मई दिवस की 140 वीं वर्षगांठ पर विशेष
कॉरपोरेट राज और संघी मनुवादी फासीवाद के खिलाफ उत्तर भारत के मजदूर आंदोलन ने ली अंगड़ाई
तुहिन
दुनिया के तमाम मेहनतकश 2026 के 1 मई को मई दिवस की 140 वीं वर्षगांठ के रूप में मना रहे हैं, क्योंकि 1 मई, 1886 को ही शिकागो के मजदूरों ने आठ घंटे के कार्य दिवस के लिए ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत की थी, जो कि अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के वीरतापूर्ण संघर्षों का स्मृति दिवस बन गया। 1886 के शिकागो के हे मार्केट के जनसंहार और बाद में मजदूरों पर हुए भीषण अत्याचार के साथ एकजुटता में, वह समाजवादी संगठनों और ट्रेड यूनियनों का अंतर्राष्ट्रीय संघ ही था जिसने 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाना शुरू किया था। अक्टूबर क्रांति और सोवियत संघ की स्थापना के बाद तीसरे कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय (कॉमिन्टर्न) के गठन ने पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ “दुनिया के मजदूरों और उत्पीड़ित जनता एक हो ” के ओजस्वी आह्वान के साथ 1 मई के क्रांतिकारी उत्सव को दुनिया भर में मजबूती प्रदान किया।
पिछले वर्षों में, विशेष रूप से 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के दौरान समाजवाद के आगे बढ़ने और साम्राज्यवादी और नव उपनिवेश आश्रित देशों में भी मेहनतकश वर्ग के आंदोलन की प्रगति के कारण, 8 घंटे का कार्य दिवस बुर्जुआ शासनों द्वारा भी स्वीकृत मानदंड बन गया, और मेहनतकश कई लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त करने में सक्षम हुए। हालाँकि, 1970 के दशक के बाद से साम्राज्यवादी संकट की शुरुआत के साथ पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा कल्याणकारी राज्य का परित्याग किया जाना और अंतर्राष्ट्रीय वामपंथ द्वारा झेले गए वैचारिक-राजनीतिक झटकों का फायदा उठाते हुए, नवउदारवाद के आगमन ने श्रम के साथ प्रकृति को लूटने के लिए कॉर्पोरेट पूंजी को निरंकुश स्वतंत्रता प्रदान की।
नतीजतन, मेहनतकश वर्ग के द्वारा बीते सालों के संघर्षों के जरिए मेहनत से अर्जित किए गए सभी लोकतांत्रिक अधिकारों को छीना जा रहा है। ऐसे समय में जब तेज गति की तकनीकी प्रगति ने श्रम की उत्पादकता में कई गुना वृद्धि की है, काम के समय को कम करने और मेहनतकशों की वास्तविक मजदूरी में वृद्धि करने के बजाय, कॉरपोरेट पूंजी की मुनाफा की दर आसमान छू रही है ।
मेहनतकशों पर अत्यधिक शोषण और श्रम के एक नए अंतरराष्ट्रीय विभाजन और श्रमशक्ति की वैश्विक लूट का सहारा लेते हुए सबसे बड़े अतिरिक्त-मूल्य / बेशी मूल्य निचोड़ने के जरिए कॉरपोरेट दैत्य अपने धन संपदा को अब तक के अनजान स्तर तक बढ़ा चुके हैं। श्रमिकों के श्रम-समय में वृद्धि, लाखों मेहनतकशों को बेरोज़गारी और अल्प-रोज़गार की ओर ले जाना और पूरी दुनिया को “बेरोजगारी की बंजर भूमि” में बदलने में कॉरपोरेट पूंजी ने महारत हासिल कर ली है।
इस मोड़ पर, सबसे प्रतिक्रियावादी कॉरपोरेट पूंजी की सेवा करने वाले दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने फासीवादी संगठन धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मार्गदर्शन में नव-फासीवादी मोदी शासन और उसकी पिछलग्गू भाजपा की राज्य सरकारें भारतीय मेहनतकश वर्ग का सबसे बड़ा दुश्मन बन गईं है। इन मेहनतकशों में से अधिकांश अनौपचारिक या असंगठित हैं, जो अपनी श्रम शक्ति को सबसे सस्ती मजदूरी पर बेचने के लिए अभिशप्त हैं ।
