हंसा दीप की कहानी- घुँघराले बोल

कहानी

घुँघराले बोल

हंसा दीप

गैरी, गैर ही था। नाम से ही पराया लगता था। अपनी किशोर बेटी के साथ आया था। वह सिर्फ दुभाषिया के तौर पर आयी थी। उसने बताया था कि पहले दिन काम समझने के लिए साथ रहेगी और आखिरी दिन काम कैसा हुआ, यह जानने के बाद पैमेंट लेने के लिए वह साथ आएगी।

उसे दो भाषाओं का ज्ञान तो था, लेकिन उम्र अभी इतनी नहीं हुई थी कि वह बड़ों को साफ-साफ समझा सके। उसे इस बात का गर्व जरूर था कि वह अपने पिता की मदद कर रही है। घुँघराले बालों के साथ उसके बोल भी घुमावदार थे।

अपनी हाँ और ना को वह घुमा-फिरा कर कुछ इस तरह कहती कि सुनने वाले को समझ ही न आता कि जवाब आखिर था क्या! एक सिरे से दूसरे तक पहुँचने में न जाने कितने मोड़। और उसी के साथ उसकी मासूम-सी मुस्कान। अपने पिता से हूबहू मिलती-जुलती। पिता से पुत्री तक। मानो एक चेहरे से उतरकर दूसरे चेहरे पर आ गई हो।

अबोध उम्र में जिम्मेदारी से भरा काम। जरा भी शब्द डगमगाए, या कहीं इधर से उधर हुए तो नुकसान दोनों का हो सकता था- काम देने वाले का भी और करने वाले का भी। वाद-विवाद की नौबत आ सकती थी और असंतोष हुआ तो मेहनताना भी मुश्किल में पड़ सकता था। लेकिन इस बात का डर न तो पिता गैरी को था, न ही बिटिया को। उन दोनों का आत्मविश्वास मुझे विश्वास देता रहा कि मेरी बात सही ढंग से गैरी तक पहुँच रही है।

टोरंटो में टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने में किसी को कोई झिझक नहीं होती मगर कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें “थैंक-यू” के अलावा और कुछ और कहना नहीं आता। न ही उन्हें जरूरत महसूस होती। गैरी भी उन्हीं में से एक था। एक कुशल कारीगर।

अपने काम में निपुण मगर अंग्रेजी भाषा में शून्य। उसे अंग्रेजी न आने का कोई मलाल नहीं था क्योंकि उसका काम बिना रुकावट के चल रहा था। धड़ल्ले से चल रहा था। मानो वह अपने हुनर से ये साबित करना चाहता हो कि बोलचाल की भाषा भले ही न आती हो पर मेहनत की जबान सब समझ लेते हैं।

गैरी और उसकी बेटी की मुस्कान ने मुझे कई सारे नए प्रतीकों और उपमाओं से रूबरू करवा दिया था। उस बच्ची की खनकती हँसी और बेहद मासूमियत ने जैसे अनुवाद करने की कला को एक नया रंग दे दिया। मैं खो जाती, शब्दों की मिठास और बालों की लटों में छुपे उसके अबोध चेहरे को देखती हुई।

उस बच्ची के बालों से मुझे एकाएक ईर्ष्या हो आई थी। मैं अपने सीधे-सादे बालों को घुँघराले करने के लिए बहुत प्रयास करती थी पर मजाल कि एक भी मुड़ कर घुँघराला आकार ले ले। सारे सीधे-सपाट। और वह! किसी से बात करते हुए भी अपने बालों को खींचती रहती ताकि वे सीधे रहें।

इस कदर जिद्दी बाल कि उसका हाथ हटते ही फिर से गोल-गोल घूम जाते। हर इंच पर एक सुंदर सा गोला। बालों की यह ज़िद ही नहीं, उसकी बातों की शैली भी कुछ वैसी ही थी, बिना किसी सीध या दिशा के। समझने के लिए एक सिरे से दूसरे तक पहुँचने में कई मोड़ आते। शब्दों को कोई ठोस सतह ही न मिल पाती।

