घर परिवार
घर की अनदेखी जिम्मेदारियाँ और स्त्री का थकता मन
मेंटल और इमोशनल लोड की अनकही कहानी
डॉ रीटा अरोड़ा
“तू इतनी थकी हुई क्यों लग रही है?” रेखा ने रविवार शाम अपनी सहेली से पूछा।
नीरा हल्का-सा हँसी, “थकान काम की नहीं है।”
“फिर?”
“सुबह से कपड़े बदले, अलमारियाँ साफ कीं, बेटे का प्रोजेक्ट देखा, सासू माँ की दवा रखी, laundry लगाई, अगले हफ्ते का सामान सोचा… और वो सामने सोफे पर मोबाइल चला रहे थे।”
“कहा नहीं?”
“कहा तो बोले- ‘मुझे बता दिया करो, क्या करना है।’”
नीरा कुछ देर चुप रही।
फिर बोली, “यही तो दर्द है रेखा… मुझे हर बार बताना क्यों पड़े कि इस घर में क्या करना है? क्या यह घर सिर्फ मुझे दिखाई देता है?”
रेखा के पास उत्तर नहीं था।
शायद क्योंकि यह केवल नीरा की कहानी नहीं थी।
हमारे घरों में स्त्री की थकान अक्सर दिखाई ही नहीं देती। और यदि दिखाई देती भी है, तो उसे जल्दी से एक नाम दे दिया जाता है- “चिड़चिड़ी हो गई है”, “हर समय परेशान रहती है”, “इतना क्या काम है?”
लेकिन सच कई बार इससे बहुत गहरा होता है।
एक गृहिणी सुबह से रात तक घर में रहती दिखाई देती है, इसलिए अक्सर मान लिया जाता है कि उसके पास “समय ही समय” है। दूसरी ओर नौकरी करने वाली स्त्री से कहा जाता है-“तुम तो बाहर भी जाती हो, घर के लिए maid है, फिर क्या परेशानी?”
लेकिन दोनों स्थितियों में एक चीज़ समान रह सकती है- जिम्मेदारी का केंद्र वही बनी रहती है।
घर में क्या खत्म होने वाला है, कौन-सा बिल कब भरना है, मौसम बदलने पर कौन-से कपड़े निकालने और रखने हैं, अलमारी कब साफ करनी है, चादरें कब बदलनी हैं, laundry कब करनी है, बच्चों की यूनिफॉर्म तैयार है या नहीं, किसकी दवा खत्म हो रही है, किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है, किस शादी में क्या देना है- इन सबका कोई घंटा तय नहीं होता।
ये काम हाथ से कम, दिमाग में लगातार चलते रहते हैं।
और सबसे तकलीफ़देह क्षण तब आता है जब एक व्यक्ति यह सब सोचते-संभालते घूम रहा हो और दूसरा उसी घर में निश्चिंत बैठा हो।
रविवार को पति पैर फैलाकर मोबाइल स्क्रॉल कर रहा है। पत्नी अलमारी खाली करके कपड़े छाँट रही है।
वह उससे यह नहीं चाहती कि वह उसके हर काम में हाथ लगा दे।
उसकी पीड़ा कहीं और है।
“अगर आज छुट्टी तुम्हारी है, तो मेरी क्यों नहीं?”
घर दोनों का है। बच्चे दोनों के हैं। बुज़ुर्ग दोनों के हैं। रिश्ते दोनों के हैं। फिर घर का बिखराव केवल एक को क्यों बेचैन करता है?
यही असमानता भीतर-ही-भीतर चुभती रहती है।
और फिर आता है वह बहुत सामान्य वाक्य- “तुम बता दिया करो, मैं कर दिया करूँगा।”
पहली नज़र में यह मदद का प्रस्ताव है। लेकिन स्त्री के लिए यही वाक्य कभी-कभी सबसे बड़ी थकान बन जाता है।
क्योंकि यदि उसे ही देखना है कि क्या करना है, तय करना है कि कब करना है, याद रखना है कि किससे करवाना है और फिर निर्देश भी देना है- तो जिम्मेदारी बाँटी कहाँ?
वह पत्नी नहीं, घर की Project Manager बन गई और पति Execution team।
फिर कभी दूसरा वाक्य सुनाई देता है-
“मेरे ऊपर तुमसे ज्यादा जिम्मेदारियाँ हैं।”
या
“तुम्हें लगता है मैं कुछ करता ही नहीं?”
