महान महारानी कृपा कंबोज: प्राचीन भारत की गुमनाम नायिका
डॉ. रामजीलाल
परिचय: सिकंदर के समय में कंबोज महाजनपद, 327-326 ईसा पूर्व में, सिकंदर को सिकंदर महान के नाम से भी जाना जाता है, ने फारस और बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत पर आक्रमण किया.उस समय भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर प्राचीन कंबोज महाजनपद का क्षेत्र उसके लिए सबसे कठिन युद्धक्षेत्र बन गया था. यूनानी इतिहासकारों ने स्वात, कुनार, पुंजकोरा की घाटियों की अस्पासिकोई,गुरेयन्स व अस्साकेनोई जातियों के प्रचंड़ प्रतिरोध का वर्णन किया है. इनमें मस्सागा के अश्वकायन सबसे अधिक शक्तिशाली थे.
भारतीय विद्वानों व इतिहासकारों का मानना है कि क्लियोफिस प्राकृत नाम कृपा (किरपिका) का ग्रीक रूप है, जिसका मतलब है दयावान स्त्री—यह महाभारत के कृपा और कृपी का मूल भी है. वह कंबोज की बहादुरी वाली परंपराओं से जुड़ी हैं, जहाँ रानियों के पास युद्ध कौशल और प्रशानिक कला दोनों थे, उन्होंने युद्ध में अपने पति और बेटे की मौत के बाद राज्य पर सफलतापूर्वक शासन किया, और कमांडर के तौर पर युद्ध के मैदानों में सेनाओं का नेतृत्व भी किया. (झा 1942; रॉलिंसन 1912; शर्मा 1970; टार्न 1948)
मस्सागा का युद्धक्षेत्र: ‘महारानी कृपा कंबोज बनाम सिकंदर’
जब सिकंदर कंबोज देश की सीमा में सेनाओं के साथ घुसा तो उसे पहाड़ी क्षेत्र के संघ का जबरदस्त सामना करना पड़ा. मस्सागा की अश्र्वकायन महारानी कृपा कंबोज ने सबसे अधिक सिकंदर का मुकाबला व खूनी प्रतिरोध किया. महारानी कृपा कंबोज के पति और बेटे “ कंबोज बनाम सिकंदर’’ की लड़ाई मारे गए थे. पति और पुत्र की युद्ध में शहादत के पश्चात मातम मनाने की अपेक्षा महारानी ने प्रतिकार लेने, अपने राज्य व लोगों के जीवन सम्पति, महिलाओं व युवतियों के सम्मान की सुरक्षा हेतु स्वयं युद्ध में सेना का नेतृत्व किया.
रानी कृपा कंबोज ने सैन्य कमांडर के रूप में निम्नलिखित कार्य किए:
1.सैनिक बल कंबोज: पाणिनि के समय में कंबोज महाजनपद में एक रिपब्लिकन राज्य था.कंबोज एक क्षत्रिय य़ोद्धा समाज होने के कारण महिलाएं सेना में सक्रिय भाग लेती थी तथा वे जिम्नास्टिक, तीरंदाजी, घुड़सवारी और युद्ध के मैदान में सेनाओं का नेतृत्व करने में अत्यधिक कुशल थी. भारतीय प्राचीन इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 327 ईसवी पूर्व महारानी कृपा कंबोज ने पहली महिला सैनिक बटालियन बनाई थी .महारानी कृपा कंबोज ने 30,000 घुड़सवार,38,000 पैदल,30हाथियों,व 7,000 भाड़े के सैनिकों नेतृत्व किया. अत: स्पष्ट होता है कि महारानी युद्ध में अकेली नहीं थी अपितु यौद्धा पुरूष सैनिकों के साथ युद्ध कला में प्रशिक्षित व जीवन न्योछावर करने वाली वह महिलाएं भी थीं जिन्होंने सिकंदर के सैनिकों के हौंसले को ऐसी ठेस पहुंचायी जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी. क्योंकि यह प्रथम बार था जब उसके सैनिकों को युद्ध कला में प्रवीण बहादूर कंबोज महिला सैनिकों का सामना करना पड़ा.
- किले को घेराबंदी:सिकन्दर को मस्सागा के मिट्टी-ईंट के किले को तोड़ने के लिए घेराबंदीयंत्र,सुरंग व लकड़ी का मीनार बनाना पड़ा. कंबोज सेना के तीरंदाजी के माहिर पुरूष व महिला सैनिकों व रक्षकों ने दीवारों से तीरों की बौछार कर दी .
