साहित्य आलोचना के सरोकार
किसान-मज़दूर और कर्ज़ की समस्या की पड़ताल करती कहानियाँ (भाग-1)
ओमसिंह अशफ़ाक
इस लेख में हमने हरियाणा की तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करने वाली तीन कहानियों- ‘ट्रैक्टर और सुहागा’ (रामकुमार आत्रेय) हरिगंधा’, अंक-163 ‘खाली लौटते हुए’ (स्व.तारा पांचाल)अंक-166 और ‘सरा’ (अमित मनोज) संयुक्तांक- 174-175 पर विवेचना की है।
कहानी ‘ट्रैक्टर और सुहागा’ तथा ‘सरा’ हरियाणा के किसानों के यथार्थ से हमारा साक्षात कराती हैं जिसमें छोटी जोत के किसान की कर्जे की भारी समस्या और कष्टपूर्ण जीवन से हमारा सीधा परिचय होता है।
वहां यह भी स्पष्ट हो जाता है कि बेशक कृषि में नई टेक्नॉलाजी और मशीनरी का प्रवेश हुआ है जिससे किसानों का श्रम तो कुछ आसान हुआ है परंतु इसने उसे कर्जे के जाल में भी फंसा दिया है जिससे निकलने का कोई रास्ता न देखकर किसान आत्महत्या जैसे अतिवादी कदम उठाने को विवश हैं।
इस स्थिति को जटिल बनाने में मंहगे होते खाद, बीज, कीटनाशक, बिजली, डीजल और सस्ती लुटती फसल तथा प्रकृति की मार का भी बड़ा हाथ है।
दोनों कथाकारों में बेशक दादा-पोते की पीढ़ी का अंतराल है, परंतु दोनों कहानियों में एक समानता यह है कि दोनों में नायक की मौत हो जाती है।
एक कहानी का नायक किसान आत्महत्या कर लेता है, तो दूसरे किसान का जीवन जनवरी माह की भयंकर ठंड में रात में खेत की सिंचाई करते हुए पाले की भेंट चढ़ जाता है।
जिस वक्त ये कहानियाँ छपीं (2008-09 में) उस समय तक भी लगभग दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके थे, और आज उस आंकड़े में करीब 90 हजार नाम और जुड़ चुके हैं।
वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने इस समस्या का व्यापक सर्वेक्षण और अध्ययन/विश्लेषण किया है जिसका सारांश समय-समय पर अखबारों में भी छपता रहा है।
लेकिन वह अलग लेख का विषय हो सकता है। यहाँ पर हम कहानी के कथ्य और शिल्प पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखने की कोशिश करेंगे।
तीसरी कहानी ‘खाली लौटते हुए’ एक ग्रामीण मज़दूर परिवार की स्थिति का चित्रण मालूम हाता है (हालाकि उस परिवार के पेशे के बारे में कथाकार ने स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं बताया है) जहाँ अभी भी भंयकर अभाव, अज्ञानता और आतंक दिखायी पड़ता है।
अभाव धन का, अज्ञानता कानून की और आतंक पुलिस का।
पाठक कहानी में पूरी तरह रम जाता है। आईये देखते हैं उपरोक्त कहानीकारों के यहाँ कहानी कैसे आगे बढ़ती है!
