लोहिया से नथवानी तक : क्या बदल रहा है अखिलेश का समाजवाद ?

यूपी राजनीति

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई…

लोहिया से नथवानी तक : क्या बदल रहा है अखिलेश का समाजवाद ?

ओमप्रकाश तिवारी

गोरख पांडेय ने यह पंक्ति 1978 में लिखी थी। यह सिर्फ समाजवाद के आने की धीमी रफ्तार पर टिप्पणी नहीं थी। पूरी कविता में समाजवाद के उन रास्तों पर व्यंग्य है, जिनसे होकर वह सत्ता और राजनीति में आता है और आते-आते अपने मूल अर्थ से दूर होता जाता है। कविता में पैसा, वोट, सत्ता, कांग्रेस, जनता, डॉलर, रूबल, वादा और लबादा—सबके रास्ते से समाजवाद के आने की विडंबना दिखाई गई है।

आज, लगभग पांच दशक बाद, यही पंक्ति समाजवादी पार्टी के एक फैसले के सामने रखी जाए तो एक नया सवाल पैदा होता है कि लोहिया से नथवानी तक आते-आते अखिलेश यादव का समाजवाद कितना बदल गया है?

सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए प्रो. रामगोपाल यादव के साथ धनराज परिमल नथवानी को अपना उम्मीदवार बनाया है। नथवानी कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े हैं और रिलायंस इंडस्ट्रीज में ग्रुप प्रेसिडेंट के पद पर हैं। वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। नथवानी का नाम सामने आते ही अखिलेश का फैसला चर्चा में आ गया। वजह केवल यह नहीं कि नथवानी पारंपरिक समाजवादी राजनीति से बाहर की पृष्ठभूमि से आते हैं। उनके पिता परिमल नथवानी भी राज्यसभा सदस्य हैं। 2026 में झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में एनडीए के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे। भाजपा के करीबी माने जाते हैं। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के कोटे की राज्यसभा सीट के लिए धनराज नथवानी को क्यों चुना?

अखिलेश का जवाब क्या है?

इस फैसले पर अखिलेश यादव ने सफाई दी है। उनका कहना है कि सपा को नई पीढ़ी और नई सोच के लोगों को संसद में भेजने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट जगत में दूसरे दलों की मौजूदगी है और समाजवादी पार्टी ने उद्योग जगत से जुड़ने के लिए एक राज्यसभा सदस्य भेजने का फैसला किया है। अखिलेश के मुताबिक इससे उत्तर प्रदेश में उद्योग और कारोबार को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि उद्योग जगत से जुड़े लोगों की सेवाएं समाज के लिए उपयोगी हो सकती हैं। यानी अखिलेश इसे समाजवाद से विचलन के रूप में नहीं, बल्कि समाजवादी राजनीति के विस्तार के रूप में देख और पेश कर रहे हैं। यहीं इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।

लोहिया का समाजवाद और अखिलेश की राजनीति

राममनोहर लोहिया के समाजवाद की बुनियाद सामाजिक बराबरी, आर्थिक विषमता को कम करने, पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी और सत्ता के केंद्रीकरण के विरोध जैसी अवधारणाओं पर थी। समाजवादी पार्टी ने लंबे समय तक इसी राजनीतिक परंपरा को अपनी पहचान के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि मुलायम सिंह यादव ने भी कई उद्योगपतियों का सहारा लिया था। उसमें सहारा प्रमुख, अमर सिंह और अनिल अंबानी का नाम प्रमुख ताैर पर लिया जा सकता है। ऐसे में अखिलेश यादव भी यदि अपने पिता के रास्ते पर चल पड़े हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

वैसे भी आज की राजनीति 1960 या 1970 के दशक की राजनीति नहीं है। उत्तर प्रदेश को उद्योग चाहिए। रोजगार चाहिए। निवेश चाहिए। निजी क्षेत्र के साथ संवाद चाहिए। राज्य सरकारें देश-विदेश के निवेशकों को बुलाने के लिए लगातार प्रयास करती हैं। ऐसे में कोई राजनीतिक दल अगर उद्योग जगत से संवाद स्थापित करना चाहता है तो यह अपने आप में समाजवाद से बाहर निकल जाने का प्रमाण नहीं है। अखिलेश का तर्क इसी जगह खड़ा दिखाई देता है। उनकी राजनीति का एक हिस्सा अब सामाजिक न्याय की पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ विकास, निवेश और नई अर्थव्यवस्था को भी संबोधित करना चाहता है। नथवानी की उम्मीदवारी को इसी बदलाव की एक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता

राजनीति में प्रतीक भी महत्वपूर्ण होते हैं। एक ऐसी पार्टी जिसने अपनी पहचान किसानों, पिछड़ों, मजदूरों, छोटे कारोबारियों और सामाजिक न्याय के सवालों के साथ बनाई हो, उसके लिए कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति को राज्यसभा भेजना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है। इस संदेश को दो तरह से पढ़ा जा सकता है। पहला—सपा अपनी पुरानी सामाजिक आधार वाली राजनीति को छोड़ रही है। दूसरा—सपा अपने सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र में अपना दायरा बढ़ाना चाहती है। इन दोनों में से कौन-सी व्याख्या अधिक सही है, इसका जवाब केवल नथवानी के नाम से नहीं मिलेगा। उसके लिए आने वाले समय में पार्टी की नीतियों, उद्योगों के प्रति उसके रुख, श्रम और रोजगार संबंधी नीतियों तथा सामाजिक न्याय के मुद्दों पर उसके व्यवहार को देखना होगा।

“समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई…”

यहीं गोरख पांडेय की कविता अचानक आज की राजनीति के बहुत करीब आ जाती है।

कवि ने लिखा था—

“नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई…”

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई 

कविता का व्यंग्य यही था कि जिस विचार का दावा गरीब और शोषित समाज के पक्ष में था, वह सत्ता और पूंजी की गलियों से होकर गुजरते हुए किस तरह बदल सकता है। आज नथवानी का नाम सामने आने पर इस पंक्ति को याद करना इसलिए दिलचस्प है कि यहां भी समाजवादी राजनीति और कॉरपोरेट जगत का एक नया संपर्क दिखाई दे रहा है।

लेकिन अंतर भी है। आज की अर्थव्यवस्था में उद्योग को पूरी तरह राजनीति से अलग रखकर विकास की कल्पना करना मुश्किल है। सवाल यह नहीं कि समाजवादी पार्टी उद्योग जगत से बात क्यों कर रही है। असली सवाल यह है कि उस संवाद की शर्तें क्या होंगी? क्या उद्योग समाजवादी राजनीति के सामाजिक एजेंडे को प्रभावित करेगा? या समाजवादी राजनीति उद्योग और निवेश को सामाजिक न्याय, रोजगार और क्षेत्रीय विकास के अपने एजेंडे से जोड़ पाएगी? यही इस फैसले की असली परीक्षा होगी।

नथवानी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, संकेत भी हैं

धनराज नथवानी का चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल किसी उद्योगपति को राज्यसभा भेजने का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक वर्ग के विस्तार का संकेत हो सकता है, जिसे अखिलेश यादव नई अर्थव्यवस्था और उद्योग जगत के साथ जोड़ना चाहते हैं। अखिलेश ने स्वयं कहा है कि कई राजनीतिक दलों की कॉरपोरेट जगत में मौजूदगी है और सपा भी उद्योग जगत से जुड़ना चाहती है। यह बयान इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक व्याख्या देता है। अर्थात इसे केवल व्यक्तिगत पसंद या चौंकाने वाले टिकट के रूप में देखने के बजाय सपा की बदलती राजनीतिक पहुंच के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

लेकिन समाजवाद का दूसरा सवाल भी है

अगर समाजवाद का अर्थ सिर्फ उद्योगों को उत्तर प्रदेश में लाना रह जाए तो फिर समाजवाद और सामान्य विकासवादी राजनीति के बीच अंतर क्या रह जाएगा? समाजवाद की पहचान सिर्फ निवेश से नहीं बनती। वह इस सवाल से बनती है कि निवेश से पैदा होने वाली संपत्ति और रोजगार का वितरण किस तरह होता है। मजदूर को क्या मिलता है? किसान को क्या मिलता है? छोटे कारोबारी को क्या मिलता है? युवा को रोजगार मिलता है या केवल निवेश के आंकड़े बढ़ते हैं? और समाज के कमजोर वर्गों की राजनीतिक हिस्सेदारी कितनी बढ़ती है? इसलिए नथवानी का राज्यसभा पहुंचना अपने आप में समाजवाद के बदल जाने का अंतिम प्रमाण नहीं है। मगर यह जरूर बताता है कि अखिलेश यादव समाजवादी राजनीति की पारंपरिक सीमाओं को विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

शायद यही है नया समाजवाद

मुलायम सिंह यादव के दौर का समाजवाद मुख्यतः सामाजिक गठबंधनों और जमीन से जुड़ी राजनीति पर टिका था। अखिलेश यादव ने उसमें डिजिटल राजनीति, युवा राजनीति, शहरी आकांक्षाओं, बुनियादी ढांचे और विकास की भाषा जोड़ी। अब अगर उद्योग जगत से सीधा राजनीतिक संवाद भी उस राजनीति का हिस्सा बनता है, तो समाजवादी पार्टी के सामने एक नया संतुलन बनाने की चुनौती होगी—

सामाजिक न्याय भी और आर्थिक विकास भी। PDA भी और उद्योग भी।

पिछड़ों की राजनीतिक भागीदारी भी और कॉरपोरेट से संवाद भी।

यही संतुलन अखिलेश के समाजवाद की अगली पहचान तय कर सकता है। और इसलिए गोरख पांडेय की पंक्ति आज फिर सुनाई देती है—समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई… तब कवि पूछ रहा था कि समाजवाद किस रास्ते से आ रहा है। आज सवाल थोड़ा बदल गया है— अखिलेश का समाजवाद किस दिशा में जा रहा है?

लोहिया से नथवानी तक की यह यात्रा समाजवाद के अंत की घोषणा नहीं करती, लेकिन यह जरूर संकेत देती है कि समाजवादी राजनीति अपनी पुरानी परिभाषाओं के भीतर स्थिर नहीं रहना चाहती। अब देखना यह है कि यह बदलाव समाजवाद का विस्तार बनता है या समाजवाद की परिभाषा का परिवर्तन। यही आने वाले वर्षों में अखिलेश यादव की राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण सवाल होगा।

 

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