लहराते, बल खाते बालों ने सुंदर रूप तो दिया ही था उसे, तिस पर उसका भोलापन, जबान का मीठापन! सोने पर सुहागा! बालों की लटें चेहरे पर अपना आधिपत्य जमाए रखतीं और उसी अंदाज़ में शब्दों की लटें मुखारबिंद से निसृत होतीं। जिन्हें समझने-समझाने में थोड़ा वक्त लग जाता।

जबान की मिठास में शब्द ऐसे घुलते कि अर्थ का सिरा कभी-कभी छूट जाता। न समझा पाने की हँसी उसके होंठों पर ऐसी बनी रहती कि मानो वही स्वीकार कर रही हो- “मैंने पूरी कोशिश की, पर शायद समझा नहीं पाई।” बड़ी चुनौती थी उस बच्ची के लिए, एक भाषा, से दूसरी भाषा तक सही अर्थ पहुँचाने की।

काम की तासीर समझने के लिए गैरी प्रतीक्षा करता, अपनी बेटी के शब्दों की। मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश में असफल ही होता। उसके चेहरे के भावों और होठों की गतिविधियों को मैं भी कहाँ समझ पाती! उससे बात करते हुए मुझे लगता मैं निरी अनपढ़ हूँ। बुद्धू, ठेठ। पीएचडी की डिग्री खिलखिलाने लगती।

बहुत कोफ्त होती, जब किसी को बोलते हुए बस देख सको, समझ न सको। और तब कोई सर्टिफिकेट गारंटी नहीं देता कि तुम पढ़े-लिखे हो। जब मैं क्यूबेक सिटी गई थी तब उस कॉफी शॉप के कैशियर को चम्मच शब्द नहीं समझा पाई थी।

उसे सिर्फ फ्रेंच आती थी, मुझे हिन्दी वाली अंग्रेजी। हालाँकि कोशिश करती तो चम्मच की एक्टिंग करके समझा सकती थी, पर नहीं कर पाई। सारी की सारी योग्यता धरी की धरी रह गई थी।

जब भी ऐसे मौके आते, मैं बहुत असहाय महसूस करती। उस क्षण मेरी प्रोफेसरी का गुब्बारा एकदम फुस्स हो जाता। एक बार नहीं, कई बार ऐसा हुआ था। अनपढ़ होने के तमगे मुझे मिलते रहे थे। हाँ, ऐसे मौकों पर मुझे ये जरूर लगता कि होशियारी और चतुराई के बजाय नासमझ और भोला बनकर जीने में फायदा ही फायदा है।

जैसे गैरी था। अपनी मुस्कान का धनी। भाषा की बड़ी रुकावट को उसने अपने काम के बीच नहीं आने दिया। मुस्कान की ढाल से अपने से दूर रखा था। मेरे और उसके बीच जो भी बात होती, कुछ पलों बाद समझ आती, जब बेटी अपने अनुवाद की कला से उसे मुझ तक पहुँचाती।

जब वह बताती कि गैरी ने क्या कहा- हँसी फूट पड़ती क्योंकि गैरी ने कुछ मजाक वाली बात कही थी। टाइमिंग, जब हँसना चाहिए तब नहीं। बाद में। ट्यूबलाइट को मात देती मेरी हँसी गैरी की आँखों से आँखें मिलाती। वह भी मुस्कुरा देता। उसकी चिर-परिचित मुस्कान मुझे भी संतोष देती। हमारे बीच संवाद का यही तरीका था।

कोरियन उसकी मातृभाषा थी। मेरी हिन्दी। मैं हिन्दीमय अंग्रेजी बोलती। उसकी बेटी कोरियनमय अंग्रेजी। वे दो-तीन साल पहले ही कोरिया से आए थे। इसीलिए बेटी को भी भाषा में पूरी परिपक्वता नहीं थी। गैरी को सिर्फ कोरियन भाषा आती थी।

