जन्मदिन पर विशेष
भगत सिंह को याद करने का असली अर्थ
धर्मेन्द्र आज़ाद
यह शहीदे आज़म भगत सिंह की लोकप्रियता और लोगों के दिलों में उनकी जगह का प्रमाण ही है कि हर वर्ष 28 सितंबर (जन्म दिवस) और 23 मार्च (शहादत दिवस) आते ही भगत सिंह कई रूपों में हमारे बीच दिखाई देने लगते हैं—सोशल मीडिया की तस्वीरों में, पोस्टरों और बैनरों पर, उनकी मूर्तियों पर चढ़ती फूल-मालाओं में और उनके प्रिय “इंकलाब ज़िंदाबाद” के नारों में।
हर साल की तरह इस बार भी हम उन्हें याद करेंगे। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या भगत सिंह को याद करना केवल उनकी तस्वीर साझा करना, उनकी मूर्ति पर फूल चढ़ाना और उनके नाम के नारे लगाना है? या उन्हें याद करने का अर्थ उनके उन विचारों तक पहुँचना भी है, जिनके लिए उन्होंने पढ़ा, लिखा, बहस की और अपने समय की स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाए?
महज 23 वर्ष की उम्र में भगत सिंह ने जिन सवालों को उठाया था, उनमें से कई आज भी हमारे सामने खड़े हैं—अंधविश्वास, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक असमानता, मेहनतकशों की स्थिति, शिक्षा, युवाओं की भूमिका, आज़ादी का अर्थ और एक बेहतर समाज की कल्पना।
यही वजह है कि भगत सिंह को समझने के लिए उनकी तस्वीर से आगे बढ़ना ज़रूरी है, उनके विचारों तक पहुँचना वक़्त की ज़रूरत है।
भगत सिंह केवल अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने वाले नौजवान नहीं थे। वे लगातार पढ़ते, लिखते और अपने विचारों की समीक्षा करते थे। उनकी वैचारिक यात्रा राजनीतिक स्वतंत्रता से आगे बढ़कर सामाजिक और आर्थिक बराबरी के सवालों तक पहुँची।
1924 में स्थापित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का लक्ष्य औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर एक स्वतंत्र गणराज्य की स्थापना करना था। 1928 में संगठन के नाम में “सोशलिस्ट” जोड़ा गया और यह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) बना। यह बदलाव इस बात का संकेत था कि क्रांतिकारी आंदोलन में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का सवाल भी महत्वपूर्ण होता जा रहा था और भगत सिंह तथा उनके साथी भारत में समाजवादी व्यवस्था कायम करना चाहते थे।
इसी दौर में भगत सिंह और उनके साथियों ने 1926 में नौजवान भारत सभा को युवाओं के बीच राजनीतिक चेतना, सामाजिक एकता और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनजागरण के मंच के रूप में विकसित किया। इसके कार्यक्रमों में साम्प्रदायिक संगठनों से दूरी बनाए रखना और धार्मिक सहिष्णुता पर जोर था।
इसलिए भगत सिंह को केवल बम-पिस्तौल और रोमांचक क्रांतिकारी छवि तक सीमित करना उनके व्यक्तित्व को बहुत छोटा कर देना होगा। उनका बड़ा पक्ष था—पढ़ना, सोचना, सवाल करना और अपने विचारों को लगातार विकसित करना।
असेम्बली बम कांड की पैरवी के दौरान अदालत में भगत सिंह का प्रसिद्ध वक्तव्य था—“पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।” इसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि केवल बम, पिस्तौल या हिंसक साधनों से सच्ची क्रांति नहीं लाई जा सकती। क्रांति को सफल और सार्थक बनाने के लिए वैचारिक दृढ़ता, उद्देश्य की स्पष्टता और सही सोच की आवश्यकता होती है।
उनका लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ भी उनकी वैचारिक परिपक्वता को दिखाता है। यह केवल ईश्वर में विश्वास या अविश्वास की बहस नहीं, बल्कि तर्क, आत्मचिंतन और स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाने की बात करता है।
आज जब किसी विचार, धर्म, विचारधारा, राजनीतिक पार्टी या राजनेता के पक्ष में लोगों की भावनाएँ इस तरह अंधभक्ति के स्तर तक पहुँच जाती हैं कि असहमति के स्वर भी व्यक्तिगत आघात लगने लगते हैं, तब सवाल पूछने की संस्कृति को बढ़ावा देना पहले से अधिक जरूरी हो जाता है।

साम्प्रदायिकता पर उनका लेख ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। ‘कीर्ति’ में प्रकाशित इस लेख में उन्होंने धार्मिक पहचान के आधार पर पैदा होने वाली दुश्मनी के कारणों और साम्प्रदायिकता के सामाजिक तथा आर्थिक आधारों पर विचार किया।
लगभग सौ वर्ष बाद भी धर्म और राजनीति का रिश्ता हमारे समाज का महत्वपूर्ण प्रश्न है। भगत सिंह के समय का सवाल था— हिन्दू, मुसलमान, सिख और दूसरे समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ क्यों खड़े हो जाते हैं?