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‘ट्रैक्टर और सुहागा’ के नायक हरिसिंह के पास तीन किल्ले (एकड़) ज़मीन थी। दो-तीन किल्ले बंटाई पर ले लिया करता। साथ में दो-तीन भैंस रखता।
हरिसिंह और उसकी घरवाली ने सोचा कि यदि ट्रैक्टर खरीद लिया जाए तो कमाई एकदम से कई गुना बढ़ जायेगी। मार्किटिंग वाले कैसे सब्जबाग दिखाकर ग्राहकों को फाँसते हैं, एक चित्र देखिये :
“वैसे ट्रैक्टर खरीदने का ख्याल हरि सिंह के दिमाग में यूँ ही नहीं आया था। एक दिन शहर की ट्रैक्टर एजेंसी वाले गाँव आए थे। वे फाइनेंसर का काम भी करते थे। खेल दिखाने वालों की तरह गली-गली में गए थे। गुड़ जैसी मीठी बातें बनाते हुए उन्होंने जमींदारों को धनी व सुखी बनाने के सपने दिखाये। उन सपनों ने हरिसिंह के सीधे-सादे मन पर अमिट छाप अंकित कर दी थी।
उसके कानों में कई दिनों तक उनकी यह बात गूँजती रही थी कि ट्रैक्टर एक तरह से बिल्कुल मुफ्त मिलता है। पक्का सिक्के बंद। दो साल की गारंटी, ज़रा सा खराब होते ही एजेंसी वाले खुद ठीक करवाएँगे। पैसे छह या मनचाही किश्तों में चुकाने होंगे। ट्रैक्टर तो बहुत बड़ा कमाऊ पूत होता है। जब घर में आएगा तो खुद कमाएगा, खुद किश्तें चुकाएगा। जमींदार को तो सिर्फ टैक्टर हाँकना है. मालिक बनकर । रुपयों में खेलेगा मालिक।”
हरिसिंह के चार संताने थीं, एक बेटी और तीन बेटे। बेटी ब्याहने लायक हो गई थी। सुंदर और सच्चरित्र थी। लड़की ने गाँव के स्कूल में दसवीं पास कर ली थी।
“हरि सिंह ने बेटी के ब्याह के लिए एक-एक करके बीस हज़ार रुपये जोड़ रखे थे। बस, उन रुपयों को लेकर पहुँच गया था वह उस ट्रैक्टर एजेंसी के पास।
एक लाख निन्यानवे हज़ार नौ सौ निन्यानवे का ट्रैक्टर। बीस हजार नकद चुका दिए बाकी का पैसा ब्याज सहित छह किश्तों में चुकाना स्वीकार कर लिया चालीस हज़ार रुपये हर छमाही।
यदि एकमुश्त जमा कराना चाहो तो ब्याज में छूट। बीच में कोई गारंटर नहीं। सिर्फ इतना लिखकर देना पड़ा कि यदि वह किसी कारण पैसा नहीं चुका पाया तो एजेंसी तीन किल्लों पर कब्ज़ा करने के लिए कोर्ट कचहरी का दरवाजा खटखटाने को आज़ाद होगी।
एजेंसी वालों ने बताया कि ऐसा तो सिर्फ दिखावे के लिए किया गया है क्योंकि ट्रैक्टर की कमाई ही इतनी होगी कि वह अगली किश्तें बहुत पहले चुका देगा। लोगों में उसकी इज़्ज़त होगी,पूछ होगी क्योंकि उसके पास पैसा होगा, ट्रैक्टर होगा।
हरिसिंह को ऐसा लिखकर देने में कोई खराबी नज़र नहीं आई। उसने दूसरे बैंक से भी पता किया था कि उसे भूमि रहन रखने पर कर्ज के रूप में पैसा मिल सकता है। रहन की कार्यवाही तहसील कार्यालय द्वारा करवाई जाएगी। जबकि एजेंसी वाले सिर्फ लिखवाकर ही ले रहे थे।
आखिर इतने पैसों की चीज भी दे रहे हैं, कुछ तो लिखवाएँगे ही। सरकारी बैंक वाले तो किश्त न चुकाने पर पुलिस सहित आ धमकते हैं पकड़ने के लिए उसने कई किसानों को उनसे बचने के लिए दिन भर ईख की फसलों में छिपकर समय बिताते देखा था।
गात छिल जाता है पूरा। मच्छर काट-काट कर सुजा देते हैं। आखिर में कभी न कभी पकड़ में आ ही जाता है। पैसे भी देने पड़ते हैं और पिटाई भी सहनी पड़ती है। नहीं तो खेत नीलाम हो जाता है।”