नव फासीवादी मोदी सरकार द्वारा प्रचलित 44 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं ( लेबर कोड) – मजदूरी पर संहिता, औद्योगिक संबंधों पर संहिता, सामाजिक सुरक्षा पर संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों पर संहिता में बदलने के जरिए, मोदी सरकार ने उसके आका वैश्विक कॉरपोरेट पूंजी और उनके कनिष्ठ भारतीय साझेदारों के इशारे पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष- विश्वबैंक गठजोड़ और साम्राज्यवादी नीतिनिर्धारकों/ विचारकों द्वारा थोपे गए ” आसानी से व्यापार करें” ( पढ़ें – कैसे आसानी से भारतीय मेहनतकशों को लूटें) फरमान का असली उद्देश्य भारतीय मेहनतकशों को 21 वीं सदी के बंधुआ/गुलाम मजदूरों में बदलना है जो आकस्मिक और अनुबंध/ ठेका प्रथा के आधार पर काम करने के लिए बिना किसी मानवाधिकार के मजबूर हों।
स्थायी रोजगार, पेंशन प्रणाली, समान काम के लिए समान वेतन, लैंगिक अनुकूल काम करने की स्थिति आदि जैसे मेहनतकश वर्ग के लंबे समय से पोषित लक्ष्य एक मिथक बन गए हैं। यहां तक कि बहुप्रचारित रोजगार गारंटी योजना के आवंटन को नवीनतम बजट में बहुत कम कर दिया गया है, ऐसे समय में जब भारत , इतिहास में दर्ज सबसे बड़ी बेरोजगारी से गुजर रहा है।
नव उदारवादी-निगमीकरण के हिस्से के रूप में, मोदी सरकार, खुद को एक कॉरपोरेट-सुविधाकर्ता( दलाल) के रूप में बदलने के बाद, पहले ही सभी बुनियादी ढांचे, औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों से हट चुकी है और सार्वजनिक निजी साझेदारी( पीपीपी) के आधार पर सब कुछ सबसे भ्रष्ट कॉरपोरेट अरबपतियों को सौंप चुकी है।
फिलहाल मई दिवस के 140 वें वर्षगांठ के अवसर पर भगवा फासिस्ट – कॉरपोरेट गठबंधन के खिलाफ दिल्ली,उत्तर प्रदेश ,हरियाणा ,उत्तराखंड ,राजस्थान जैसे राज्यों में जहां डबल इंजन भाजपा सरकारों का शासन है, ताकतवर मजदूर आंदोलन ने अंगड़ाई ली है।नोएडा ,गुड़गांव, मानेसर ,फरीदाबाद,भिवाड़ी , सोनीपत,पानीपत जैसे शहरों में लाखों मजदूर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।
भाजपा की फासिस्ट गरीब मेहनतकश विरोधी सरकारों ने इस ताकतवर मजदूर आंदोलन का दमन करने के लिए 400 से अधिक मजदूरों और मजदूर आंदोलन के समर्थक बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों की मनमाना तरीके से गिरफ्तार कर , उन्हें जेल भेजा है।मजदूर आंदोलन का बर्बर दमन करने के साथ साथ अब उन पर रासुका लगाने की पुलिस प्रशासन द्वारा घोषणा की गई है।
मजदूर आंदोलन के दमन के लिए नोएडा पुलिस ने लखनऊ में प्रगतिशील प्रकाशन संस्थान जन चेतना के कार्यालय में छापा मारा। सुप्रसिद्ध कवयित्री एवं लेखिका कात्यायनी तथा सुप्रसिद्ध पत्रकार व लेखक सत्यम वर्मा को हिरासत में लेकर लंबे समय तक पूछताछ की गई। जन चेतना प्रकाशन के कार्यालय में बिना वारंट के लैपटॉप, पेन ड्राइव और जरूरी कागजात उत्तर प्रदेश पुलिस उठा ले गई। सत्यम वर्मा को पुलिस द्वारा दो दिनों तक अज्ञात जगह पर रखने के बाद अदालत में पेश किया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया।
सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता आदित्य आनंद को मजदूर आंदोलन को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया । दिशा छात्र संगठन के सदस्य आकृति,सृष्टि और मनीषा को नोएडा के बोटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से पुलिस ने गैरकानूनी रूप से अगवा कर लिया। इसी तरह दिशा छात्र संगठन के कार्यकता हिमांशु ठाकुर को भी शालीमार बाग के उनके निवास से पुलिस ने अगवा कर लिया।मजदूर आंदोलन के सहयोगी रूपेश राय, इंकलाबी मजदूर केंद्र के साथीगण श्यामवीर, हरीश, राजू, अजीत, पिंटू और आकाश को भी दमन का शिकार बनाते हुए पुलिस ने गैरकानूनी रूप से गिरफ्तार किया है।
