निडरता और संघर्ष के पर्याय थे इस्लामुद्दीन

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग- 120

निडरता और संघर्ष के पर्याय थे इस्लामुद्दीन

सत्यपाल सिवाच

 

आजादी के मुबारक दिन से ठीक एक साल पहले 15.08.1946 को मेवात क्षेत्र के रूपड़ाका गाँव में चौधरी धूपखान और श्रीमती कपूरी के घर होनहार बालक इस्लामुद्दीन का जन्म हुआ। रूपड़ाका ऐसा गाँव है जो इलाके की छितरपाल खाप का गढ़ है। इस गाँव ने बहादुर और जांबाज लोगों ने 1857 की जंग में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बलिदानी जंग छेड़ी थी। यहाँ की मिट्टी में उस दौर में 350 से अधिक लड़ाकों की शहादत की खुशबू समाई है। इसी मिट्टी में खेल-कूदकर बालक इस्लामुद्दीन बड़े हुए। उनके पिता फौज से रिटायर होने के बाद खेती करते थे और माँ खेती व पशुपालन के साथ गृहस्थी को संभाल रही थी।

उनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल में हुई और दसवीं तक राजकीय उच्च विद्यालय हथीन में पढ़े। उसके बाद जी.जी.एम. कॉलेज पलवल में उच्च शिक्षा के लिए दाखिला लिया। बीच में पढ़ाई छोड़कर 1965 में सेना में भर्ती हो गए। अढ़ाई वर्ष बाद सेना की नौकरी छोड़ दी और शिक्षा विभाग में लिपिक नियुक्त हुए। उसके दो साल बाद बिजली बोर्ड में एलडीसी पद पर भर्ती हुए और 31.08.2003 को सी.ए. पद से सेवानिवृत्त हुए।

नौकरी के दौरान वे यूनियन के संपर्क में आए। यही वह समय था जब में अध्यापकों, बिजली और अन्य विभागों में आन्दोलन खड़े हो रहे थे। वे सन् 1975 में जेल में थे। उस समय 17 जुलाई 1975 को उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। बाहर आकर उन्होंने मेवात युवा और छात्र कल्याण संगठन (MYSO) का गठन किया। इसी दौरान निर्वाह के लिए नूंह के पुराने बस स्टैंड पर चाय की दुकान खोल ली। उनकी दुकान व्यवहार में एम.वाई.एस.ओ. का मुख्यालय बन गई थी। उनके खिलाफ इस अरसे में दो एफआईआर दर्ज की गई। उन पर राज्य के खिलाफ लोगों को भड़काने का आरोप लगाया गया। पुलिस हिरासत में उनके साथ अमानवीय और बर्बर व्यवहार किया गया। बार-बार उन्हें बेरहमी से पीटा गया। लोगों को आतंकित करने सार्वजनिक रूप से जलील किया गया।

आपातकाल के बाद उन्हें सीपीआई(एम) ने फरीदाबाद लोकसभा के लिए उम्मीदवार बनाया लेकिन बाद में जनता पार्टी से समझौता होने पर यह चुनाव छोड़ना पड़ा। बाद में 1996 में हथीन से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन पाल-खाप समीकरण सही न होने के कारण हार गए।

वे बहाली के बाद फिर यूनियन में सक्रिय हो गए। अलग अलग स्तरों पर काम करते हुए उन्हें राज्य स्तर के प्रमुख नेता के रूप में पहचाना जाने लगा। जब सन् 1981 में व्यक्तिवादी कार्यप्रणाली को लेकर यूनियन की एकता बचाए रखना संभव नहीं हुआ तो वे एच एस ई बी वर्करज यूनियन हैड ऑफिस हिसार के साथ सक्रिय हुए। फरीदाबाद व गुड़गांव क्षेत्रों में वे सोहनपाल सिंह चौहान, यादराम, देवीसिंह आदि के साथ मजबूत कार्यकर्ताओं में शामिल थे। उन्हें बाद में यूनियन का राज्य अध्यक्ष चुना गया।

उनकी पहचान निर्भीक और साहसी नेता की रही। अधिकारी किसी जायज काम में रुकावट नहीं डाल सकते थे। सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद वे वर्षों तक सक्रिय रहे। संघर्षों के दौरान उत्पीड़न की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। यद्यपि वे सर्वकर्मचारी संघ में मुख्य पदाधिकारी नहीं रहे लेकिन अपनी सेवानिवृत्ति तक सभी संघर्षों में आगे रहे।

संघर्षों के साथ साथ वे पिछड़े हुए मेवात क्षेत्र में शिक्षा व स्वास्थ्य की मूलभूत सुविधाएं जुटाने तथा भेदभाव के खिलाफ सामाजिक व राजनीतिक स्तर पर भी सक्रिय रहे।

संघर्षों का यह सफर कैंसर की घातक बीमारी ने रोक दिया। उन्हें एम्स में दाखिल किया गया था। उनकी जीवन साथी सईदन, बेटी सबीना और बेटा शेर मोहम्मद एडवोकेट उनके साथ थे। आपरेशन हो गया था। डॉक्टर उसे सफल बता रहे थे लेकिन 06 मई 2005 को आखिरी दिन साबित हुआ।

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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