- महारानी का नेतृत्व: वह युद्ध की ज्वाला में प्रजा को झोंक कर विनाशलीला का तांडव नृत्य नहीं करना नहीं चाहती थी. अत: प्रजा को बचाने के लिए डायोडोरस के अनुसार रानी कृपा कंबोज कुलीन महिलाओं को साथ लेकर सिकंदर से भेंट करने आई थी. उधर दूसरी और सिकंदर के सेनानी युद्ध में लड़ते हुए थक चुके थे .सिकंदर को यह भय था कि कहीं युद्ध में हार का मुंह ना देखना पड़े .हमारा मानना है कि दोनों तरफ से समझौते की भावना उत्पन्न हो रही थी. एक और रानी अपनी प्रजा को खून खराबे से बचाना चाहती थी और उधर सिकंदर अपने सम्मान को बचाना चाहता था परिणामस्वरूप रानी और सिकंदर के मध्य समझौता हुआ. महारानी ने कोई आत्मसमर्पण नहीं किया अपितु यह सम्मान जनक समझौता था.
कृपा कंबोज की शौर्य क्षमता, युद्ध में कुशल योद्धा, बहादूरी व अदमय साहस के बावजूद भी भारतीय इतिहास का सुनहरe पृष्ठ होने के बावजूद गुमनाम है.
महान महारानी कृपा कंबोज बहादूरी की उपलब्धियों को जन-जन तकपंहुचाना: सुझाव
महान महारानी कृपा कंबोज को लोकप्रिय बनाने के लिए उनकी वीरता और कूटनीति की कहानियों को वर्तमान पीढ़ी तक पहुचाने के लिए अंग्रेजी, हिंदी व पंजाबी भाषा के माध्यम से जोड़ना होगा. स्कूलों और कॉलेजों में स्थानीय इतिहास के पाठ्यक्रम में उनका परिचय पठाया जाना चाहिए.महिला सशक्तिकरण के विभिन्न कार्यक्रमों, सोशल मीडिया पर शॉर्ट वीडियो, लोकगीत और नाटकों के रूप में तथा विभिन्न कार्यक्रमों लोकगीत और नाटकों के रूप में तथा विभिन्न कार्यक्रमों इत्यादि के द्वारा उनकी बहादूरी की उपलब्धियों को जन-जन तक पंहुचाना चाहिए. कंबोज समाज को चाहिए कि वह प्रत्येक गांव व शहर में महिला कंबोज सभा की स्थापना करके प्राचीन कंबोज इतिहास सहित महारानी कृपा कंबोज अन्य कंबोज महारानियों व कंबोज महाराजाओं की उपलब्धियों जानकारी दी जाए.
निष्कर्ष : यूनानी इतिहासकार उन्हें क्लियोफिस और फारसी किस्से सिकंदर की एक टिप्पणी के रूप में याद करते हैं. परन्तु भारतीय परंपरा के अनुसार कृपी/ कृपा कंबोज एक महान कंबोज महारानी थी जबकि यूनानियों ने क्लियोफिस लिखकर अपभ्रशं कर दिया. भारत की सर्व प्रथम महिला सेना कमांडर,प्रथम महिला शासक,प्रथम महिला सेना की संस्थापक व रण क्षेत्र में पति व पुत्र की कुर्बानी के बाद भी वीरता से लड़ने वाली वीरांगना को गुम कर दिया. जबकि हमलावर आततायी सिंकदर को अधिकांश लोग जानते हैं . महारानी कृपा कंबोज जिसने आततायी तथाकथित व प्रचारित ‘विश्व विजेता’ का सामना तीर, तलवार, दीवार और कूटनीति से किया वह कौरव रानी भानुमति कंबोज व महाराजा सुदक्षिण कंबोज की धर्मपत्नी राजमाता सुदर्शन कंबोज की अनाम महारानी के साथ खड़ी होकर बताती हैं कि कंबोज रानियां केवल विवाह से रानियां नहीं थी अपितु अपने जनपद की रक्षा के लिए वह युद्ध क्षेत्र में सेना की कमान संभाल कर अपनी जनता के जीवन व सम्मान की रक्षा हेतु रणचंडी भी होती हैं.

लेखक – डॉ रामजी लाल
