कुछ आपबीती, कुछ जगबीती 

प्रतिबिंब मीडिया में अब तक हमने ओमसिंह अशफ़ाक की 14 कहानियां प्रकाशित की हैं जिनको हमारी उम्मीद से ज्यादा पाठकों ने देखा-पढा़-सराहा है और कुछ आलोचकों तथा कई संजीदा पाठकों ने अपनी लिखित प्रतिक्रिया से भी हमें अवगत कराया है। इन कहानियों की पृष्ठभूमि और रचना-प्रक्रिया को समझने के लिए यहां प्रस्तुत है वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक का बयान : संपादक।

 

कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक का बयान

कुछ आपबीती, कुछ जगबीत

ओमसिंह अशफ़ाक

 

देश आजाद होने के पश्चात् अनुमानतः दो साल बाद मेरा जन्म हुआ। बचपन की सबसे पहली जिस घटना की याद पचासों साल बाद भी स्मृति में बची हुई है, वह है मेरी माँ का अपेक्षाकृत लंबी अवधि तक बीमार पड़ जाना, फलतः स्तनों में दूध सूख जाना और माँ के दूध से मेरा वंचित हो जाना। माँ स्वयं भी बाद तक इस घटना का ज़िक्र किया करती थी। स्नेहिल पश्चाताप से कहती कि बीमारी के कारण असमय ही उसके बच्चे को स्तनपान छोड़ना पड़ा था।

आर्थिक अभावों के बावजूद ये शायद प्रगाढ़ ममत्व ही था जिसने मुझे समाज और दुनिया से आत्मीय गहराई तक प्यार करना सिखाया। बल्कि मुझमें कुछ हद तक अतिरिक्त भावुकता का संचार भी कर दिया। माँ की मृत्यु हुए18 साल बीत गए (यह 2003 का बयान है) पर ज़ेहन में माँ की 50 वर्ष पुरानी तस्वीर ज्यों-की-त्यों कायम है।

छः सात वर्ष की उम्र में स्कूल भेजा गया। फिर चारे का संकट आया तो पशु चराने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा? साल-दो साल जंगल में भटकने के बाद पुनः स्कूल में प्रवेश हुआ। शिक्षा पाने का अवसर भी देहाती-कस्बाई संस्थाओं में ही मिला। उस ग्रामीण माहौल में सेकिंड डिवीजन में पास होने का मतलब था-पढ़ाई में ‘होशियार’ होना। सो, विज्ञान विषय में दाखिला हो गया था। पढ़े जा रहे विषयों में रुचि-अरुचि का वहाँ कोई मतलब नहीं था। और न ही वैकल्पिक चुनाव के लिए मार्गदर्शन की व्यवस्था। इसी व्यवधानपूर्ण तरीके से स्नातक स्तर तक औपचारिक शिक्षा की गाड़ी खींचते-खिंचवाते सीमांत किसान परिवार की सांस फूल गयी थी।

ज़ाहिर है उस परिवेश में बचपन भी कोई फूलों की सेज नहीं था। तपती-लू में घुटनों तक पामचे चढ़ाकर पशुओं की पूँछ मरोड़ते हुए गाहटा गाहणा, पाला़ पड़ती रातों में रहट-कोल्हू में जुते बैलों के पीछे दसियों कोस की चक्कर-घिन्नी खाते रहना, वक़्त-बेवक़्त बर्फीले नहरी पानी में घुसकर नाक्का मोड़ना, रात-बिरात खेतों की रखवाली करना, गेहूँ की फसल कटाई और ईख छुलाई आदि सभी कष्टप्रद काम बच्चों को भी करने पड़ते थे। फिर भी गाहे-बगाहे अन्न, धन, दूध और दवा का अभाव बना ही रहता था। परन्तु जीवन की फितरत है कि हर हाल में जिंदा रहने के गुर ख़ोज ही लेता है। सो, हम-उम्र बच्चे इकट्ठे होकर बिना खर्च-लागत का कोई-न-कोई खेल, खेल लेते। उस उल्लास में फौरी तौर पर अपने कष्टों को भूल जाते और थककर सो जाते।

अगले दिन से फिर वही यातनापूर्ण दिनचर्या शुरू हो जाती। स्कूलों में अध्यापक भी उस दौर में बेरहमी से पिटाई करते थे। फिर भी गुरुजनों और बड़ों के प्रति सम्मान, निम्नमध्यवर्गीय आदर्शवाद, समाज और राष्ट्र के प्रति एक नैतिक दायित्व का बोध न जाने कैसे विकसित हुआ कि आज तक चैन से नहीं बैठने दे रहा। उसी का फल है ये कहानियाँ। इनमें आपबीती भी है और जगबीती भी।