या फिर
“तुम ही कर लो, मैं करूँगा तो भी कमी निकालोगी।”
इन वाक्यों में अक्सर एक और दर्द छिपा होता है- स्त्री को अपनी थकान बताने से पहले अपनी थकान साबित करनी पड़ती है।
नौकरीपेशा महिला के लिए यह बोझ और अधिक जटिल हो जाता है।
ऑफिस में वह professional है। Deadlines हैं, Meetings हैं, Targets हैं। रास्ते में लौटते हुए उसका दिमाग घर पर पहुँच चुका होता है- आज खाना क्या बनेगा, बच्चे की परीक्षा है, सासू माँ की रिपोर्ट डॉक्टर को भेजनी है, कल किसकी PTM है।
वह ऑफिस से निकलती है, लेकिन उसका काम खत्म नहीं होता।
घर पहुँचते ही दूसरी Shift शुरू हो जाती है।
और गृहिणी?
उसकी shift तो कभी formally शुरू ही नहीं होती, इसलिए खत्म भी नहीं होती।
उसे कोई नहीं कहता- “आज तुम्हारी duty पूरी हुई।”
यही Invisible Labour है।
लेकिन इससे भी गहरा है Emotional Labour।
घर में किसका मूड खराब है, किस बच्चे को समझाना है, सास की कौन-सी बात मन में रह गई, ससुर को किस बात का बुरा लगा, पति ऑफिस के तनाव में है तो आज उससे कैसे बात करनी है-यह सब भी अक्सर स्त्री ही महसूस और Manage करती रहती है।
वह केवल घर के काम नहीं संभालती। कई बार वह घर का Emotional Temperature भी संभालती है।
बच्चे को पिता से नाराज़गी है- माँ बीच में आती है।
पति और माता-पिता के बीच तनाव है – वह संतुलन बनाती है।
ससुराल में कोई बात बुरी लगी- वह जवाब रोकती है ताकि माहौल न बिगड़े।पति परेशान है- वह अपनी शिकायत कुछ देर रोककर पूछती है, “सब ठीक है?”
लेकिन उसके मन का हाल कौन पूछता है?
हर समय सबका सहारा बनने वाला व्यक्ति भी एक दिन भीतर से खाली हो सकता है। और सबसे दुखद यह है कि कई स्त्रियों को मदद से भी अधिक एक एहसास चाहिए-
“मैं अकेली जिम्मेदार नहीं हूँ।”
कभी पति बिना कहे laundry लगा दे।
कभी बच्चे का स्कूल ग्रुप स्वयं देख ले।
कभी घर बिखरा देखकर मोबाइल नीचे रख दे।
कभी कहे- “तुम बैठो, मैं देखता हूँ।”
काम शायद वही रहें, लेकिन उस क्षण स्त्री के भीतर कुछ बदल जाता है।
क्योंकि उसे लगता है- किसी और को भी दिखाई दे रहा है।
यही साझेदारी है।
बराबरी केवल कमाई बाँटने से नहीं आती। न ही केवल झाड़ू, बर्तन और खाना बाँटने से।
बराबरी तब आती है जब सोचना, याद रखना, योजना बनाना, रिश्ते निभाना और भावनाओं को संभालना भी साझा हो।
घर कोई ऐसी जगह नहीं होनी चाहिए जहाँ एक व्यक्ति “मुख्य जिम्मेदार” और दूसरा “मदद करने वाला” हो।
पति मदद नहीं करता।
पत्नी भी मदद नहीं करती।
*दोनों अपना घर चलाते हैं।*
और शायद स्त्री को सबसे ज्यादा राहत तब मिलती है जब कोई उसके हाथ से काम नहीं, उसके मन से जिम्मेदारी उठाता है।
उसे यह न कहना पड़े-
“ये कर दो।”
“वो याद रख लेना।”
“बच्चे को देख लेना।”
“माँ की दवा दे देना।”
बल्कि सामने वाला स्वयं देखे, स्वयं याद रखे, स्वयं आगे बढ़े।
क्योंकि प्रेम का सबसे गहरा रूप हमेशा फूल, उपहार या बड़े शब्द नहीं होते।
कभी-कभी प्रेम बस इतना होता है- एक साथी मोबाइल नीचे रख दे, उसके पास आकर खड़ा हो और कहे-
“ये सब तुम्हारा अकेले का नहीं है।
मैं भी देख रहा हूँ।
मैं भी याद रखूँगा।
मैं भी संभालूँगा।
और सबसे ज़रूरी- तुम अकेली नहीं हो।”
शायद उस दिन उसकी थकान पूरी तरह खत्म न हो।
लेकिन उसका दर्द आधा जरूर हो जाएगा।
