मंजुल भारद्वाज की कविता – घर

कविता

घर

मंजुल भारद्वाज

 

घर मेरे अस्तित्व के सांसारिक

पहलू का आयाम है

सृजन की वैचारिक प्रतिबद्धता के

अर्थ उपार्जन का सबब है

घर मात्र सर्दी,गर्मी,बरसात से

सर छुपाने की वास्तु भर नहीं है

आपकी कल्पनाओं का आकार है

सपनों के साकार संघर्ष में रोज़

गंतव्य और प्रस्थान बिंदु है घर

रसोई की महकती सुगंध

स्वाद और खड़कते बर्तनों का साज़ है

लड़ते झगड़ते पलों में स्वर अभ्यास

गुस्से में मौन साधना का शांति स्थल

और विपदा में सम्बल का

शक्ति स्थल है घर

गूंजती किलकारियों

खेल खेल में टूटते

झूमर,खिड़की,रोशनदान

दीवारों पर नन्हें चित्रकारों की

आर्ट गैलरी है घर

माता पिता की सेवा साधना का

आशीर्वाद है घर

जीवन मर्म के प्रश्नों को

सुलझाने वाली तपो भूमि

प्रेम के लम्हों को जीते हुए

यादों की दास्ताँ पढ़ता हुआ

जीवन संग्रहालय है घर!

….

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