जसवीर त्यागी की छह छोटी और एक बड़ी कविता
रंग
मेरे घर की खिड़की से
एक हरा पेड़
और नीला आसमान दिखता है
हरा और नीला रंग
मेरे रक्त के लाल रंग को
दुरुस्त रखते हैं।
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फूलों की माला
रंग-बिरंगे
खिले-खिले
सुवासित फूलों की माला
समय के सूर्य की तपिश से
सूख गयी
सूखने के बाद भी
देखने वाले
उसे फूलों की माला ही कहते हैं।
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उजाला
कुछ इंसान
धूप की तरह होते हैं
मिलने पर अंधकार हरते हैं
उजाला फैलाते हैं।
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कुछ इंसान
कुछ इंसानों के होने से
दुनिया कितनी सुंदर हो जाती है
कुछ इंसान
सिर्फ़ कुछ इंसान नहीं होते
पूरी दुनिया होते हैं।
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गुम हुई चीजें
चीज़ें गुम हो जाती हैं
गुम हुई चीज़ों की स्मृति
गुम नहीं होती।
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अक्षर
हम दोनों
भाषा के संयुक्त अक्षर
सदा साथ-साथ हैं
लेकिन भाषा में
संयुक्त अक्षरों…
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अचार की कामना
अचार की अनेक किस्में थीं
लेकिन आम और नींबू के अचार
ज्यादा चलन में थे
हालाँकि आम का अचार अधिक आम था
माँ गर्मियों में
घर पर अचार तैयार करती
आम खरीदने,धोने,काटने,सुखाने से लेकर
बड़ी एतिहात से तेल और मसालों का मिश्रण बनाती
बीच-बीच में धूप के दर्शन कराती
तब कहीं जाकर बड़ी मेहनत-लगन से अचार बनता
हम बच्चे दोपहर के भोजन में
सब्जी कम,अचार ज्यादा लेकर स्कूल जाते
पिताजी जब खेत पर जाते
कभी गुड़-शक्कर,कभी प्याज-मिर्च
और कभी अचार ही अकेला उनके साथ खेतों पर जाता
अतिथियों का आगमन कभी भी हो जाता
मेहमान के भोजन में
घी-दूध,बूरा-शक्कर,दाल-आलू के साथ अचार भी होता
मेहमान के सुबह के नाश्ते में
पराठे के संग अचार ही प्रेम पूर्वक उपस्थित होता
जब कभी यात्रा पर कहीं निकलना होता
और ज्यादातर सब्जियां
साथ जाने से इनकार कर देती थीं
तब अचार बिना किसी नाज-नखरे और ना-नुकुर के
यात्रा में साथ चल पड़ता
घर में जब भी
कोई तीज-त्योहार और उत्साह-उत्सव होता
तमाम तरह के पकवान सज-धजकर खड़े हो जाते
हर कोई उन्हीं को मान-सम्मान देता
उन्हीं की तारीफ़-प्रशंसा में पढ़े जाते कसीदे
कभी-कभी लोगों में परस्पर कहा-सुनी भी हो जाती थी
कोई लड़ाका दूसरे को कहता-
तेरा अचार बना दूँगा
कोई नहीं कहता-
तेरा खीर या हलुवा बना दूँगा
और न ही कहता कि तेरी सब्जी बना दूँगा
अचार ने फल,सब्जी,मिठाइयों को देखकर
कभी कोई ईर्ष्या-जलन नहीं की
और न ही किसी को मारा-दुत्कारा
अचार एक कोने में खड़ा
सब देखता-सुनता खामोश रहता
और मन ही मन दुआ-प्रार्थना करता
कि हर घर में बना रहे अचार का अस्तित्व
उसकी यही चिर कामना होती
कि जीवन में चाहे कितने भी सुख-दुःख आयें
बस उसके रहते हुए
किसी घर से कोई,बिन भोजन न जाये।
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