उत्तर प्रदेश पुलिस आतंक का साम्राज्य कायम करने के जरिए मजदूर आंदोलन के इस झंझावात को रोकने की असफल कोशिश कर रही है। तथ्य साफ बताते हैं कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने ही मजदूर आंदोलन में तोड़फोड़ और हिंसा भड़काने का काम किया है। और इसी झूठे आरोप में वह मजदूर आंदोलन का निर्मम दमन कर रही है।
देश के विभिन्न मजदूर संगठन ,प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतें और मानवाधिकार संगठन ,फासिस्ट संघ परिवार के मार्गदर्शन में संचालित भाजपा सरकार से क्रूर दमनकारी नीतियों पर रोक लगाने, मोदी सरकार द्वारा अडानी – अंबानी सरीखे महाभ्रष्ट कॉरपोरेट घरानों की जा रही गुलामी को खत्म करने ,कॉरपोरेट परस्त चार लेबर कोड को निरस्त करने, मजदूरों पर हो रहे क्रूर दमन नीति पर रोक, 9 और 1314 अप्रैल की हिंसा की न्यायिक जांच,दोषी प्रबंधकों और अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज हो, मजदूरों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों पर लगाए तमाम फर्जी आपराधिक मुकदमों की वापसी, तमाम मजदूर नेताओं, बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों की शीघ्र रिहाई , स्थाई काम पर स्थाई नियुक्ति, ठेका प्रथा समाप्त करने और मासिक न्यूनतम वेतन 35000 से 40000 रूपये सहित तमाम श्रम अधिकारों को बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
फासीवादी संगठन आरएसएस के मार्गदर्शन में मोदी सरकार और उनकी पिछलग्गू डबल इंजन भाजपा की राज्य सरकारों ने देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए मेहनतकश वर्ग को तबाह कर दिया है। मोदी सरकार ने सैकड़ों वर्षों के संघर्षों से हासिल अधिकारों को एक झटके में 4 लेबर कोड लाकर खत्म कर दिया है। काम के घंटे बढ़ा दिए गए, फ्लोर लेवल वेज लाकर न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को छीन लिया गया और फिक्सड टर्म इम्प्लाइमेंट के द्वारा मजदूरों की हासिल न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा भी समाप्त कर दी गई।
स्थाई कामों में बेहद कम मजदूरी पर पूरी जिंदगी काम कराया जा रहा है। हायर और फायर (काम कराओ निकाल बाहर करो) की नीति के तहत मनमानी छंटनी कर दी जाती है। हालत इतनी बुरी है कि मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश तक नहीं दिया जा रहा है। बढ़ती भीषण महंगाई और वैश्विक संकट के कारण रोजगार के खत्म होने से मजदूरों में गहरी निराश एवं बेचैनी पैदा हुई है। असमानता लगातार बढ़ रही है और ज्यादतर मजदूर 10000 रूपए मासिक वेतन से कम पर अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए मजबूर हुए हैं। इन परिस्थितियों में न्यूनतम वेतन कम से कम 20000 रुपए करने की मांग पर मजदूर अपना प्रतिवाद दर्ज कर रहे हैं और नोएडा ,फरीदाबाद,मानेसर,सोनीपत सहित देश के कई जगहों में हो रहे ताकतवर मजदूर आंदोलन भी इसी की एक कड़ी है।
मजदूरों से संवाद करने और उनके संवैधानिक सवालों का लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण समाधान करने की जगह भाजपा सरकार दमन का रास्ता अपना रही है। मजदूरों के अधिकारों के संरक्षण के लिए ट्रेड यूनियन बनाने के संवैधानिक अधिकार और लेबर विभाग की भूमिका को बेहद कमजोर कर दिया गया है। यह लोकतांत्रिक प्रणाली और संवैधानिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है। इस पर हर हाल में रोक लगनी चाहिए।
नोएडा में मजदूरों का आंदोलन होने के बाद से गोदी मीडिया चैनल योगी आदित्यनाथ का गुणगान गाने में लगे हुए हैं कि उन्होंने एक झटके में 21% वेतन वृद्धि कर दी। सुनने में ये वृद्धि ठीक ही लगेगी लेकिन असलियत बहुत क्रूर है। इसे वास्तविक सैलरी के आंकड़ों से समझते हैं। नोएडा-गाजियाबाद में अकुशल मजदूरी 11,313 ₹ से बढ़ाकर 13,690 ₹, अर्धकुशल 12,745 ₹ से 15,059 ₹ और कुशल 13,940 ₹ से 16,868 ₹ कर दी गई। इसी वेतन वृद्धि का ढिंढोरा पीटकर योगी जी का गुणगान किया जा रहा है।
