दयाल जास्ट की कविता – अंबेडकर साब

कविता

अंबेडकर साब

दयाल जास्ट

 

अंबेडकर साब

जब तुम पैदा हुए

उस वक्त तुम ही पैदा नहीं हुए

बल्कि तुम्हारे साथ जन्म लिया

क्रांतिकारी विचारों ने भी।

 

तुम्हारे पैदा होते ही

जुल्म की बेडियाँ कड़ाक-2 टूटी

साढा हक एथे रख की मूल भावना प्रकट हुई

मजदूर,किसान,महिला को जीना आ गया।

मिस्टर अंबेडकर

क्या तुम आज भी हो

और उसी तरह कर रहे हो अपना काम

क्या ये देश हम भारत के लोगों का है

या अधूरी है लोकतंत्र की संकल्पना।

 

मिस्टर अंबेडकर

क्या आपके सपनों का भारत बन गया

जो तुम आराम से बैठ गए

क्या ये अन्याय नहीं है

अपनों द्वारा अपनों के साथ।