रमेश जोशी की पांच ग़ज़लें

त्रैमासिक ‘विश्वा’ (USA) के संपादक 84 वर्षीय रमेश जोशी अभी भी लेखन की दुनिया में पूरी तरह से सक्रिय हैं। उनका जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिला के चिड़ावा कस्बे में 18 अगस्त 1942 को हुआ है। फिलहाल बेंगलुरु को उन्होंने अपना निवास बनाया हुआ है। राजस्थान विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम०ए० और भोपाल विश्वविद्यालय से बी०एड० । पोरबन्दर से पोर्ट ब्लेयर तक देश के विभिन्न विद्यालयों में हिन्दी शिक्षण । सन् 2002 में केन्द्रीय विद्यालय, जयपुर से उप-प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। सन् 1958 से देश के स्तरीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में व्यंग्य रचनाएँ प्रकाशित । आकाशवाणी राजकोट, जयपुर, पोर्ट ब्लेयर, दिल्ली से व्यंग्य रचनाएँ प्रसारित । दिल्ली, पोर्ट ब्लेयर, सीकर और बेंगलूरु की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित: ओमसिंह अशफ़ाक

रमेश जोशी की पांच ग़ज़लें

(दूसरी किस्त)
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1.
खेतीहर तो बेगारी है।
असली मालिक व्यापारी है।

आती काटे, जाती काटे
यह मल्टीनेशनल आरी है।

छप्पर टपके किसे फ़िक्र है
कब्रों पर पच्चीकारी है।

या तो मिलकर जूझो वरना
इक-इक कर सबकी बारी है।

गाफिल होकर मत सो रहना
चोरों की पहरेदारी है।

जिसके यहाँ खेत है गिरवी
वही आजकल पटवारी है।
2.
क्या रखा है काम में।
जो कुछ है सो नाम में।

मेहनत करने वाले भूखे
चुपड़ी मिले हराम में।

जनता से उनका रिश्ता जो
घोड़े और लगाम में ।

नहीं पाँच पल जनता आती
कभी किसी के ध्यान में ।

पूरे पाँच बरस ही उनके
पाँच साल के प्लान में ।

सूखा और भुखमरी बैठे
खेतों में, खलिहान में।

बल्ब जलें, फ़व्वारे चलते
नेताजी के लान में।

3.

जनता से सरकार हो गए।
गद्दी पर असवार* हो गए ।

‘सोने की चिड़िया’, हम लेकिन
उनके सब अधिकार हो गए।

पहले तो बेकार घूमते
लेकिन अब बाकार**हो गए।

कर्जदार है मुल्क भले ही
वे सरमायादार हो गए ।

देश अँधेरे में पर उनके
सब सपने साकार हो गए।

पार नहीं पड़ रही ‘लोक’ की
पर वे अपरम्पार हो गए।

मुल्क फँसा है मझधारों में
उनके बेड़े पार हो गए ।

*सवार **कार सहित
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4.

ठुड्डी घुटनों तक पहुँचाई ।
फिर भी छोटी पड़ी रजाई ।

हमसे इतनी दूर हुए वो
जितनी डी.ए. से महँगाई ।

खिड़की, दरवाजे बिन पल्ले
हवा बह रही है पछवाई ।

सुख को बहुमत नहीं मिल सका
औ’ दुःख ने कुर्सी हथियाई ।

रहे पास में लेकिन ऐसे
जैसे अमरीकी-क्यूबाई*।

दुनिया ग्लोबल गाँव हुई पर
वो ही बकरे, वही कसाई ।

*’अमरीका में रहनेवाला क्यूबा का नागरिक
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5.

दाल नहीं, ना पानी है।
ये ही खींचातानी है।

सारे जीव बराबर तो
क्यूँ ये राजा-रानी हैं।

चित-पट दोनों उनकी हैं
खेल बड़ा लासानी है।

गाटर चोरें, सुई दान दें
बहुत बड़ी कुर्बानी है।

कौन पकड़ पायेगा उनको
सारी बात जुबानी है।

कुछ पर रिमझिम,बाकी सूखा
बादल की मनमानी है।

स्वप्न देखते जीवन बीता
ऐसी राम-कहानी है।
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पुस्तक: बेगाने मौसम(हिंदी ग़ज़लें)
लेखक: रमेश जोशी
Publisher: Thinking heart, Bengaluru- 560 078 (India)
First edition,2011, price ₹120 pages 98

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