इन सब में सोचने वाली बात ये है कि वृद्धि से पहले अकुशल मजदूरों को सिर्फ 11,313 रूपये का वेतन दिया जा रहा था जो आज के समाज में जीने लायक भी नहीं और ये बात योगी जी को भी पता ही होगी। यानी उनकी मजदूरों के इस अथाह शोषण में सहमति थी।दूसरी बात ये कि अगर मजदूरों का ये आंदोलन नहीं हुआ होता तो क्या वेतन वृद्धि होती? नहीं, बिल्कुल नहीं। यानी योगी जी की दयालुता नहीं बल्कि ये वृद्धि मजदूरों के आंदोलनों के दबाव में ही कि गयी है। यह मज़दूरों कि एक छोटी सी जीत है। तीसरी बात ये कि जिस वृद्धि की वाहवाही की जा रही है उसका हाल भी देखिए। वृद्धि के बाद भी कुशल मजदूर को सिर्फ 16,868 रुपए मिलेंगे। आज की मंहगाई के हालात में ये रुपए कितने कम हैं, इसे हर मेहनतकश जानता है। और इस पर भी वो सरकारें जो अपनी अय्याशियों और विधायकों की खरीद-फरोख्त में अरबों रुपए खर्च कर देती हैं, अपनी छाती पीट रही हैं।
जिस वृद्धि पर शर्म आनी चाहिए उसका ढोल पीटा जा रहा है। सच तो ये है कि ये ढोल फटा हुआ है। और तो और कॉरपोरेट घरानों की गोदी मीडिया भाजपा की हां में हां मिलाकर बदतर हाल में जी रहे मजदूरों के आक्रोश का लिंक पाकिस्तान और नक्सली आंदोलन से ढूंढ रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे संघ भाजपा दिल्ली के ऐतिहासिक किसान आंदोलन का लिंक खालिस्तानी आतंकवाद से जोड़ती आई है।CAA NRC के खिलाफ देश भर में हुए शाहीन बाग आंदोलन को भी फासिस्ट संघ परिवार अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र बताती आई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 22 अप्रैल को लखनऊ में एक उच्च स्तरीय बैठक में कहा है कि ” एक मई को मजदूर दिवस के पहले मजदूरों में अशांति की संभावना है और ऐसे दुर्भावनापूर्ण प्रयासों को विफल किया जाएगा।” अब योगी जी को कौन समझाए कि हरियाणा सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के न्यूनतम वेतन में वृद्धि किए जाने के बाद ही उत्तर प्रदेश में योगी जी के राम राज्य में नोएडा सहित अन्य जगहों पर अमानवीय परिस्थिति में जीवन बिता रहे मजदूरों ने बेहतरी के लिए आवाज बुलंद की।
जाहिर है कि मजदूरों को सम्मानजनक वेतनमान और जीवन स्तर प्रदान करने की जगह हिंदूराष्ट्र की प्रयोगशाला उत्तर प्रदेश की संघी मनुवादी फासीवादी योगी सरकार कॉरपोरेट घरानों के तलवे चाटने का काम ही करेगी।असल में संघ -भाजपा की भूमिका कॉरपोरेट घरानों के लठैत के रूप में है।
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश में जो लाखों मेहनतकश इस आदमखोर कॉरपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश में एकजुट आवाज बुलंद कर रहे हैं।और ये किसान- मजदूर ही फासिस्ट संघ परिवार- कॉरपोरेट राज की कब्र खोदेंगे। इस ताकतवर मजदूर आंदोलन ने भागवत- मोदी- शाह के अमृतकाल और हिंदूराष्ट्र परियोजना को बेनकाब कर दिया है। ये ताकतवर मजदूर आंदोलन,शाहीन बाग आंदोलन और दिल्ली की सीमा में हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन की कड़ी में भगवा फासिस्ट कॉरपोरेट राज के खिलाफ तीसरा ऐतिहासिक विद्रोह है।