हमारी पहली मुलाकात एक खास मकसद से हुई थी। मुझे अपने ऑफिस को नया लुक देना था। काँच का दरवाजा, काँच की खिड़कियाँ और कुछ ऐसे बदलाव जो मेरे कार्यालय को शाही रूप दे सकें।

अब मुश्किल यह थी कि मैं उसे कैसे समझाऊँ कि इस दीवार को तोड़कर वहाँ काँच का दरवाजा लगाना है। सारी व्यवस्था उसे करनी होगी। सामान लाना, फिटिंग करवाना। भीतर की चमकती दीवारों में बुक शेल्फ और शो केस भी लगवाने थे। काँच की पारदर्शिता और लकड़ी की गर्माहट के मेल से इस जगह को एक भव्य और आधुनिक रूप देना था।

मैंने कहा- “यह दीवार टूटेगी, काँच का चौड़ा दरवाजा लगेगा।” बेटी ने मेरा वाक्य गैरी तक पहुँचाया। गैरी ने अपने हाथों से कुछ नापा और थम्सअप किया। उसकी निगाहें गोल-गोल घूमतीं हर चीज का निरीक्षण कर रही थीं।

मैं कहती गई- यह शोकेस हटेगा, यहाँ बुकशेल्फ लगेगा- ये…, वो… बहुत कुछ। और उसकी बेटी दोहराती गई। गैरी सिर हिलाता रहा। सुनते समय उसकी मुस्कान गायब थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने दिमाग में पूरा खाका बना रहा हो।

बेटी को समझाने में मेरे पसीने छूट गए। डर था कि मेरे शब्दों का अर्थ उसके पिता तक पहुँचते-पहुँचते कहीं बदल न जाए। गैरी समझा या नहीं, यह तो काम पूरा होने के बाद ही पता चलेगा। इस तरह के जटिल काम को, वो भी भाषाई पेचीदगियों के बीच, एक बार में समझना कतई आसान नहीं था।

हमारा अनुबंध हो गया था। उसने सामान लाने के लिए एक भी पैसा एडवांस नहीं लिया। मैं हैरान रह गई। उसके इस इनकार ने मेरा विश्वास जीत लिया था। शायद मेरी सौहार्द्रता ने उसका मुझ पर विश्वास कायम रखा था। वरना आज के जमाने में कोई काम शुरू नहीं करता जब तक हाथों में हरे नोटों की गारंटी न हो।

मैंने उससे कहा था- “अंग्रेजी क्यों नहीं सीख लेते, गैरी?”

बेटी ने मेरा सवाल उस तक पहुँचाया तो उसने कुछ इस तरह सिर हिलाया जैसे कहा रहा हो- “मुझे जरूरत नहीं।” या – “मैं तो पुरानी दलदली जमीन हूँ, अब फसल की कोई उम्मीद नहीं।” या शायद- “मेरी बेटी तो है।”

उसके एक सिर हिलाने से मेरे मन में कई अलग-अलग अर्थ उभर कर आए, जो चाहो, वही समझ लो। भाषाई रुकावटों के बीच आँख, कान, हाथ, सारे अंग जैसे सक्रिय हो उठते मानो सबकी जिम्मदारी बन गई हो कि कहे गए शब्दों का मतलब किसी तरह दिमाग तक पहुँचा दिया जाए। गैरी के बिन बोले हुए बोल भी बहुत कुछ कह जाते थे। गोलमोल-बोल।

खैर, काम शुरू हो गया। वह कुछ कहे न कहे, पर “थैंक-यू” कहना कभी नहीं भूलता। आते-जाते मुस्कुरा कर कहकर जाता। ऐसा लगता, जैसे कोई कीमती शब्द मोती की तरह उसके मुँह से झर रहा हो।

