शंभुनाथ की कविता – हाथ

कविता

हाथ

शंभुनाथ

 

हाथ

कंधे पर रखा मनुष्य का विश्वास है

जब जुड़ते हैं

प्रार्थना बन जाते हैं और

जब लहरते हैं

प्रतिवाद बन छा जाते हैं

जब थाम लेते हैं किसी गिरते हुए को

बन जाते हैं मनुष्यता का चिह्न

 

हाथ ने

पत्थरों में देवता रचे

कागजों पर सपने बोए और

सभ्यता की हर ईंट पर

अपने हस्ताक्षर छोड़े

हाथ ही जब खेत में

बीज की तरह उतरे

मिट्टी में आई मुस्कराहट

हाथों ने

आसमान में जितने सितारे हैं

उनसे अधिक रोटियां बेली हैं

जब शब्द नहीं थे

हाथ थे

 

हाथों का इतिहास सांस लेता है

पिरामिड की ऊंचाइयों में

सिंधु घाटी की गलियों और

ताज की संगमरमरी कोमलता में

हाथों ने रचे अक्षर

हाथों ने रचे पहिये

लोहा पिघलाया

बनाए पुल

हाथ ही समुद्री यात्राओं पर ले गए

पगडंडियां बन गईं हाई वे

हाथ है तो इतिहास है

अपने हाथों को

अब हम देख नहीं पाते

जबकि वे हैं हमारे सबसे करीब

सभ्यता जितनी रौशन होती गई

हाथ छिपते गए समय की धूल में

हाथ कलम से लिखना तक भूल गए

’हाय’ के अभिवादन में

नहीं है अब कोई जगह हाथ के लिए

तालियों की गड़गड़ाहट भी

निकलती है अब मशीन से

 

हाथों की तनी मुट्ठियां अब ढीली हैं

नहीं हैं हाथ अब प्रतीकों की दुनिया में भी

नहीं हैं नृत्य में वे मुद्राएं

नहीं है अब यह वैदिक कथन भी–

अपना हाथ जगन्नाथ!

आ गए हैं अन्य लोक से कृत्रिम आदमी

लिए अपनी असीम माया

हाथ

अपने ही बनाए संसार में

बनते जा रहे हैं दर्शक

 

फिर भी जब हम छूते हैं

पौधों पर खिले फूल को

नदियों में बहते जल को

प्रेम में पकड़ते हैं किसी का हाथ

अलगनी से उतारते हैं

पसारे हुए सूखे कपड़े

ट्रेन पर चढ़ते समय

हिलाते हैं हाथ

या जब पढ़ते समय पलटते हैं पन्ने

लगता है हाथ हैं।

 

दुनिया भर के हाथ हैं

अंधेरे के अनगिनत सूरज!

 

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