों के अमृतकाल व कार्पोरेट व सत्ता के अटूट गठबंधन की परतें खोल कर सार्वजनिक कर रही थी. बुनियाद के बिना जीवन के लिए विकास के बुनियादी पैमाने आज भी दूर है. विकसित भारत व विकास का नारा एक स्वप्न जैसा रंगीन लगता है. ऐसा लगता है जहां तक पक्की छत कैसा विचार है ,पहले छोड़ दिया .यह खुले आसमान के नीचे आंधी , तूफान और मानसून की बारिश की चिंता किये बिना जहां पानी का स्रोत मिल जाए वहीं पर तंबू गाड देते हैं और आसमान को अपनी छत बना लेते हैं .

इन के बच्चे सड़क पर पैदा होते हैं ,सड़क पर जवान होते हैं और सड़क पर ही जिंदगी जीते हैं. खानाबदोश रहने के कारण उनके बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित रहते हैं क्योंकि शिक्षा प्राप्त करने के लिए निश्चित स्थान पर ठहरना जरूरी है तभी शैक्षणिक सत्र पूरा होता है. नतीजा साफ है इन वंचित लोगों के बच्चों की शिक्षा संबंधी योजनाएं व राजनीतिक कल्याणकारी नीतियों की राजनेता भाषणों में जोरदार चर्चा करते हैं लेकिन योजनाओं की खबर खानाबदोश कबीलों के तक शायद ही कभी पहुंचती हों .यह व्यवस्था जानना नहीं चाहती . जब गतिशीलता ही हास्य बनकर रह जाती है .स्वतंत्र भारत में गतिशीलता का अर्थ स्वतंत्रता होनी चाहिए .घुमंतू शब्दों के लिए इसका अर्थ अदृश्य है बिना निश्चित निवास के समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे हैं .राशन कार्ड बनवा सकते हैं . राज्य की नजर में बिना स्थाई पते वाला व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जिसका कोई न अतीत है ,न वर्तमान है और न हीं भविष्य है.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि यह सीधे तौर पर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास को रोकता है जो वास्तविक रूप में अधिकारों सरासर उल्लंघन है

समावेश का रास्ता:

समाधान यह नहीं अपनी संस्कृति छोड़ने पर मजबूर किया जाए बल्कि एक ऐसी बुनियाद दी जाए जहां यह लौट सकें:
प्रथम ,स्थाई निवास स्थान: प्रथम कदम है स्थाई निवास स्थान, जमीन का एक टुकड़ा,एक छोटा घर, एक निश्चित गांव का पता पलायन को खत्म नहीं करता. मौसमी पशुपालकअपने मवेशियों के साथ फिर भी चलेंगे लेकिन उन्हें लंगर देता है उनके बच्चों को एक ऐसा स्कूल देता है जहां वह वापस आ सकते हैं और उन्हें राशन कार्ड, वोटर आईडी एक ऐसी जगह देता है जहां डाक पहुंच सके.
दूसरा: शिक्षा को गतिशीलता . शिक्षा को गतिशीलता के हिसाब से फिर से बनाना होगा. घुमंतू बच्चों के लिए आवासीय स्कूल, पलायन के मुख्य महीनों में कारवां के रास्ते पर चलने वाली मोबाइल कक्षाएं और बच्चों के साथ स्थानांतरित होने वाले डिजिटल रिकॉर्ड, ड्रॉप आउट को रोक सकते हैं .अगर एक भी बच्चा छूट गया तो सार्वभौमिक शिक्षा का पूरा तंत्र टूट गया.

तृतीय, आजीविका सहायता : आजीविका सहायता उन तक वहीं पहुंचनी चाहिए जहां वह हैं.धातु के काम,पशुपालन,जड़ी -बूटी, चिकित्सा और लोक कलाओं में पारंपरिक कौशल का बाजार बहुमूल्य है. लेकिन बिना कर्ज,प्रशिक्षण और बाजार संपर्क के यह कौशल गरीबी में दम तोड़ देते हैं.इन्हें सरकारी समितियां से जोड़ना,कारीगरों के लिए पहचान पत्र प्रदान करना और सरकारी खरीद निश्चित करना गतिशीलता के दायित्व की बजाए संपत्ति बन सकता है.

मुख्य धारा के लिए एक सवाल:

जिस दिन करनाल में,कैनाल मार्केट की चमक ठहर गई थी. शहर ने काफिले को देखा था और काफिले ने वापस शहर को देखा .यह दो भारत की मुलाकात थी जो शायद एक दूसरे को स्वीकार करते हैं.हमारे पाठकों व भारत में नीति निर्माताओं के लिए एक सीधा सवाल है:क्या हमारी नजर इतनी ठहरेगी कि हम कुछ कर सकें?.कल्याण दान नहीं है .यह समावेश है. जब इन गाड़ियों के बच्चे कक्षाओं में बैठेंगे,जब इनके युवाओं को सरकारी व निजी क्षेत्र में नौकरियां मिलेगी,जब इनके बुजुर्गों को उचित पेंशन व अन्य सुविधाएं मिलेगी ,तभी हम कह पाएंगे कि विकास इन तक पहुंचा है.

सारांशत:

सबसे वांचित प्रवासी आबादी इसलिए वंचित नहीं है क्योंकि वे चलना चुनते हैं .वे इसलिए वंचित है क्योंकि व्यवस्था ने अभी तक उनके साथ चलना नहीं सीखा .जब तक हम वह पुल नहीं बनाते काफिला गुजरता रहेगा ,और हमारे झूमर अनजाने में अपनी परछाइयां फेंकते रहेंगे .राजनीतिक व्यवस्था को अब उनके कदमों से कदम मिलना होगा.जब इस घुमंतु वंचित समुदाय का समुचित विकास होगा.तब यह मुख्यधारा में समाहित होकर गौरव से कहेगा “हम भी भारतीय हैं”.

डॉ रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक व पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल, हरियाणा हैं

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