करवाचौथ : आस्था की ओट में बाजार का कारोबार
रत्ना भदौरिया
जिस व्रत से पति की उम्र बढ़ने का दावा है, उन घरों में स्त्रियाँ विधवा क्यों होती हैं, जहाँ हर साल चाँद के सामने पति की दीर्घायु की प्रार्थना की जाती रही? क्या उनकी तपस्या में कोई कमी थी, या मृत्यु उन धार्मिक दावों से अनभिज्ञ है, जिन्हें समाज ने सदियों से सत्य की तरह ढोया है?
प्रश्न व्रत रखने वाली स्त्री से नहीं, उस सामाजिक बुद्धि से है जिसने उसके प्रेम को भूख और उसकी निष्ठा को उपवास की कसौटी पर रख दिया। पति के जीवन के लिए स्त्री का निर्जल रहना पवित्र, लेकिन स्त्री के जीवन के लिए पुरुष का वैसा ही संकल्प अनिवार्य क्यों नहीं? क्या विवाह दो मनुष्यों का संबंध है या एक ऐसी पुरानी व्यवस्था, जिसमें स्त्री का त्याग धर्म और पुरुष की सुविधा परंपरा बन जाती है?
उधर चाँद निकलता है, इधर बाजार अपनी दुकानें सजाता है। आस्था के माथे पर सौंदर्य प्रसाधनों का उजास, प्रेम के नाम पर आभूषणों की कीमत और समर्पण के नाम पर उपभोग का उत्सव। बाजार जानता है कि मनुष्य की भावनाओं से अधिक लाभकारी कोई वस्तु नहीं—बस उन्हें परंपरा की पैकिंग में प्रस्तुत करना आना चाहिए।
लेकिन सबसे गहरा प्रश्न बाजार से भी आगे है। जिस स्त्री ने जीवन भर सुहाग की सलामती माँगी, उसके विधवा हो जाने पर समाज उसकी प्रार्थना की असफलता का हिसाब क्यों नहीं माँगता? और यदि नहीं माँगता, तो फिर सुहाग की रक्षा का भार उसी के व्रत पर क्यों रखा गया? मृत्यु किसी की आस्था का मूल्यांकन नहीं करती; यह मूल्यांकन समाज करता है—और अक्सर उसकी कीमत स्त्री चुकाती है।
करवाचौथ का असली प्रश्न चाँद की उम्र नहीं, उस सामाजिक मानसिकता की उम्र है, जो स्त्री के त्याग को पवित्रता और उसकी स्वतंत्रता को संदेह की दृष्टि से देखती है।
प्रेम को भूख से प्रमाणित करने वाला समाज अभी प्रेम का अर्थ नहीं समझ पाया है। प्रेम किसी की देह को कष्ट देकर दूसरे के जीवन की गारंटी खोजने में नहीं, दो जीवनों को समान गरिमा देने में है।
चाँद हर साल निकलता रहेगा। प्रश्न यह है कि उसकी रोशनी में स्त्री कब अपने सुहाग से आगे, अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ दिखाई देगी।
