कविता
उठता ज्वालामुखी
धर्मेंद्र आजाद
सुबह की धुंध में लिपटा मज़दूर,
अधूरी नींद आँखों में लिए,
दिन भर अपना जिस्म गलाता—
फिर भी खाली हाथ जिए।
चूल्हा ठंडा, रसोई सूनी,
गैस जैसे कोसों दूर,
महँगाई की धधकती आग में
भूखे सोने को मजबूर।
सवाल अब सड़कों पर उतरे,
नारों में धड़कन बोल रही—
तनी हुई मुट्ठियों की गूँज
चुप्पी की जंजीरें खोल रही।
हक़ की बात करो तो कहते—
“ये साज़िश है, ग़द्दारी है!”
पर इतिहास के पन्ने चीखें—
ये चाल उनकी पुरानी है।
डंडे, जेल और दमन का पहिया—
यही उनका हथियार है,
जो लूट रहे मेहनत की दुनिया—
उन्हीं की पहरेदारी है।
अब मज़दूर ने भी ठान लिया—
बहुत हुआ, अब बहुत हुआ,
झुकने की भी हद होती है—
अब आवाज़ उठानी है।
तीस हज़ार न्यूनतम मज़दूरी—
ये मज़दूर की हुंकार है।
आठ घंटे से ज़्यादा नहीं—
ये पीढ़ियों का अधिकार है।
ओवरटाइम का दुगुना हक़—
हर बूंद पसीने का मान है,
ठेका-प्रथा की जड़ें उखाड़ो—
स्थायी रोज़गार ही सम्मान है।
जब मिलेंगे कारख़ाने और सड़कें,
जब गाँव शहर से हाथ मिलाएँ,
तो सत्ता की जमी बुनियादें
ख़ुद-ब-ख़ुद दरकती जाएँ।
उठो साथियों, कदम मिलाओ,
ये वक़्त नहीं झुक जाने का—
देशभर के मज़दूरों, एक हो—
ये वक़्त है इतिहास बनाने का।