लेकिन खाली ट्रैक्टर से तो काम चल नहीं सकता था। उसके साथ दूसरे इम्पलीमेंट्स भी तो चाहिए होते हैं :
“लेकिन उसे फसल की कटाई शुरू होने से पहले थ्रैशर मशीन भी खरीदनी होगी और ट्रॉली भी। थ्रेशर गेहूँ निकालेगा तो ट्रॉली के द्वारा मंडी में पहुंचाया जाएगा। खूब कमाई होगी। नकद ।
हरिसिंह तो शुरू से ही सोच कर खुश था कि दो लाख में सब कुछ मिल जाएगा। परंतु उतने में तो सिर्फ ट्रैक्टर ही आया था। गेहूँ की फसल पकने को तैयार थी। यदि वह थ्रेसर तथा ट्रॉली नहीं खरीदता तो फिर कमाई कैसे होती। उसे तुरंत दोनों चीजें खरीदनी पड़ीं, सत्तर हज़ार रुपया लग गया, सब उधार पर। इस वायदे के साथ कि गेहूँ की फसल पर जो कमाई होगी, उसी में से सब रुपया चुका दिया जाएगा।
फसल निकाली गई, पचास हज़ार से कुछ ऊपर की कमाई हुई। दस हज़ार रुपये का तेल खर्च हो गया पाँच-छह हज़ार रुपये की उधार रह गई। घर के तीन किल्लों में जो गेहूँ थी उसमें से पंद्रह मन खाने के लिए रखकर बाकी बेच डाली। ट्रॉली तथा थ्रैशर की पूरी रकम नहीं चुकाई जा सकी।
धान की फसल आने पर बाकी का रुपया ब्याज सहित चुकाने का वायदा कर लिया उसने सोच लिया था कि धान की फसल के लिए वह ट्रैक्टर के नाम पर चार-पाँच किल्ले बंटाई पर ले लेगा। धान भी बासमती बीजेगा। महंगा बिकता है। तभी वह एजेंसी वालों की दोनों किश्तें एक साथ चुका देगा।
खुद जाकर उन्हें समझा आया कि किश्त वह पैनल्टी के साथ चुकाएगा। किसी तरह की चिंता न करें। धान की रोपाई से पहले उसे हैरो भी खरीदनी पड़ी। सुहागा भी लाना पड़ा। यह सब उधार पर था। पति-पत्नी ने खूब मेहनत की। मज़दूर भी लगाए लगभग सात एकड़ में धान रोप दिया।”
इसी की उम्मीद में हरिसिंह ने बेटी का रिश्ता भी तय कर दिया, बावजूद इसके कि विवाह में दूल्हे को हीरो होंडा बाइक दिए जाने की शर्त बिचौलिया पहले ही उसके समक्ष रख चुका था :
“परंतु उसे क्या मालूम कि होनी को तो कुछ और ही मंजूर है। बंदा जो सोचता है ज़रूरी नहीं कि भगवान भी वही सोचे। धान की फसल पर उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। बढ़िया बीज खरीदा था। पानी-खाद भी मन लगा कर दिया था। दो-तीन बार बरसात भी ज़ोर की हो गई थी। पौधे निसर आए थे। बासमती धान का भाव सतरह सौ रुपये प्रति क्विंटल था। लग रहा था कि ट्रैक्टर खुशहाली लेकर आया है।
एक दिन शाम के वक्त काली घटा उठी और देखते ही देखते उसमें से पत्थर (ओला़) बरसना शुरू हो गया। बासमती धान का एक भी पौधा खड़ा नहीं दिखाई दिया। “मोटा”(चावल के ‘कामन’ ग्रुप की वैरायटी) और “साठी” (60दिन में पकने वाली फसल) धान की फसलें तो कभी की मंडियों में बिक चुकी थीं।
बासमती बीजने वालों के लिए तो आकाश से अकाल बरसा था। हरिसिंह ने अपना खेत देखा तो बेहोश होकर गिर पड़ा। आस-पड़ोस के लोग ही उसे उठाकर घर लाए थे।
कई दिन बाद ही वह चारपाई से उठ पाया था। हालत ऐसी थी कि मानों कई महीने की बीमारी भोगने के बाद उठा हो। किसी तरह अपने को संभाला।
