राजकुमार कुम्भज की चार कविताऍं
1.
एक अंधा आदमी
वक़्त ऐसा भी आता है जीवन में
जब खोने को कुछ भी होता नहीं है पास
न रिश्ते,न संगति,न प्रार्थना,न पैसा
वक़्त तो पहले ही खो चुका होता हूं मैं
अभी जिसमें चल रहा हूँ कि जल रहा हूँ
जानता ही नहीं हूँ कुछ भी कि ये है क्या
अनजान नहीं हूँ,लेकिन जो हो रहा है
वह सब पहले कभी देखा-सुना नहीं
ये जो हो रहा है चलने और जलने जैसा
कोई ख़ास वज़ह नहीं है नज़र इसकी
एक बस्ती है और बड़ी भीड़ है सड़कों पर
यातायात की अराजकता में फॅंसी हुई
जिसे संभालने की ज़िम्मेदारी के स्वाँग में
बहुत बड़ा होता जा रहा है यहीं-कहीं
एक अंधा आदमी.
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2.
एक अलग-सी आग
अजीब-सी अकुलाहट
और एक अलग-सी आग है भीतर
जो न तो ख़त्म होती है कभी,कहीं
और न कहीं भस्म ही करती है मुझे
सुलगती रहती है,धधकती रहती है
जानता हूँ कि एक दिन आएगी ऑंधी
और सब कुछ उड़ा ले जाएगी अपने साथ
ऑंखें होते हुए भी देख नहीं पाऊॅंगा मैं
इस लौ का बुझना,जो अकुलाहट भरी
धधकती रही है निरंतर,निरंकुश अभी
मेरे ख़ुद के भीतर.
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3.
क़माल यही था
कल जब मेरा वक़्त था
तो सचमुच मेरे पास वक़्त नहीं था
और आज जब मेरे पास वक़्त है
तो सचमुच मेरा वक़्त नहीं है
कल मैं अंधा था,
घर में दर्पण था
आज मैं अंधा नहीं हूँ,
घर में दर्पण नहीं है
एक मुसीबत था,
एक ज़रूरत है
मुसीबत और ज़रूरत में
बेहद ही महीन-सा फ़र्क था
मैं था,वक़्त था,दर्पण था.
क़माल यही था.
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4
फूल खिलते हैं
फूल खिलते हैं,खिलते रहेंगे
पेट पत्थरों का चीरकर भी खिलेंगे
सदियों-सदियों तक चलता रहेगा
कमोबेश ये सिलसिला यूँ ही-यूँ ही
यहीं-कहीं नाचती-गाती मिलती हैं
नन्हीं-नन्हीं टुकड़ियाँ देवताओं की
जिन्हें,भिन्न-भिन्न रॅंगों से रचते हैं बच्चे
संसार भर में ख़ुशबू बिखेरते हुए
खेलते-खेलते,कभी कुछ रखते हैं याद
भूल जाते हैं कभी-कुछ.
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