दिन भर में उन मोतियों से एक माला सी बन जाती। पानी, चाय, कोक जो भी दो, वह झुककर थैंक-यू कहता। थैंक-यू ही थैंक-यू। जैसे झड़ी लग गई हो। पहली बार किसी के मुँह से इतना मीठा थैंक-यू सुना था। शायद अपने मन के हर भाव को वह उसी एक शब्द में पिरो देता होगा।

अधनिर्मित ऑफिस से ही मेरा काम तेजी से बढ़ने लगा था। इधर गैरी का काम खत्म होता गया और उधर मेरा काम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता रहा। आज काम का आखिरी दिन था। बस थोड़ा बहुत टचअप बचा था। मैंने उसका चेक बनाकर तैयार कर लिया था।

मैं दिनभर उसका इंतज़ार करती रही, लेकिन वह नहीं आया। आखिरकार मैंने उसकी बेटी को फोन लगाया। कोई जवाब नहीं मिला।

दिल में एक डर समा गया। कहीं कोई अनर्थ तो नहीं हो गया! कोई दुर्घटना! आशंकाओं के बीच मैं बार-बार फोन करती रही मगर हर बार वही सन्नाटा। निश्चित ही कोई इमिग्रेशन की समस्या आ खड़ी हुई होगी। यहाँ अगर कोई आदमी अचानक गायब होता है तो अक्सर इसका यही मतलब होता है कि उसे अचानक देश छोड़ना पड़ा।

पैसे देने की मेरी कुलबुलाहट निरंतर कचोट रही थी। अच्छा काम करने का मेहनताना देना ही था। गैरी की मेहनत के पैसों को मैं अपने पास कैसे रख सकती थी! लेकिन फोन पर कोई खबर नहीं थी। न जाने क्या हुआ होगा। उसका चेक लिफाफे में पड़ा उसका इंतजार कर रहा था। वह कहाँ था, कुछ पता नहीं चला।

चिंता इसलिए भी ज्यादा हो रही थी कि गैरी अब गैर नहीं रहा था, न जाने कैसे वह अपना बन गया था। अब तो उसकी बात करते हुए मैं “अपना गैरी” ही कहने लगी थी। वह नहीं आया। न ही उसकी बेटी ने फोन उठाया। न जाने क्या हुआ। अपने देश चला गया हो तो भी पैसे भेजने के लिए एक संदेश तो दे ही सकता था, लेकिन कहीं से कोई खबर नहीं आई।

उसके और उसके परिवार के साथ कोई न कोई अनहोनी जरूर हुई होगी। लोग यूँ ही अपना पैसा नहीं भूलते। किसी भी स्टोर में जाकर कार्ट लेने पर पच्चीस सेंट का सिक्का डालना पड़ता है। जब कभी वह सिक्का बाहर नहीं निकलता तो लोग कार्ट को तब तक खींचते रहते हैं जब तक वह वापस न मिल जाए।

फिर यह तो पाँच हजार डॉलर की बात थी। उस मेहनती इंसान की खून-पसीने की कमाई। समय गुजरते उस आउटडेटेड चेक का कोई अर्थ नहीं रह गया था। बस, वह मुझे यह याद दिलाता था कि गैरी के पैसे अभी भी मेरे पास हैं।

कुछ दिन तक मैं उसके लिए बहुत परेशान रही। ऐसा लगता रहा कि जब तक वह आकर अपने पैसे नहीं ले जाता, मुझे चैन नहीं मिलेगा। उसकी चिंता मुझे एक काँच की परछाई की तरह घेरे रहती। जैसे किसी पारदर्शी शीशे के भीतर एक कारीगर दरवाजा बना रहा हो और धीरे-धीरे खुद उसी काँच में तबदील हो जाए। और थोड़ी देर बाद, उसी काँच के भीतर से उसकी मुस्कान मुझे राहत देती।

कुछ इसी तरह मैं उसे याद करती रही। शायद ये मेरे अपने घुँघराले बोल थे, ऐसे जो सिर्फ गैरी से जुड़े थे। जिन्हें मेरे सिवा कोई और समझ भी नहीं सकता था। वैसे भी, हमारे बीच की मौन बातचीत को सुनने का न किसी के पास वक्त था, न ही कोई जरूरत।