सरकार ने ओलों से प्रभावित खेतों की विशेष गिरदावरी करने के लिए पटवारी तथा नायब तहसीलदार को भेजा था। हरिसिंह को कुछ आशा बंधी थी कि कुछ मुआवज़ा तो सरकार ज़रूर देगी।
एजेंसी वालों के सामने जाकर हाथ जोड़ दिए, खुद को आँसू बहाने से भी नहीं रोक पाया उन्हें विश्वास दिलाया कि गेहूँ की फसल उठते ही सभी किश्तें एक साथ चुका देगा। नहीं चुका पाया तो वह अपनी ज़मीन बेच देगा। चाहे खुद को ही गिरवी क्यों न रखना पड़े। एजेंसी वाले उसकी बात से सहमत हो गए, उन्हें तो पैनल्टी भी मिलनी थी।
हरिसिंह का होने वाला समधी इस जिद के साथ उसके दरवाजे पर अड़कर बैठ गया कि उसे तो अपने बेटे का ब्याह अभी करना है :
“ऐसे में हरिसिंह को लगा कि यदि यह रिश्ता हट गया तो लोग समझेंगे कि उसकी लड़की में ही कोई खोट है। लड़की का रिश्ता हटना अच्छी बात नहीं समझी जाती। मज़बूरन उसे शादी करनी पड़ी।
आढ़ती से दो रुपया सैंकड़ा पर कर्ज उठाना पड़ा। वह भी इस वायदे के साथ कि गेहूँ की पूरी फसल उसके यहाँ बेची जाएगी। कर्ज़ की पूरी रकम काटकर बाकी जो पैसा बचेगा वही हरिसिंह को मिलेगा।”
हरिसिंह विकट परिस्थिति में फंसता जा रहा था, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और :
“अगली फसल की तैयारी के लिए उसने खून-पसीना एक कर दिया भूख-प्यास सब भुला दी। दूसरे किसानों के खेतों में भी वह दिन-रात बटाई में लगा रहा।
इस बीच एक दिन तहसील कार्यालय से कुछ कर्मचारी राहत-राशि बाँटने आ गए, यह राहत धान की नष्ट हुई फसल के बदले में थी। किसी को तीन सौ रुपये एक किल्ले के हिसाब से पैसा मिला, तो किसी को चार सौ। उसे सिर्फ एक सौ तिरेपन रुपये मिले। इकावन रुपये प्रति किल्ला। पूछने पर मालूम हुआ कि नष्ट हुई फसल का हिसाब लगाकर राहत दी गई है। उसने तो एक सो तिरेपन रुपये भी लेने से इंकार कर दिया क्या फायदा?
दो-तीन दिन बाद यही खबर अखबारों में भी आई, सरकार का मज़ाक भी उड़ाया गया पर कुछ नहीं होना था, सो नहीं ही हुआ। पटवारी की मार तो आज भी वैसी ही बनी हुई है जो वर्षों पहले हुआ करती थी।”
सरकारी-राहत, योजनाओं का क्या हश्र होता है, उपरोक्त पक्तियों में लेखक स्पष्ट कर देता है।
“ट्रैक्टर खरीदने के बाद उसने साढ़े तीन सौ फिट की गहराई वाला नलकूप लगवाने की सोची थी। पर पैसा ही नहीं आया, सो कहाँ से लगवाता। दूसरों के नलकूप से पानी खरीद कर गेहूँ बिजाई करी। कोर (पहला पानी) देने का वक्त आया तो नहर नहीं आई। न ही दूसरों के नलकूपों से पानी मोल मिला।
वे दिन-रात एक करके अपने-अपने खेतों में पानी लगा रहे थे। फलस्वरूप गेहूँ का उठान ही मारा गया, पानी मोल मिला तो काफी देर बाद। तब तक पौधों की जान ही सूख गई थी। पानी देने, खाद डालने पर भी कोई खास लाभ नहीं हुआ। यहाँ-वहाँ मरियल से पौधे दिखाई देते रहे।
फसल कटने तक एक भी बूँद आकाश से नहीं गिरी। बादल आए ज़रूर, बरसने को भी हुए पर बरसे कहीं और जाकर। जिन खेतों को नहरों का पानी मिलता रहा, अथवा नलकूप का पानी ठीक था, वहाँ फसलें काम चलाऊ हो गईं। पर हरिसिंह का खेत न तो अनवड़ (अनबीजा) रहा और न ही फसलदार। बंटाई वाले खेतों का भी लगभग यही हाल था।