इन कहानियों का सृजन 1981 से 1993 के बीच हुआ है। भारत में इस दौर का उठान तो जन-संघर्षों की बढ़त का था, लेकिन इसका ढलान कई विश्वव्यापी संकटों को साथ लेकर आया। जिनका असर शेष दुनिया के साथ-साथ भारत की जनता पर भी पड़ा। इन संकटों की मिसाल हैं- सोवियत संघ का विघटन (1991), नतीजतन एक ध्रुवीय पूंजीवादी विश्व का वर्चस्व कायम हुआ और उसके चलते आर्थिक अन्तरविरोधों की टकराहटों ने तीखा रूप ले लिया। भारत में सांप्रदायिकता की राजनीति का उभार, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय दमनकारी ताकतों के साथ उसका नापाक गठजोड़, और अंततः 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ।

पिछले दशक में भूमंडलीकरण के नाम पर साम्राज्यवाद ने दुनिया भर के मानव व प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करने की मुहिम तेज कर दी, लिहाजा तीसरी दुनिया के गरीबों पर शोषणकारी शिकंजा और अधिक कसता जा रहा है।

ज़ाहिर है इस भंवर से निकलने का कोई शॉर्टकट तरीका नहीं है, इसलिए संघर्ष अपरिहार्य हैं। यही वजह है कि संघर्ष को इन कहानियों के केंद्र-बिन्दु के रूप में जगह मिली है।

इन कहानियों के पात्र आम आदमी-औरतें ही हैं, जो हमें रोज़ हमारे आसपास दिख जाते हैं। उनमें राग-द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, लालच प्रलोभन हैं, तो किसी हद तक बचा हुआ आदर्शवाद और आशावाद भी है। सहयोग संगठन भी है जो इस बात का एहसास कराता है कि इंसानियत भीषण संकटों के बीच भी कहीं-न-कहीं बची रह जाती है।

साहित्य बेशक ‘फिक्शन’ ही होता है, परन्तु कल्पना को भी आख़िर यथार्थ का आधार चाहिए होता है। इसलिए बडी हद तक सुधी पाठक इन कहानियों के यथार्थ की विश्वसनीयता पर यकीन भी कर सकते हैं।

अन्त में, मैं हिन्दी-अंग्रेजी के विद्वान चिंतक और सुविख्यात आलोचक प्रो.ओमप्रकाश ग्रेवाल जी का धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद इन कहानियों की पुस्तक ‘आज का सच’ की भूमिका लिखी है। भाई प्रदीप कासनी का भी मैं बहुत आभारी हूँ जिन्होंने पाँडुलिपि तैयार करवायी और उसे सहेज कर रखा। उद्भावना के संपादक श्री अजेय कुमार के अनथक परिश्रम की मैं बहुत कद्र करता हूँ। इन रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाने में अनेक साथियों का सहयोग रहा है जिनके लिए यथोचित सम्मान मेरे मन में है। वे साथी मेरे इतने करीब हैं कि उनका नाम लेना उन्हें महज औपचारिकता लगेगी।

कहानियों के बारे में सुविज्ञ पाठकों की राय का स्वागत है।

ओमसिंह अशफ़ाक
13 दिसम्बर, 2003
कुरुक्षेत्र

3 thoughts on “कुछ आपबीती, कुछ जगबीती 

    1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

      आपका बहुत बहुत शुक्रिया और हार्दिक आभार मनजीत भाई। मेरा आग्रह है कि जब भी समय मिले तो अपनी प्रतिक्रिया न्यूनतम 57 वाक्य में लिखने की कोशिश की जाए ताकि आपके मनोभावों को अच्छे से प्रकट किया जा सके और दुसरे पाठक भी आपके विचारों को विस्तार से जान-समझ सकें और इस प्रकार एक विमर्श शुरू होने की गुंजाइश निकाल कर आए।
      -ओमसिंह अशफ़ाक’ कुरुक्षेत्र, हरियाणा।

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    अंग्रेजी साहित्य के वरिष्ठ आलोचक एवं प्रोफेसर डॉक्टर एनके नागपाल की यह टिप्पणी कहानीकार के व्हाट्सएप पर प्राप्त
    हुई है :
    ” I have known Mr Ashfak for the last16 years. But our meetings or sittings are very few.I know him as a writer,a story teller, a poet. a critic or a person ready to oppose injustice or capitalism.I find him standing with the peasants ,the poor and the exploited.But I never knew about his past life, his struggle during the childhood days.The good thing is that his early hard life has sharpened his intellectual faculties and made him a man with a heart of gold.
    Wish him all the best.”
    Dr Nk Nagpa, formerly principal and professor at IGN college, Ladwa, kurukshetra (Haryana) India.

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