आज भी यह समस्या हमारे समाज में बनी हुई है और विभाजन तथा नफ़रत का कारण बनती है। आज भी सवाल उठता है कि क्या हमारी पहचान हमें दूसरों से दूर करने के लिए है, या ऐसी पहचान भी संभव है जिसमें इंसान के रूप में पहचान व्यक्ति की जातिगत या धार्मिक पहचान से पहले दिखाई दे?
जाति को लेकर उनका लेख ‘अछूत समस्या’ भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने छुआछूत और सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाया था। आज भी जाति और सामाजिक भेदभाव के सवाल अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं—भेदभाव, हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों की असमानता के रूप में।

आर्थिक बराबरी और मजदूर-किसान का सवाल भी भगत सिंह के लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम’ में वे युवाओं से अध्ययन करने, राजनीतिक सिद्धांत को समझने और मजदूरों-किसानों के सवालों से जुड़ने की बात करते हैं। उनके लिए क्रांति केवल कुछ व्यक्तियों की वीरता नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया थी।
आज भी रोजगार की अनिश्चितता, आर्थिक असमानता, मजदूरों के अधिकार, किसानों की समस्याएँ और भविष्य को लेकर चिंता जैसे सवाल हमारे सामने हैं।
इसलिए भगत सिंह को केवल अतीत की लड़ाई में देखना उनके विचारों को सीमित करना होगा।
उनके सामने सवाल था—
आज़ादी के बाद समाज कैसा होगा?
और आज हमारे सामने है—
आज़ादी और तथाकथित विकास का अर्थ आम इंसान के जीवन में कितना दिखाई देता है?
भगत सिंह के लिए युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं थे। वे वर्तमान के भी सक्रिय नागरिक थे, जिन्हें वे पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों से भी जुड़ने का आह्वान करते थे। शिक्षा उनके लिए केवल परीक्षा, डिग्री और नौकरी का रास्ता नहीं, बल्कि समाज और अपने समय को समझने का माध्यम थी।
उनकी जेल-डायरी और उपलब्ध लेखन उनके व्यापक अध्ययन और बौद्धिक जिज्ञासा की झलक देते हैं। इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, दर्शन और क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े साहित्य में उनकी रुचि थी। उनकी वैचारिक यात्रा में समाजवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी साफ़ दिखाई देता है।
शायद भगत सिंह का सबसे आधुनिक पक्ष यही है—वे केवल क्रांतिकारी नहीं, जिज्ञासु और तर्कशील भी थे। उनके लिए “इंकलाब” का अर्थ केवल बम और पिस्तौल नहीं था। उसके पीछे विचारों की शक्ति और आमूलचूल परिवर्तन का सपना था।
यही कारण है कि भगत सिंह को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह अपने वर्तमान से सवाल करने का अवसर भी है।
आज कई सवाल हमारे समाज को घेरे हुए हैं, जैसे —
सम्माजनक रोजगार की सुनिश्चितता क्यों नहीं है?
सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे सुनिश्चित हो?
जाति और सामाजिक भेदभाव से मुक्ति कैसे मिले?
धर्म के नाम पर समाज में खाई पैदा होना कब रुकेगा?
मेहनतकशों को उचित मेहनताना और सम्मान कैसे मिले?
लोकतंत्र में नागरिक की आवाज कितनी प्रभावी है?
और जिस विकसित भारत का सपना देशवासियों को दिखाया जाता है, उसमें आम इंसान की जगह कहाँ है?
इन सवालों के आसान जवाब शायद तब भी नहीं थे और आज भी नहीं हैं। लेकिन सवाल पूछने का साहस, पढ़ने की आदत, तर्क करने की क्षमता और अपने समय को बेहतर बनाने की बेचैनी—यही भगत सिंह की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।इन अनसुलझे मुद्दों के हल निकालने रास्ता भी इन्हीं सवालों से जूझने, तर्क करने, अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से ही निकलेगा, इसी रास्ते में बढ़ने की प्रेरणा हमें शहीदे आज़म भगत सिंह और उनके साथियों से मिलती है।
इसलिए भगत सिंह को याद करते हुए हमें उनके बारे में केवल सुनी-सुनाई बातों या सोशल मीडिया के उद्धरणों तक सीमित न रहकर उनके लेखन का व्यापक अध्ययन करना चाहिए और आज की समस्याओं को भी उनके क्रांतिकारी नजरिये से देखने की कोशिश करनी चाहिए।
उनके लेखन में हमें एक ऐसे क्रांतिकारी नौजवान की आवाज सुनाई देती है, जिसके विचार उसकी उम्र से कहीं आगे थे।
वे कोई दूर खड़ी मूर्ति नहीं हैं। वे एक बेचैन नौजवान की तरह दिखाई देते हैं—जो पढ़ रहा है, सोच रहा है, बहस कर रहा है और अपने समय से पूछ रहा है—
आखिर हम कैसी दुनिया बनाना चाहते हैं?
शायद भगत सिंह को सचमुच याद करने का अर्थ यही है—
उनकी तस्वीर से आगे बढ़कर उनके विचारों तक पहुँचना।
—