वर्ष भर के लिए खाने की गेहूँ भी नहीं आई, बिकती तो कहाँ से। बीज, खाद तथा पानी का खर्च भी कर्ज़ में शामिल हो कर रह गया।”
किसान के ऊपर प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी हमेशा मंडराता रहता है। उसकी फसल तो खुले आसमान के नीचे ही रहती है। ना बरसे तो मरा, ज़्यादा बरस गया तो भी। आख़िर वही हुआ जिसका डर था :
“एजेंसी वाले जीप में सवार होकर उसके घर आए थे। अब तक तीन किश्तें भरी जानी थीं। भरी एक भी नहीं गई। उनका धैर्य जवाब दे गया था। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में हरिसिंह को कह दिया था कि यदि अगले दिन तक उनकी किश्तें नहीं चुकाई गई तो वे उसके खेत पर कब्जा कर लेंगे। कोई भी अदालत अथवा पुलिस उसका साथ नहीं देगी। क्योंकि उसने खुद अदालती कागज पर ऐसा लिखकर दे रखा है।
हरिसिंह का यह अनुरोध भी उन्होंने ठुकरा दिया कि उसे एक फसल तक और मोहलत दी जाए। हर किश्त के साथ लगने वाली पैनल्टी भी पचास हज़ार हो चुकी थी। पहली किश्त पर जो पैनल्टी लगनी थी, अगली किश्त के बाद वही दुगनी हो जानी थी। अगली पैनल्टी तो अलग थी ही।”
आढ़ती को जब पता चला कि एजेंसी वाले हरिसिंह की ज़मीन पर कब्ज़ा करेंगे तो उसने भी वकील के जरिए नोटिस भिजवा दिया कि एक माह के भीतर पूरी रकम ब्याज सहित नहीं चुकाई तो वह उसके खेत नीलाम करवा देगा।
हरिसिंह बुरी तरह इस मकड़जाल में फंस चुका था। अब वह क्या करे। कहाँ जाए? वह अपने खेत में पीपल के नीचे खड़ा यही सोच रहा था और उसकी पत्नी रात भर घर में उसका इंतजार करती रही।
“उधर पूरब में सूरज उग रहा था और इधर हरिसिंह ने पीपल के टहने में रस्सा डालकर फाँसी ले ली थी। इस तरह ग्रामीण कहावत को चरितार्थ करते हुए उसने ट्रैक्टर खरीदकर अपने जीवन, घर के उज्ज्वल भविष्य और अपने परिवार की खुशियों पर भी सुहागा फेर दिया था। उसकी देह हवा में झूलती हुई फड़फड़ा रही थी।”
परंतु क्या यह पूरा सच है कि ट्रैक्टर की वजह से हरिसिंह की जान गई है? शायद नहीं। यदि सरकार की तरफ से किसान की फसल का पूरा बीमा किया जाए, सरकार स्वयं प्रत्येक गाँव में सरकारी ट्रैक्टर उपलब्ध कराये जिनमें डीज़ल की खपत और 10 रुपये प्रति घंटा की दर से मरम्मत खर्चा किसान वहन करके अपना खेत जोत ले और फसल तबाही का सही-सही और यथाशीघ्र मुआवजा मिले तो हरिसिंह जैसे छोटे किसानों को आत्महत्याओं से रोका जा सकता है। भ्रष्टाचार हर स्तर पर बंद करना ही होगा।…
(शेष भाग-2 शीघ्र अगली किश्त में..)
(2014 में)

लेखक के व्हाट्सएप एप पर प्राप्त हुई एक टिप्पणी:
“Such type of pitiable condition or the plight of farmers have been in the news for a very long time.
Hari Singh”s condition in TractorAur Suhaga is the same.
It reminds me of Godaan by Prem Chand where Hori suffers throughout his life. Today technology has added to his woes.
The gist has already been summed up in the last stanza.”
-Dr NK Nagpal,
principal (Retd.)
IGN College,Ladwa, KKR
Haryana.