सुरेन्द्र कल्याण बुटाना की एक कविता
पटाखे जलें या पराली जले,
चाहे जलें कारखाने,
या जलें गाड़ियों के इंजन पुराने,
दिल्ली अब ज़िंदा नहीं,
दिल्ली में अब रहना ठीक नहीं।
दिल्ली को अपना सिर्फ राजनेता समझते हैं,
बाकी तो इसे बस व्यापार का स्थल समझते हैं।
प्रवासियों की यह नगरी,
भूखों की बनी है डगरी,
यही तो है आज की दिल्ली!
जहाँ चलने वाले रास्तों पर सामान बेचा जाता है,
जहाँ लोगों को लोगों के ही द्वारा लूटा जाता है।
मरे कोई भी, यहाँ किसी को क्या फर्क पड़ता है,
‘यह दिल्ली है जनाब, यहाँ सब कुछ चलता है!’
मेरा नुकसान न हो, बाकी चाहे देश जले,
या फिर पूरी दिल्ली जले।
अपना सुख बस बना रहे,
चलो रैली, रोटी फ्री,
बस फ्री और बिजली फ्री!
अपने मज़े हैं, बस यही तो बात है,
मन की बात है प्रवासी की—
चाहे जले दिल्ली या जले बिजली,
अपने मुँह में तो हमेशा खिल – खिल!