जिस ऑफिस के काँच के दरवाजे और खिड़कियाँ मुझे निरंतर समृद्ध कर रहे थे, उन पर गाहे-बगाहे गैरी का चेहरा उभर आता। और जब भी किसी के घुँघराले बाल दिखते, मुझे उसकी बेटी की मुस्कान याद आ जाती।

खैर, अब किसी के पास, किसी एक से जुड़कर रहने का समय कहाँ! भूल जाना बहुत आसान था। मैं भी भूलने लगी थी। पैसे लौटाने की वह छटपटाहट भी वक्त के साथ फीकी पड़ती चली गई। नए ऑफिस ने मुझे बहुत कुछ दिया। उसे बनाने वाले गैरी के अलावा और भी कई लोगों को मैंने रोजगार देकर बड़ी राशि का भुगतान किया।

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सालों के अंतराल के बाद एक दिन सुबह-सवेरे वह अचानक प्रकट हुआ। ठीक से याद करूँ तो लगभग दस साल से भी ज्यादा हो चुके थे। पहले से थोड़ा शिथिल, पर चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी। उसके कंधों पर एक प्यारी-सी बच्ची बैठी थी। कोई चार-पाँच साल की होगी। उसके घुँघराले बाल लहराते हुए बार-बार उसके चेहरे पर आ जाते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे उसकी बेटी के हुआ करते थे। इस बात को पक्का करते कि वह उसकी बेटी की बेटी है।

उसके कंधों पर बैठी वह बच्ची अस्फुट स्वर में बोले जा रही थी और वह हाँ में गर्दन हिला रहा था। वह बच्ची से कुछ कह रहा था और बच्ची वही बात मुझसे दोहराती जा रही थी। उन दोनों की इस चहचहाहट से मैं इतना जरूर समझ पाई कि वह कोरिया में था और अब लौट आया है।

“और इसकी मम्मी कहाँ है?”

नन्हीं ने तुरंत मुस्कुराकर जवाब दिया “मेरी मम्मी घर पर है।”

“वाह, तुम्हें तो अंग्रेजी भी आती है! क्या तुम्हारे ग्रांड पा को भी…।”

मैं अपनी बात पूरी कर ही रही थी कि वह झट से बोल पड़ी – “ग्रांड पा स्कूल नहीं जाते, मैं स्कूल जाती हूँ।”

और मस्ती में खिल-खिल हँस पड़ी वह। नन्हीं-कोमल-कोंपल, नवजात धूप-सी, जैसे पूरी दुनिया को रोशनी दे रही हो। गैरी के चेहरे पर विराजित चिर स्थायी, वही मुस्कान मुझे पिछली सारी बातें याद दिला गई। ऐसा लगा जैसे तन-मन के कोर-कोर से टपकती और अभिभूत करती वह मुस्कान उसकी पूँजी हो। इससे ज्यादा सीखने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई होगी उसे। और यही अमूल्य पूँजी अगली पीढ़ी को विरासत में दे रहा था गैरी। बेटी को, बेटी की बेटी को, चेहरों की खिलखिलाती सौगात।

मैंने जब चेक लिखकर लिफाफा उस छोटी बच्ची को थमाया तो उसने उसी प्यारे लहजे में कहा- “थैंक-यू”! साथ ही गैरी ने भी। आँखों में विनम्रता थी, स्वर में दिल से निकली कृतज्ञता। वह “थैंक-यू” देर तक मेरे कानों में गूँजता रहा।

उन चंद पलों ने मेरी आँखों में बहुत कुछ कैद किया था। अस्ताचलगामी सूरज के कंधों पर उदयाचलगामी सूरज को देखने का नज़ारा बेहद ख़ूबसूरत था।

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कहानीकार का संक्षिप्त परिचय

हंसा दीप यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं के अनुवाद। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।
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