कविता
टीस के निशान
डॉ. रीटा अरोड़ा
जो उम्रभर चुप्पी में पलते रहे
ज़ख्म शब्दों के नहीं, उस सोच के हैं आज भी,
खुद गलत होकर भी जो, मुझे ही गलत ठहराती रही।
घुँघरू-सी हर मोड़ पर मैं टूटकर बिखरती रही,
दर्द की हर परत मगर, चुपचाप ही जमती रही।
ताउम्र रिश्ता ओढ़कर हर ज़ख्म मैं सहती रही,
अपने ही आँसू पीकर, मुस्कानों में ढकती रही।
खुद की हर भूल का बोझ मेरे सिर रखता रहा,
आईना खुद धुँधला था, चेहरा मेरा तकता रहा।
जानता था कि मैं काबिल हूँ, फिर भी नाकाबिल कहता रहा,
मेरे आत्मविश्वास को तोड़, खुद को ऊँचा रखता रहा।
वह अपने अहं की आग में हर रोज़ जलता ही रहा,
मेरे धैर्य को हार कह, खुद को विजेता कहता रहा।
अपनी हर नाकामी का दोष मेरे ही सिर मढ़ता रहा,
हर सच से आँखें मूँदकर, झूठ को सच कहता रहा।
पुरानी हर एक भूल को हथियार वह बनाता रहा,
हर नए विवाद में मेरा बीता कल उठाता रहा।
मैं चुप रही तो कायर कहा, बोली तो अदालत बना दिया,
“कोर्ट-कचहरी मत बनो” कहकर मेरा सच दबाता रहा।
मैं दर्द की भाषा कहती, वह बहस में ढलता रहा,
अपनी भावनाओं के आहत होने का दावा करता रहा।
मेरी हर संवेदना को वह वहम बताता ही रहा,
मेरे सच्चे आँसुओं को कमज़ोरी, ज़िद या नाटक बताकर टालता रहा।
पर सोचती हूँ… आज भी… क्या उसे कभी टीस हुई?
क्या उसका दर्द भी कभी उससे सवाल करता होगा?
मेरी चुप्पी का सन्नाटा, क्या उसे भी रातों में टटोलता होगा?
किसी और के तन-मन में आग लगाकर,
क्या धुआँ उसकी साँसों तक नहीं पहुँचता होगा?
झूठ की हर जीत के बाद भी,
क्या आईना उससे कुछ नहीं कहता होगा?
जश्न तो हर जीत का वह उम्रभर मनाता रहा,
रात के सन्नाटे में क्या खुद से नज़र मिलाता रहा?
रिश्ता तो मैं निभाती रही, वह अहं निभाता रहा,
जीत तो हर बार मिली… मगर इंसान हारता रहा।
मैं बोलना नहीं भूली, बस ख़ामोश रहना सीखती रही,
जहाँ सच सुनने की चाह न थी, वहाँ बोलकर हारती रही।
टीस इस बात की नहीं कि दर्द मेरा कम न था,
टीस इस बात की है कि वह हर बार मुझे गलत साबित करता रहा।