इस ऐतिहासिक मजदूर आंदोलन के समर्थन में बड़ी संख्या में कलाकार, साहित्यकार और नामचीन नागरिक सामने आ रहे हैं और गिरफ्तार मजदूर नेताओं,विद्यार्थियों व बुद्धिजीवियों की रिहाई की मांग जोर पकड़ रही है। 300 से अधिक कलाकारों और बुद्धिजीवियों – जिनमें संगीतकार और लेखक टी.एम. कृष्णा, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, उपन्यासकार गीता हरिहरन, लेखक शमशुल इस्लाम,नाटककार नीलिमा,कवि रंजीत वर्मा,फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन जैसे लोग शामिल हैं – ने हाल ही में दिल्ली-एनसीआर में हुए औद्योगिक श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा कि काम करने और रहने की असहनीय स्थितियों के ख़िलाफ़ विरोध करना इस देश के किसी भी नागरिक का अधिकार है. यह अधिकार भारत के संविधान द्वारा दिया गया है।
अगर भाजपा की धुर दक्षिणपंथी गरीब मेहनतकश विरोधी तमाम डबल इंजन सरकारें मजदूरों की जायज मांग को दमन चक्र में पिस रही हैं तो छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार क्यों पीछे रहती? उसने भी गरीब मेहनतकश वर्ग को कॉरपोरेट घरानों के पैरों तले दबाने के लिए बहती गंगा में अपने हाथ धो लिए।ठीक मई दिवस के पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने मार्गदर्शक मोदी सरकार की 4 लेबर कोड की तर्ज पर नई औद्योगिक संबंध संहिता का प्रारूप जारी कर दिया है। अब पुराने श्रम कानून होंगे खत्म। हड़ताल प्रदर्शन की जगह श्रम विवादों के निपटारे के लिए शिकायत निवारण समिति बनाए जाने,पहले के कानून के विपरीत 100 की जगह 300 मजदूरों वाले कंपनियों को छंटनी या तालाबंदी करने के पहले सरकार से अनुमति और विवादों के डिजिटल निपटारा पर जोर दिया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार की प्रस्तावित श्रम संहिता असंगठित ,अनियमित कर्मचारियों,श्रमिकों के हितों पर हमला है कहकर राज्य की ट्रेड यूनियनों ने इसका कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया है।
आज मेहनतकशों के वर्ग हितों के खिलाफ, भारतीय मजदूर वर्ग और उत्पीड़ित जनता की आजीविका और अस्तित्व के खिलाफ इस सबसे बड़े-दक्षिणपंथी, कॉरपोरेट-समर्थक हमले का विरोध करने और उसे हराने के रणनीतिक कार्य के साथ-साथ, इतिहास में सबसे बड़े और सबसे पुराने फासीवादी संगठन, आरएसएस द्वारा थोपे गए सबसे प्रतिक्रियावादी फासीवाद को उखाड़ फेंकना एक तत्कालिक अति आवश्यक कार्य एक चुनौती के रूप में मुंह बांए खड़ा है। श्रम और प्रकृति पर अब तक के सबसे बड़े कॉरपोरेट हमले समेत सभी रूपों में नवउदारवादी-निगमीकरण से दृढ़ता से लड़ते हुए, न केवल मेहनतकशों बल्कि मानवता और पूरे पृथ्वी ग्रह के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई बहुत जरूरी है। इसके लिए भारत के मेहनतकश वर्ग को तमाम उत्पीड़ित और जनवादी ताकतों के साथ तमाम समान विचारधारा वाली ताकतों के साथ एकजुट होकर व्यापक संभव आरएसएस फासीवाद-विरोधी जन मोर्चे के निर्माण की पहल करके मनुवादी/ ब्राम्हणवादी-फासीवादी शासन को उखाड़ फेंकने के तत्काल कार्य को मुकम्मल बनाना वक्त की पुकार है ।
इसलिए, जब हम इस महत्वपूर्ण मोड़ पर मई दिवस मनाते हैं, जब आरएसएस अपने वैचारिक आधार के रूप में सबसे अमानवीय ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था के साथ, राज्य की सत्ता और सड़क की ताकत दोनों को नियंत्रित करते हुए, हर वृहद और सूक्ष्म स्थान पर अपनी पैठ बना कर हिंदुराष्ट्र परियोजना निर्माण करने के लिए भारत की जनता का गला घोंट रही है, तो इस भयावह स्थिति के खिलाफ अपने सभी विकल्पों का उपयोग करते हुए उठ खड़े होना भारत के मेहनतकश वर्ग का अनिवार्य कार्य है।
शिकागो के ऐतिहासिक मई दिवस के महान शहीदों पारसन,फिशर,स्पाइस और एंगेल्स सहित दुनिया भर के लाखों मेहनतकशों के खून से रंगा लाल झंडा और 140 वा मई दिवस , भारत के मेहनतकशों के लिए यही पुकार लगा रहा है।
(लेखक क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच RCF और जाति उन्मूलन आंदोलन CAM के अखिल भारतीय संयोजक हैं)
